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BeyondHeadlines > Lead > सीरिया का विकल्पहीन संकट और अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय
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सीरिया का विकल्पहीन संकट और अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published September 22, 2013 22 Views
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12 Min Read
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Omair Anas for BeyondHeadlines  

आखिर सयुंक्त राष्ट्र की जाँच ने सीरिया में नागरिकों पर रासायनिक हमले की  पुष्टि कर दी है. अंतर्राष्ट्रीय मनोवाधिकार एजेंसियां पहले ही कई रिपोर्ट पेश कर चुकी हैं, जिसके अनुसार सीरिया की हुकूमत इन हमलों के लिए ज़िम्मेदार है. लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में सीरिया के संकट को लेकर कोई सहमती नहीं बन पा रही है.

कारण है कि सीरिया का संकट घरेलू, क्षेत्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अलग अलग समीकरणों से जोड़ कर देखा जा रहा है, लेकिन इन सब के चलते सीरिया की जनता पिस रही है. 25 प्रतिशत लोग पलायन कर चुके हैं. और सत्ता पक्ष की तरफ से असद विरोधियों का भयंकर दमन जारी है. अरब देशों की राजनीती को मोटे तौर पर इस्लामवादी और इस्लाम विरोधी खेमों में बाँट कर देखने की सुविधाजनक थ्योरी का पोषण किया गया है. हालांकि इन दोनों के बीच में कमज़ोर ही सही कई सारी कड़ियाँ मौजूद हैं, जिन्हें हमेशा नज़रअंदाज़ किया गया. सीरिया के मौजूदा संकट को इस सन्दर्भ में समझना ज्यादा आसान होगा.

इराक, सीरिया, लेबनान और मिस्र देशों में प्रगतिशील सेक्यूलर और समाजवादी विचारधारा वाली बाथ पार्टी को भारी जनसमर्थन प्राप्त था और इस पार्टी ने राजशाही को उखाड़ फेंका और जनतंत्र के लिए आन्दोलन चलाया, बल्कि इस्लामी विचारधारा से भी पहले ये एक पैन अरब राजनीतिक व्यवस्था के लिए आम राय बना चुकी थी, जिसका पहला नमूना 1958 में सीरिया और मिस्र को मिलकर बना यूनाइटेड अरब रिपब्लिक देश था, जो 1961 में फिर बिखर गया. जिसके बाद सीरिया में फौजी तख्तापलट हो गया और यहाँ से बाथ पार्टी में राजनीतिक नेतृत्व की जगह सैन्य नेतृत्व का दबदबा बढ़ने लगा.

Photo Courtesy: salon.com1967 की 6 दिनों की अरब इजराइल जंग में अरब देशों की हार और सीरिया के गोलान पर इसरायली कब्ज़े के बाद बाथ पार्टी का गैर फौजी नेतृत्व कमजोर पड़ गया. 1970 में एयरफोर्स कमांडर और रक्षामंत्री हाफेज़ अल असद ने सत्ता तख्तापलट कर सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया. हाफेज़ अल असद के नज़दीक अरब इजराइल विवाद और सीरिया की विदेश नीति अंदरूनी राजनितिक सुधारों से ज्यादा महत्वपूर्ण काम थे. सीरिया के सत्ता प्रतिष्ठानों पर हफेज़ अल असद के वफादारों को बिठा दिया गया. बाथ पार्टी की विचारधारा को किनारे लगाते हुए उन्होंने सोशल इंजीनियरिंग का साम्प्रदायिक फार्मूला अपनाया जिसके तहत तमाम अहम फौजी सामरिक और ख़ुफ़िया संस्थानों को असद के वफादारों के बीच में ही रखा गया.

नतीजा ये हुआ की सीरिया में पार्टी, सत्ता पक्ष और विपक्ष सब असद परिवार के इर्द गिर्द घूम रहे थे. संगठन के स्तर पर असद परिवार के वर्चस्व को चैलेंज करने की क्षमता सिर्फ इस्लामवादी मुस्लिम ब्रदरहूड में थी जो सुन्नी मुस्लिम इलाकों अलेप्पो, हामा और होम्स में अपनी संगठन को मज़बूत बनाने में सफल रहे थे. लेकिन 1982 हाफेज़ अल असद पर कथित हत्या की साज़िश के खुलासे के बाद असद के भाई रीफाआ अल असद ने बेरहमी के साथ हामा शहर को कर्बिस्तान में बदल दिया.

रोबर्ट फिस्क और डेविड फ्रीडमन के अनुसार 20 से 25 हज़ार लोगों की हत्या करदी गई. इस घटना ने पूरे सुन्नी समुदाय को हिला कर रख दिया, जिसकी हमदर्दी सुन्नी मुस्लिम ब्रदर के साथ किसी न किसी सतह पर थी.

सीरिया में एक बड़ी समस्या ये थी कि सत्ता के सारे दरवाज़े बाथ पार्टी से होकर जाते थे और असद परिवार के दरवाज़े पर बंद होते थे. इतने बड़े नरसंहार के बाद बाथ पार्टी और अन्य सेक्यूलर राजनीतिक पार्टियों की तरफ से इस नरसंहार को रोकने या उसकी निंदा और पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कोई क़दम नहीं उठाये गए. नतीजा ये हुआ कि धार्मिक राजीनीति करने वाले इस्लामिक संगठन और सेक्यूलर बाथ पार्टी या उससे टूट कर बनने वाले अन्य संगठनों के बीच में सहयोग के दरवाज़े पूरी तरह बंद हो गए.

वक्त गुजरने के साथ सेक्यूलर नेताओं को मालूम होने लगा कि सीरिया का प्रगतिशील आन्दोलन और सेक्यूलर राजनीति अब असद परिवार की चाटुकारिता मात्र रह गया है. अब असद परिवार के पीड़ितों में मात्र इस्लामवादी ही नहीं, बल्कि नए समूहों और संगठनों को चिन्हित कर लिया गया था. हफेज़ अल असद के उत्तराधिकारी बशर अल असद ने बदलते हालात में सहयोग की नीति पकड़ी. उन्होंने मुस्लिम ब्रदर की समर्थित फलिस्तीन में लड़ रहे हमास को सीरिया में राजनातिक गतिविधियों के लिए कार्यालय खोलने दिया.

उधर तुर्की में इस्लामवादी पार्टी जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी के सत्ता में आने बाद और तुर्की में अब तक के सबसे अच्छे रिश्तों की बुनियाद पड़ चुकी थी. इस बदलते परिदृश्य में सब कुछ असद परिवार के पक्ष में था, लेकिन 2011 में तुनिशिया और मिस्र में ज़बरदस्त अवामी लहर के आगे बेन अली और होस्नी मुबारक जैसे तानाशाह नहीं टिक सके.

बशर अल असद के लिए ये एक चुनौती भी थी और मौका भी, लेकिन बशर अल असद ने इस लहर को केवल मुस्लिम ब्रदरहुड का षड्यंत समझा. इस सम्बन्ध में टर्की के विदेश मंत्री अहमद दावूद ओग्लो की बशर अल असद से करीब दस घंटे की मुलाक़ात काफी चर्चा में रही जिसमें टर्की ने असद को राजनीतिक सुधारों के बारे में यथार्थ पर आधारित सुझाव दिए. जिससे आने वाले संकट को टाल कर असद अरब देश के पहले लोकतान्त्रिक युवा नेता बन जाते, लेकिन बशर अल असद डर चुके थे.

वह इस अवसर को आफत समझने की गलती कर बैठे और अपने पिता हाफेज़ अल असद के क़दम पर चलते हुए इस जनक्रांति को 1982 में मुस्लिम ब्रदरहुड वाली कथित बगावत क़रार देते हुए उसे “वन्स एंड आल” यानी हमेशा के लिए कुचल देने की नीति पर चल पड़े. उन्होंने बिलकुल अपने पिता कि तरह उसी बेरहमी से मुस्लिम ब्रदरहुड के समर्थन वाले  इलाकों में भयानक बमबारी शुरू कर दी.

असद समर्थकों ने पूरी ताकत से ये प्रचार किया की ये जनक्रांति नहीं बल्कि अलकायदा का आतंकवाद है, जिसे मुस्लिम ब्रदरहुड समर्थन कर रहा है. उनके लोगों ने कहा की अरब देश में इजराइल के लिए बशर अल असद एक मात्र चैलेंज हैं, जो इजराइल से लड़ सकते हैं. इसलिए पश्चमी देश उनके खिलाफ हैं. लेकिन असद समर्थकों के पास इसका कोई जवाब नहीं था कि इस बार आन्दोलन में बड़ी तादाद में प्रगतिशील बुधजिवी कार्यकर्ता, महिलायें, इसाई नेता, असद के अपने सम्प्रदाय अलवाईट और अन्य सम्प्रदायों के लोग इस आन्दोलन बढ़-चढ़ क्यों हिस्सा ले रहे हैं.

विश्विख्यात इस्लामी आलोचक सादिक जलाल अल अजम इस्लामी राजनीति के धुरंधर विरोधी होने के बावजूद असद विरोधी आन्दोलन में क्या कर रहे हैं? सादिक अल आज़म बार बार इस आन्दोलन को मुस्लिम ब्रदरहुड का आन्दोलन मानने को ख़ारिज करते हैं, बल्कि उनका कहना है उन्हें भरोसा है कि सीरिया की जनता इस्लामी संगठनों की कमजोरी बहुत जल्द समझ लेगी और सेक्यूलर और प्रगतिशील लोगों ही सीरिया का नेतृत्व करेंगे.

सीरिया की फ़ौज के बड़े हिस्से ने अपनी जनता दमन के आदेश को मानने से इनकार कर चुके हैं और 20 हज़ार ज्यादा सैनिक अलग हो कर नागरिकों की सुरक्षा के लिए फ्री सीरियन आर्मी के बनाई तो उसे भी अलकायदा घोषित कर दिया गया है. लेकिन वो ये नहीं बता पा रहे हैं की असद विरोधी खेमें में इस बार बुरहान गालियून, हैथम अल मलेह, राजान जैतुना, सुहैर अल अत्तासी, जॉर्ज सब्रह समेत अनेक प्रगतिशील नेता जो इस्लाम पंथियों का विरोध करते रहे हैं, क्या वो भी अलकायदा के समर्थक हो गए हैं?

दरअसल, असद सरकार इस बार ये समझने में विफल रही है कि ये जनक्रांति सिर्फ इस्लामी संगठनों की नहीं है. जैसा की मिस्र और तुनिशिया में साफ़ दिख रहा है कि सेक्यूलर और प्रगतिशील पार्टियों ने इस्लामी संगठनों पर ज़बरदस्त दबाव बना कर रखा हुआ है और सीरिया को अफ़ग़ानिस्तान में बदलने के किसी भी सपने को तोड़ने में सीरिया की जनता मिस्र की जनता से भी ज्यादा सक्षम सबसे ज्यादा सेक्यूलर और सबसे ज्यादा व्यापक गटबंधन है.

जिस तरह से बशर अल असद अपने पिता की तरह हर शहर पर खतरनाक बमबारी कर रहे हैं, बल्कि रासायनिक बमों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे साबित हो गया है कि वो सीरिया से ज्यादा अपने और अपने परिवार के राजनितिक वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. और इसके लिए वो किसी भी हद तक जा सकते हैं. ऐसे में अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय सीरिया की जनता को 1982 के हामा नरसंहार की तरह अकेला नहीं छोड़ा जा सकता.

रूस और चीन को बशर अल असद की चिंता है, लेकिन उन्हें सीरिया की जनता की कोई फ़िक्र नहीं है. सिर्फ वीटो का इस्तेमाल ही नहीं, बल्कि उनकी ज़िम्मेदारी ये भी थी असहमति के इस माहोल में वो असद सरकार को अपनी जनता के खिलाफ रासायनिक और खतरनाक सैन्य हथियारों का इस्तेमाल करने से रोके रखें. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. असद सरकार के पिछले नरसंहारों से कोई भी सबक लिया जा सकता है तो वह ये है कि जनांदोलन को कुचलने के लिए असद सरकार किसी भी हद तक जा सकती है.

जाहिर है अगर मानवीय त्रासदी और सयुंक्त राष्ट्र में सहमती के बीच में एक विकल्प को चुना जाना है तो मानवीय त्रासदी को रोकना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए और इसके लिए सयुंक्त राष्ट्र सबसे बेहतर विकल्प है. लेकिन सहमती बनाने के लिए महीनों और सालों के इंतज़ार की कीमत सीरिया की जनता नित नए हमलों, कत्ले आम से चूका रही है. ऐसे में मानवीय त्रासदी को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दखल एक मात्र ऐसा रास्ता है, जो असद सरकार को अपनी जनता के खिलाफ खतरनाक हमलों, रासायनिक हमलों और हामा जैसी कत्ले आम से रोक सकता है.

(लेखक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के पश्चिमी एशिया अध्यन केंद्र में शोध-छात्र हैं.) 

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