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Reading: क्यों खामोश हैं सारे आइकोनिक पत्रकार?
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BeyondHeadlines > India > क्यों खामोश हैं सारे आइकोनिक पत्रकार?
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क्यों खामोश हैं सारे आइकोनिक पत्रकार?

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published September 1, 2013 7 Views
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7 Min Read
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BeyondHeadlines News Desk

मीडिया में जारी छटनी और पत्रकारों की समस्याओं को ध्यान में रख आयोजित की गयी पत्रकार एकजुटता मंच (जर्नलिस्ट सोलिडेरिटी फोरम- जेएसएफ) की पब्लिक मीटिंग 31 अगस्त को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में सम्पन्न हुई. इस बैठक में मौजूद वरिष्ठ पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओ और वरिष्ठ वकीलों ने मीडिया पर कॉर्पोरेट के बढ़ते प्रभाव और उससे पैदा हो रही समस्याओं पर सबका ध्यान आकर्षित किया.

गौरतलब है कि बीती 21 अगस्त को जेएसएफ ने दो समाचार चैनलों सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन-7 से एकमुश्त 320 पत्रकारों की हुई छटनी के विरोध में फिल्मसिटी नोएडा में प्रदर्शन भी किया था. उसी के बाद इस बैठक की रूपरेखा तयार की गयी थी. बैठक में मुख्यतः पत्रकार श्रमजीवी कानून-1955 और मजीठिया आयोग की मांगों को लागू करना, मीडिया इंडस्ट्री में व्याप्त कांट्रैक्ट सिस्टम का विरोध करना, मीडिया क्रॉस होल्डिंग से उपज रहे खतरे, प्रेस कमीशन को मज़बूत करना और पत्रकारों के लिए मौजूदा काम के हालात जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात हुई. बैठक की शुरुआत करते हुए जेएसएफ सदस्य और वरिष्ठ मीडिया आलोचक भूपेम सिंह ने कहा कि आज पत्रकारों के पास इतने अधिकार भी नहीं बचे हैं कि वे मालिकों के सामने नौकरी जाने की हालत में भी किसी तरह का विरोध भी दर्ज करा सकें.

The legal battle against retrenchment in mediaएक तरफ जहां पत्रकारों कि वर्किंग कंडीशन दिन पर दिन बदतर होती जा रही है, वहीं इन मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए पत्रकारों कि योग्यता या अयोग्यता के लिए परीक्षा जैसे सुनियोजित किस्म कि बातें की जा रहीं हैं. बैठक में बतौर वक्ता भाग ले रहे वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने मीडिया में काम कर रहे सीनियर पत्रकारों कि जमकर ख़बर ली. उर्मिलेश ने कहा कि छटनी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर ये सारे आइकोनिक पत्रकार ही सबसे पहले कन्नी काटते नज़र आते हैं.

उर्मिलेश ने मीडिया संस्थानों में यूनियनों को फिर से बहाल करने को लेकर भी ज़ोर दिया. उर्मिलेश ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से संबद्ध पार्लियामेंट कि स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट को भी पढ़ने कि सलाह दी. उन्होंने कहा कि यह एक संवैधानिक रिपोर्ट है और इसी को आधार बनाकर जेएसएफ पत्रकारों के हक़ की लड़ाई को आगे ले जा सकता है. वरिष्ठ पत्रकार सुरेश नौटियाल ने भी अंबानी परिवार के नब्बे के बाद से मीडिया में बढ़ते आ रहे दखल पर कई महत्वपूर्ण बातें की.

उन्होने ऑब्जर्वर समाचार पत्र की यूनियन का अध्यक्ष होने के अपने अनुभवों को भी साझा किया और इतिहास कि गलतियों से सबक लेने को कहा. भारतीय जन संचार संस्थान में अध्यापक वरिष्ठ पत्रकार आनंद प्रधान ने भी जेएसएफ कि इस पहल की प्रसंशा करते हुए इस मुहिम से अपनी एकजुटता जाहिर की.

उन्होंने श्रमजीवी पत्रकार कानून का दायरा बढ़ाने और इसमें संशोधनों की आवश्यकता पर ज़ोर दिया. अभियान से बाकी मीडिया संस्थानों और लोगों को जोड़ने कि सलाह देते हुए आनंद प्रधान ने कहा कि कानून को लागू करने के बाबत राज्य सरकारों द्वारा बरती गयी उपेक्षा पर भी बात कर इस बारे में और जानकारियां जुटानी चाहिए.

दैनिक भास्कर से ज़बर्दस्ती निकाले गए पत्रकार जीतेन ने भी अपना अनुभव साझा करते हुए मीडिया में जारी भ्रष्टाचार पर बात करने कि ज़रूरत को रेखांकित किया. भास्कर के जनसम्पर्क विभाग के हेड राज अग्रवाल की बतौर पत्रकार प्रधानमंत्री के साथ कि गयी 11 यात्राओं पर भी उन्होंने ही सवाल उठाए हैं साथ ही उस पर कानूनी कार्रवाई की मुहिम जीतेन ही आगे बढ़ा रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने भी पूरी लड़ाई को सिर्फ छटनी के विरोध पर केन्द्रित न रख उसे आगे अधिकारों की बहाली कि लड़ाई में बदलने कि उम्मीद जताई. उन्होंने मीडिया में आवाज़ उठाने वालों को निशाना बनाने जैसी घटनाओं के विरुद्ध भी एकजुट होकर आवाज़ उठाने कि उम्मीद ज़ाहिर की.

भाषा ने मीडिया में बढ़ रही राइटविंग कैपिटल के प्रति सचेत रहने कि सलाह दी. वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमरिया ने भी विज्ञापन के बढ़ते प्रभाव और उपभोक्तावाद से प्रभावित मीडिया के असल सवालों से रूबरू होने के लिए पत्रकारों कि एकजुटता को ज़रूरी बताया.

वरिष्ठ पत्रकार सुकुमार मुरलीधरन ने भी विज्ञापन इंडस्ट्री की ग्रोथ को आर्थिक वृद्धि की तरह एक बुलबुला बताया और इन छटनियों के पीछे कि असल वजहों पर ध्यान देने कि बात कही. उन्होंने क़ानूनों को लागू करने और इसके लिए सरकार पर भी दबाव बढ़ाने के लिए जेएसएफ को प्रेरित किया.

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने मीडिया के फाइनेंशियल स्वरूप पर सवाल उठाते हुए इसे बदले बिना बाकी बातों के व्यर्थ साबित होने पर ज़ोर दिया. प्रशांत ने वैकल्पिक मॉडल की तरफ ध्यान देने और कई को-ओपरेटिव मॉडलों का उदाहरण देते हुए संभावनाओं को तलाशने कि बात भी कही.

वरिष्ठ पत्रकार परंजय गुहा ठाकुरता ने मुहिम से एकजुटता दिखाते हुए क्रॉस मीडिया ओनरशिप के खिलाफ कड़े कानून बनाने की मांग पर ज़ोर दिया. उन्होंने बिड़ला, अंबानी और ओसवाल के उदाहरण देते हुए साफ किया कि किस तरह ये सब अपने दूसरे व्यवसाओं को मीडिया ओनरशिप से फायदा पहुंचा रहे हैं. नीरा रडिया टेप और कोला घोटाले मे इसकी बानगी देखी जा भी चुकी है.

वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजलविस ने अपने वक्तव्य में यह साफ किया कि कांट्रैक्ट पर काम करने वाले पत्रकार असल में कांट्रैक्ट पर काम करने वाले मजदूर ही हैं. लेकिन इसके बावजूद अगर कांट्रैक्ट वाले भी 100 से ज्यादा कर्मचारियों को निकाला जा रहा है तो इससे पहले सरकार से अनुमति लेने ज़रूरी है. यह आपका अधिकार है और जो इन चैनलों में हुआ यह सीधे-सीधे कानून का उलंघन है.

बैठक में बड़ी संख्या में छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपनी उपस्थिती दर्ज कराई. बैठक में वरिष्ठ पत्रकार पंकज बिष्ट, अमित सेन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार सत्येन्द्र रंजन, वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह, दिल्ली जर्नलिस्ट यूनियन कि वरिष्ठ पत्रकार सुजाता माधोक, अतुल चौरसिया, यशवंत सिंह, सुधीर सुमन, बृजेश सिंह, प्रियंका दुबे, उमाकांत लखेड़ा, सुरेन्द्र ग्रोवर, मनीषा पांडे, मुकेश व्यास, अभिषेक पाराशर आदि लोग मौजूद रहे.

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