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BeyondHeadlines > Exclusive > चुनावी अखाड़े में मासूमों के सवालों की अनदेखी
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चुनावी अखाड़े में मासूमों के सवालों की अनदेखी

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published November 12, 2013 5 Views
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7 Min Read
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दिल्ली में 18 हज़ार से अधिक स्कूल बसों के काटे गए चालान

Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines

साहिर लुधियानवी की लिखी नज्म `वो सुबह कभी तो आयेगी’ शायद आप सबको याद होगी. लेकिन दिल्ली वालों के लिए वो सुबह हर दिन आती है, जब वो अपने ही हाथों से अपने लख्त-ए-जिगर, कलेजे के टुकड़े को इस उम्मीद के साथ स्कूल बसों में ठूंस कर वापस लौट आते हैं कि उनका बच्चा सही सलामत घर वापस ज़रूर आएगा. उनकी यह चिंता जायज़ भी है, क्योंकि दिल्ली में बस ड्राईवर के जो कारनामें हैं, उससे बखूबी दिल्ली-वासी वाकिफ हैं. न जाने इन ड्राईवरों की गलतियों व स्कूल वालों की मनमानी की वजह से कितने मासूम जिन्दगियां अब तक बर्बाद हो चुकी हैं.

गैर-सरकारी संस्था विश्व शांति परिषद के अध्यक्ष फैज़ अहमद को आरटीआई  से प्राप्त महत्वपूर्ण दस्तावेज़ यह बताते हैं कि ‘दिल्ली मोटर वाहन नियम (संशोधित),-1998 के नियम 68 के अनुसार किसी भी शैक्षणिक संस्था की बस या कोई अन्य वाहन जो स्कूल के बच्चों को लाने व ले जाने में प्रयोग किया जाता है, वाहन के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट में दर्शायी यात्रियों की क्षमता से 1.5 यानी डेढ़ गुणा से ज़्यादा स्कूल के बच्चों को नहीं ले जा सकता.’ यही बात माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा एम.सी. मेहता बनाम भारत सरकार व अन्य के मामले में स्कूल बसों से संबंधित जारी दिशा-निर्देश में भी कही गई है.

लेकिन फैज़ अहमद को डीटीसी से आरटीआई द्वारा डीटीसी व स्कूलों में बसों के मामले में होने वाले अग्रीमेंट की जो कॉपी हासिल हुई है, उसमें स्टैण्डर्ड फ्लोर बस में 72 बच्चों को बैठाने की बात कही गई है, वहीं डीटीसी के नरेला डिपो का कहना है कि स्कूल बसों में अधिकतम 80 छात्रों को बिठाया जा सकता है, जो सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देश का उल्लंघन है. क्योंकि स्टैण्डर्ड फ्लोर बस में मात्र 35 या 36 सीटें होती है, यानी नियम के मुताबिक अधिकतम 54 बच्चों को ही बसों में बैठाया जा सकता है.

अब नियम कानूनों की बातों को तो आप बस भूल जाईए. सच्चाई तो यह है कि दिल्ली के किसी भी स्कूल बसों में 90 से अधिक बच्चों को ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है. ज़्यादातर बच्चे अपने कंधों पर किताबों से भरे हुए भारी बैग लिए हुए खड़े होकर ही सफर करते हैं. जो इन मासूमों के साथ एक ज़ुल्म है.

फैज़ अहमद कहते हैं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी करते हुए दिल्ली सरकार के एक महत्वपूर्ण विभाग डीटीसी द्वारा स्कूलों के साथ अग्रीमेंट साईन करते समय 72 बच्चों को बिठाने की बात लिखना कहीं न कहीं रिश्वत या किसी घोटाले की ओर इशारा करता है. आगे वो बताते हैं कि वो इस मामले को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाज़ा भी खटखटाएंगे.

बात यहीं खत्म नहीं होती, प्राईवेट स्कूल डीटीसी से बस किराये पर लेते हैं. अगर किराये की बात करें तो स्टैण्डर्ड फ्लोर बस के एक दिन का किराया 50 कि.मी. तक के लिए मात्र 2000 है, वहीं ग्रीन लो फ्लोर बस 3000 व एसी लो फ्लोर बस 4500 के हर दिन के किराये पर आता है. अब ज्यादातर प्राईवेट स्कूल अधिक मुनाफा के चक्कर में स्टैण्डर्ड फ्लोर बस ही किराये पर लेते हैं. जबकि स्कूलों में पारेंट्स से फीस खूब मनमाने ढ़ंग से वसूली जाती है. उससे भी बड़ी बात यह है कि एक से अधिक रूट के बच्चों को एक ही बस में ठूंस-ठूंस कर भर देते हैं. जिससे कई बच्चों को जिनका सफर सिर्फ मिनटों का है वो घंटों दिल्ली का चक्कर काटते रहते हैं. जबकि ज्यादातर बसे सुरक्षा की दृष्टि से फिट नहीं हैं. इनकी कंडीशन इतनी बूरी है कि कहा नहीं जा सकता. किसी बस में शीशा नहीं तो किसी बस में खिड़की व दरवाजे गायब हैं. जबकि माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देश के मुताबिक ऐसा किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.

सड़कों पर इन स्कूल बसों के ड्राईवर सारे यातायात नियमों का उल्लंघन धड़ल्ले से करते हैं. लेकिन डीटीसी के द्वारका डिपो, हरि नगर डिपो, मायापूरी डिपो, नारायणा डिपो, आई.पी. डिपो, गाज़ीपूर डिपो, यमुना विहार डिपो, सीमापूरी डिपो, पूर्वी विनोद नगर डिपो, नोयडा डिपो, नन्द नगरी डिपो, हसनपूर डिपो, रोहिणी डिपो, वजीरपूर डिपो, सुभाष प्लेस डिपो, जीटीके रोड डिपो, वसंत विहार डिपो, सुखदेव विहार डिपो, अम्बेडकर नगर डिपो, श्रीनिवास पूरी डिपो, तेहखंड डिपो, कालका जी डिपो, मिलेनियम पार्क डिपो, सरोजनी नगर डिपो, पीरागढ़ी डिपो, घुमनहेड़ा डिपो, नरेला डिपो, कंझावला डिपो, दिचाऊं कलां डिपो, बवाना डिपो, नांगलोई डिपो यानी सभी का कहना है कि नियम उल्लंघन हेतु पिछले पांच सालों में किसी को दंडित नहीं किया गया है और न ही कोई चालान कटा है, लेकिन यातायात विभाग के मुख्यालय से प्राप्त सूचना बताती है कि इस वर्ष यानी 2013 में 30 सितम्बर तक 3133 स्कूल बसों के चालान काटे गए हैं. वहीं 2012 में 7321, 2011 में 4876, 2010 में 809, 2009 में 1025 और 2008 में 1041 स्कूल बसों के चालान किए गए हैं.

बात यहीं खत्म नहीं होती… डीटीसी स्कूलों के साथ बसों का अग्रीमेंट करते समय खुद 28 नियम व शर्तों को स्कूलों के सामने रखती है, जिसका उल्लंघन वो खुद ही हर दिन करती हुई नज़र आती है. और इन सबके बावजूद जान पर आफत मासूमों की आती है. काश! दिल्ली के चुनावी आखाड़े में मासूमों व पारेंट्स की इन बातों को भी शामिल किया जाता.

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