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मीडिया ट्रायल और ‘अरविन्द नीति’

Amit Sinha for BeyondHeadlines

पोलिंग बूथों पर वोटरों की लंबी कतार की तस्वीरें एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है, परंतु बेहतर लोकतंत्र को प्रतिबिंबित करते इन दृश्यों का रोमांच तब काफूर हो जाता है जब यही कतार राशन-किरासन और पानी के टैंकरों के पीछे दूगनी होती दिखती है. एक दिनी रोमांच को पूरे पांच साल तक भुगतती आम अवाम लगातार ठगी गई है. ऐसे में प्रासंगिक है कि विकल्पों को तवज्जो मिले.

अब चूँकि केजरीवाल ने बतौर मुख्यमंत्री दिल्ली की सत्ता संभाल ली है और उनके मंत्रियों ने सोमवार को दिल्ली की सर्द सुबह 9:15 बजे दिल्ली सचिवालय पहुंच कर अफसरशाही को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अब आबो-हवा बदलने वाली है. सोमवार सुबह डायरिया और तेज़ बुखार के कारण अरविंद सचिवालय नहीं जा सके और उन्होने ट्वीट् करके यह जानकारी दी.

इसके बाद तो मीडिया और विरोधी कैंपों में अजीब ढंग से टिप्पणी की जाने लगी. दरअसल, केजरीवाल सोमवार को दिल्ली-वासियों के लिए मुफ्त पानी की घोषणा करने वाले थे. हालांकि केजरीवाल दिल्ली जल बोर्ड के बड़े अधिकारियों को अपने घर पर बुलाकर एक मैराथन मीटिंग की और 5 बजते-बजते घोषणा कर दी गई की. इस प्रकार केजरीवाल ने अपने पहले वादे को पूरा किया. परंतु जिस प्रकार मीडिया ने अपरिपक्वता दिखाई वह शर्मनाक है.

इसके पहले शनिवार को शपथ लेने के साथ ही छुट्टी का दिन होने के बाबजूद केजरीवाल कैबिनेट की पहली मीटिंग हूई और लाल बत्तियों पर रोक लगाने के आदेश पारित किये गये.

दिल्ली, एक ऐतिहासिक शहर है. एक राष्ट्रीय राजधानी है. मैट्रोपोलिटन सिटी है. इतिहास, राजनीति और आधुनिकता का अद्भुत संगम है दिल्ली… आजादी के बाद भारत की इस नगरी ने कई ऐतिहासिक मोड़ देखे हैं. परंतु शुरूआती दिनों से कांग्रेस ने ही यहाँ अपना आधिपत्य रखा है. हालांकि भाजपा को दिल्ली राज्य में शासन का पहला मौका 1992 में मदन लाल खुराना के रूप में मिला. परंतु 5 साल में तीन मुख्यमंत्री बदल कर विभिन्न आरोपों के बीच पार्टी ने अपनी पकड़ खो दी.

इतिहास गवाह है कि दिल्ली ने कांग्रेस और भाजपा के अलावे किसी अन्य दल को गंभीरता से नहीं लिया. अण्णा के विशुद्ध गैर-राजनैतिक आंदोलन की पृष्ठभूमि में उभरे अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने जिस मजबूती से इन दो ध्रुवों को चुनौती दी है वह दिलचस्प तो है ही, एक वृहद राजनैतिक करवट की आहट भी है.

दिल्ली चुनाव परिणामों में केजरीवाल की ताक़त मात्र सीटों के आंकड़ों में देखना समकालीन राजनैतिक मठाधीशों के लिए गंभीर गलती होगी. केजरीवाल सिर्फ राजनीति और चुनावों तक सीमित नहीं हैं. वे एक ऐसे शख्स के रूप में उभर चुके हैं जहाँ उन्होंने भ्रष्ट राजनीतिक परिदृश्यों में एक ईमानदार एवं शक्तिशाली विकल्प प्रस्तुत की है.

‘आप’ ने भारतीय राजनीति में नैतिक मानदंडो को इतना उँचा कर दिया है कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सिर्फ चार विधायकों का जुगाड़ करने से परहेज करने लगी. हालांकि केंद्र में वाजपेयी सरकार का विश्वास मत सिर्फ एक वोट से गिर जाना भाजपा के इस दावे का समर्थन करते हैं कि वह जुगाड़ में यकीन नहीं करती. परंतु झारखंड में झामुमो, यूपी में मायावती की बसपा, कर्नाटक में यदुरप्पा प्रकरण के कारण बार-बार भाजपा की छवि को नुक़सान हुआ है और सत्ता में बने रहने के उसके आकर्षण को प्रतिबिंबित करता है.

बीते 8 दिसंबर को दिल्ली चुनावों के परिणाम घोषित होने के साथ ही जो सियासी हलचल शुरू हुई वह थमने को तैयार नहीं. मीडिया में लगातार प्रश्न खड़े किये जा रहे है कि केजरीवाल ने जो लोक-लुभावन वादे जनता से किये है, वह मिथक है, अवास्तविक हैं और उन्हे ज़मीं पर नहीं उतारा जा सकता. मुख्यधारा मीडिया में पूरे महीने केजरीवाल के समर्थन या विरोध में खबरें चलती रहीं, विशेषज्ञों के पैनल उल-जूलूल काल्पनिक प्रश्नों पर फजीहत करते दिखे.

भारत की मीडिया केजरीवाल के पीछे 24*7 कुछ यूँ पड़ गयी कि अन्य सभी खबरें दम तोड़ती दिखीं. पुडूचेरी में 21 वर्षीय युवती के साथ क्रिसमस की रात दो बार बलात्कार, नांदेड एक्सप्रेस में 26 लोगों के जिंदा जलने, मुज़फ्फरनगर के राहत कैंपों पर बुलडोजर चलाये जाने जैसी खास खबरें प्रमुखता से नहीं आ पाईं. इन सबके बीच लगातार मीडिया ट्रायल के बाबजूद केजरीवाल ने अब तक इसे खुद पर हावी नहीं होने दिया है. यह एक शुभ संकेत है और आशान्वित करता है कि आम आदमी से किये गये वादे कम से कम अपने न्यूनतम रूप में ज़रूर पूरे किये जायेंगे.

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