Mango Man

जिसकी कहानी, उसी की ज़ुबानी…

ज़िंदगी भर घर वालों का यक़ीन जीतने वाली लड़की एक दिन उन्हीं से हार जाती है. ऐसी ही एक लड़की के तीखे जज़्बात जो कई सवाल छोड़ते हैं…

Farha Fatima for BeyondHeadlines

रोज़मर्रा की मामूली बातें अक्सर करती हूं, मगर इस दफ़ा दिल की गहराई से कुछ कहना है. यह एक बेटी के मन में उपजे ऐसे तल्ख़ जज़्बात हैं जिसके लिए अम्मी, डैडी और बड़ा भाई ज़िम्मेदार है.

एक लड़की पैदाइश के साथ ही अपने ऊपर थोपी जाने वाली तमाम बंदिशें साथ लेकर आती है. स्कूल, कॉलेज, ट्यूशन या फिर कहीं भी घर से बाहर निकलने की बात हो, उसे एक सख्त हिदायत माननी होती है. वक्त पर घर से निकलना और तय वक्त पर वापस आना. ज़रा-सी देरी घर में तमाम सवालों का सबब बन जाती है. सवाल इतने कि जवाब ख़त्म हो जाएं. मगर इन बंदिशों का सामना सिर्फ बेटी करती है. आख़िर उसी घर में मौजूद बेटे के लिए ऐसे क़ायदे-कानून क्यों नहीं हैं.

वह हायर एजुकेशन के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाख़िला चाहती है, मगर पढ़ाई जारी रखनी है या नहीं, यह घर वालों ने तय किया. उसकी पसंद का एक कॉलेज है, जो कि सिर्फ उस तक महदूद है. बताने की हिम्मत नहीं जुटती. घरवालों की राय में लड़की के लिए लड़कियों वाला कॉलेज होना चाहिए. मगर वह बार-बार यही सोचती कि वह अपनी ईमानदारी और अच्छाई से अपने मां-बाप का यक़ीन जीत लेगी. उनपर भरोसा पा लेगी. मगर वह ग़लत साबित हुई.

उसने मिरांडा हाउस में पढ़ाई की. कॉलेज के दोस्त पढ़ाई के साथ-साथ सैर के लिए अक्सर हिल स्टेशन जाते. वहां से आकर दिल को ठंडक पहुंचाने वाली कहानियां सुनाते. उसकी भी ख़्वाहिश हुई ऐसे ही किसी हिल स्टेशन पर जाने की. मगर कभी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि घर वालों से इसकी इजाज़त ले ले.

पढ़ाई ख़त्म हुई तो कॉलेज में बनी सबसे अच्छी दोस्त ने शिमला चलने की ज़िद की. अब तक वह 23 की उम्र पार कर चुकी थी. घर वालों को कभी किसी शिकायत का मौक़ा नहीं दिया. लिहाज़ा, ख़ुद पर यक़ीन होने लगा था कि घर वाले मना नहीं करेंगे.

बर्फ में अठखेलियां करने अरमान जाने कबसे था उसे. उसने डैडी से बेधड़क बोल दिया कि शिमला जाना है, मगर उन्होंने साफ-साफ मना कर दिया. मगर उसे झटका नहीं लगा क्योंकि डैडी तो हमेशा मना ही करते आए थे. कॉलेज हो या फिर शाम का टयूशन… बावजूद इसके, वह स्कूल, कॉलेज, टयूशन सभी जगह गई. इसी उम्मीद के साथ उसने शिमला जाने की तैयारी भी शुरू कर दी.

बहुत दिल से शॉपिंग की. रंग-बिरंगे ग्लव्ज़, कैप समेत वो तमाम ख़रीदारी की जो किसी ठंडी जगह के लिए ज़रूरी थीं. चूंकि वो पहली बार कहीं जा रही थी, तो बेहद एक्साइटेड थी. पहली बार कुछ मन का सा करने जा रही थी. खुशी का ठिकाना नहीं था. खुशी इतनी कि शायद कॉलेज के 3 सालों में भी नहीं मिली.

पैकिंग शुरु हुई. एक-एक चीज़ बड़ी सहेज कर रखी जा रही थी. हर दिन के लिए अलग रंग के कपड़े बहुत अरमानों से रखे गए. प्लानिंग यहां तक थी कि किसी भी फोटो में एक जैसा नहीं दिखना. पैकिंग के लिए कपड़े चुनते वक्त पूरे कमरे को दुकान बना दिया था. जिस सहेली के साथ जा रही थी उससे हरेक छोटी-छोटी बात शेयर होती थी. मैं ये रख रही हूं, तू वो रख ले वग़ैरह-वग़ैरह… हर बार बात के बाद हमारे कपड़ों की दोबारा पैकिंग होती. मंडी हाउस से चलने वाली बस की टिकट से लेकर शिमला में होटल की बुकिंग तक हो गई.

शिमला जाने से एक दिन पहले खुशी में रात भर नींद नहीं आई, मगर खुशी के साथ-साथ मन के किसी कोने में डर भी था. डर कुछ-कुछ वैसा ही जैसे किसी कैदी को आज़ाद होने से पहले लगता है. रात भर खुशी में सो नहीं पाई थी, फिर भी सुबह जल्दी उठ गई. सारे ज़रूरी काम दोपहर 1 बजे तक निपट गए.

जल्दी से ज़ोहर की नमाज़ भी पढ़ ली और तैयार होते-होते लगभग 4 बज गए. शाम 5:30 की बस थी सो अम्मी के पास गई. उनसे कहा कि मैं जा रही हूं.

उन्होंने हैरत भरी नज़र ने उसे देखते हुए पूछा कि क्या सचमुच जा रही है? उनका सवाल अटपटा लगा. खैर, वह हां बोलकर दरवाज़े की तरफ़ चल दी. तभी पीछे से अम्मी की आवाज़ आई कि बड़े भाई को भी बता दे. वो हां बोलकर सीढ़ियों से नीचे उतर गई. भाई नीचे खड़ा था सो उसे भी बता दिया. भाई ने भी सवाल किया कि डैडी से पूछा या नहीं? वह धीरे से हां कहकर फिर आगे बढ़ गई. बाहर आकर उसे पहली बार आज़ादी का एहसास हुआ. यह भी पता चला कि ऐसी आज़ादी मिलते वक्त इंसान सिर्फ खुश नहीं होता, बल्कि उसके मन में एक डर भी होता है.

रिक्शे पर बैठते हुए दिल जोर से धुक-धुक कर रहा था कि तभी जेब में रखे फोन पर वाइब्रेशन महसूस हुई. उसे पता था कि सहेली का ही फोन होगा. यह जानने के लिए के लिए कि कितनी देर में पहुंचेगी. मगर फोन बाहर निकालते ही तेज़ धड़कनें मानों रुक गईं. भाई फोन कर रहा था…

वह फोन उठाने से पहले ठिठकी. सोचा कि ना उठाऊं, लेकिन ऐसा नहीं कर पाई. फोन पिक करते ही पूछा हां भाई? मगर उधर से जवाब की बजाय सवाल आया. कहां पहुंची हो? रिक्शा स्टैंड के पास. वापस आजा, हम ना भेज रहे कहीं भी घूमने-घामने के लिए…

यह क्या बात होती है… इतने दिन से तैयारी कर रही हूं, अब जाते वक्त ना भेजने का सवाल क्यों? और अकेले नहीं जा रही हूं, सहेली भी साथ है. उसका ऑफिशियल टूर है. मैं आज तक कहीं नहीं गई. दिल्ली ढंग से नहीं देखी. बहुत मन से जाने की तैयारी की है, एक सांस में उसने सारे जज़्बात उड़ेल दिए.

भाई का जवाब –हमारी कोई दुशमनी नहीं है तुझसे जो मना करेंगे. बस इसलिए कह रहे हैं क्योंकि ऐसे दो-तीन दिन के लिए जाना ठीक नहीं है.

अरे छोड़ो न ये सब डैडी ने तो कह ही दिया है.

मगर वो एकदम से तैश में बोला बहुत डैडी डैडी कर रही है… साफ़-साफ़ मना कर रहे हैं वो, उन्हीं से पूछा है मैंने भी.

घूमने जाते हैं ज़रा-सी देर में क्या से क्या हो जाता है. हम तो कहीं मुंह दिखाने के लायक़ नहीं रहेंगे. तुझे घूमने जाना है चली जाना, शादी कर देंगे. 3-4 लाख रुपये हमसे लेकर सीधे स्वीडजरलैंड जाना अपने पति के साथ. 2-3 दिन क्या 2-3 महीनों के लिए चली जाना. अभी घर आ जल्दी… इतना कहकर उसने फोन कट कर दिया.

अब वह खाली हो गई थी, आखों से बेशुमार आंसू झर रहे थे. जाने से रोका, इसका ग़म कम था. आंसू इसलिए बह रहे थे क्योंकि 23 साल में कमाए गए यक़ीन पर शक जताकर उसे चकनाचूर कर दिया गया था. वह वापस आकर ग्राउंड फ्लोर के एक कोने में बैठकर टूटे भरोसे के लिए रोती रही. रोई तो वह अनगिनत बार है, पर इतनी बुरी तरह कभी नहीं. अब दोस्त का फोन आया, उसे सारी कथा सुनाई. फिर उसने भी फोन घरवालों को समझाने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन कोई टस से मस नहीं हुआ. कुल जमा बात यह कि अब वह शिमला नहीं जा रही थी.

आधे घंटे तक ग्राउंड फ्लोर पर बैठकर रोती रही. अब मां का फोन आया कि वह अभी तक कहां फंसी है, घर क्यों नहीं पहुंची? फोन उठाते ही अम्मी ने कहा कि आजा मेरा बच्चा मेरे लाल घर आजा… इतना सुनते ही उसका खून खौल गया. वजह यह थी कि अभी तक की जिंदगी में अम्मी ने कभी उसकी तरफ़ से लड़ाई नहीं लड़ी. किसी से नहीं कहा कि मेरे लाल, मेरे बच्चे को वो सबकुछ करने दो जो वो करना चाहती है. आज पहली बार बेटी के लिए इतनी मीठी बातें, वो भी उसे रोकने के लिए. पति और बेटे के खौफ़ से सहमी एक औरत की ममता जागी मगर वो भी उसके हक़ में नहीं.

ख़ैर, उस लड़की की कहानी साझा करने के पीछे सिर्फ एक मक़सद है कि कोई भी पिता, मां या भाई इसे पढ़ें तो एक बेटी का दर्द समझें. फिर किसी के साथ नाइंसाफी ना करें.

उन्हें समझना चाहिए कि एक तरफ़ बेटे बिना बताए रातों-दिन गायब रहते हैं, लेकिन कोई सवाल नहीं. मगर बेटी जिंदगी भर विश्वास दिलाए और 2 दिन जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहे तो भी मुमकिन नहीं. चुप रहने में हर अच्छाई है, लेकिन मुंह खोलते ही सारी ख़ूबियां ख़ामी बन जाती है. बेटी पैदा होने के साथ सिर्फ एक ज़िम्मेदारी का उन्हें एहसास रहता है कि कैसे भी उसकी शादी करा दी जाए. अपनी बोझ आगे की तरफ़ शिफ्ट कर दिया जाए.

ख़ैर, इस शेर के साथ बात ख़त्म होती है कि…

अब बस यही है पैग़ाम

हद-ए-अदब में ना रहा जाए…

हक़ मांगना तौहीन है

हक़ छीन लिया जाए…

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