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BeyondHeadlines > Exclusive > सिर्फ़ हज फॉर्म से हज कमिटी ऑफ इंडिया को करोड़ों की कमाई
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सिर्फ़ हज फॉर्म से हज कमिटी ऑफ इंडिया को करोड़ों की कमाई

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published August 4, 2018 22 Views
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5 Min Read
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अफ़रोज़ आलम साहिल, BeyondHeadlines

भारत में मुसलमानों और उन्हें मिलने वाली सरकारी सहूलियतों को लेकर समाज में ढे़र सारी ग़लतफ़हमियां हैं. उनमें से एक ये भी है कि भारत के मुसलमान सरकार के पैसे से हज करते हैं. इस ग़लतफ़हमी की सबसे बड़ी वजह ये है कि भारत सरकार मुसलमानों के विरोध के बावजूद उन्हें हज करने के लिए सब्सिडी देती है. हालांकि ये हज सब्सिडी इस साल ख़त्म कर दी गई है. लेकिन भारत सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी ने मीडिया के ज़रिए देश के लोगों में ये भ्रम फैलाई है कि मोदी सरकार ने हस्तक्षेप कर हज जाने के किराए में चार साल पहले के मुक़ाबले 40-45 फ़ीसद कम पर निश्चित कर दिया है. इसलिए पहली बार जहां रिकार्ड संख्या में भारत से हज यात्री जाएंगे, वहीं बहुत समय बाद उन्हें सबसे सस्ता किराया देना होगा. जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है.

हज का महीना शुरू हो चुका है. भारत के अलग-अलग हिस्सों से मुसलमान हज के लिए जाने लगे हैं. BeyondHeadlines की कोशिश है कि इस सीरीज़ के ज़रिए अपने पाठकों तक हज से जुड़े सटीक तथ्य पहुंचाए.

हज पर जाने के इच्छुक व्यक्ति प्रक्रिया की शुरुआत फॉर्म भरने से करते हैं. हर साल हज के लिए जब आवेदन फॉर्म निकलता है तो इस बात को प्रचारित किया जाता है कि आवेदन फ्री है. लेकिन हमने अपने पड़ताल में पाया कि आवेदन निशुल्क नहीं होता. आवेदन फॉर्म भले ही मुफ़्त में मिलता हो, लेकिन मुसलमानों को प्रत्येक आवेदन पर 300 रूपये का शुल्क देना पड़ता है.

हज कमिटी ऑफ़ इंडिया के सीईओ डॉ. मक़सूद अहमद खान का कहना है कि, ये 300 रूपये प्रोसेसिंग फ़ीस होती है, जिसे सबसे लिया जाता है. इस प्रोसेसिंग फ़ीस को वापस नहीं किया जा सकता, भले ही आपका नंबर ड्रॉ में निकले या नहीं.

हज कमिटी ऑफ इंडिया के सीईओ डॉ. मक़सूद अहमद खान BeyondHeadlines के साथ बातचीत में बताते हैं कि हर साल हज कमिटी ऑफ़ इंडिया फॉर्म व गाईडलाइंस छपवाती है. फिर हम इन फॉर्मों को कोरियर के ज़रिए बाक़ी राज्यों को भेजते हैं. इस काम को करने में हज कमिटी को काफ़ी मेहनत लगती है. ये रक़म इन्हीं कामों पर खर्च होती है.

वो आगे बताते हैं कि, यहां तक हज के नोटिफिकेशन का तमाम अख़बारों में विज्ञापन भी प्रकाशित करवाना होता है. ये काम भी हाजियों के इन्हीं पैसों से होता है. हज कमिटी को कोई पांच पैसा भी नहीं देता है.

डॉ. मक़सूद अहमद खान ये भी बताते हैं कि, हद तो ये है कि कहीं-कहीं अख़बारों में हमें विज्ञापन के लिए सरकारी रेट से अधिक देना पड़ता है यानी हमें सरकारी रेट भी नहीं मिलता है.

बताते चलें कि हज के लिए आवेदन ऑनलाईन कर दिया गया है, लेकिन हज कमिटी ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़ अभी भी लोग भारी संख्या में ऑफ़लाईन फॉर्म ही भरते हैं.

अब यदि सरकारी आंकड़ों की बात करें तो इस साल हज पर जाने के लिए भारतीय हज समिति में कुल 3,56,950 आवेदन प्राप्त हुए. इनमें 1,73,400 लोगों ने ऑफ़लाईन फॉर्म भरा है, बाक़ी लोगों ने ऑनलाईन फॉर्म का इस्तेमाल किया है. बता दें कि इन तमाम आवेदनों से कुल 10 करोड़ 07 लाख 85 हज़ार रूपये हज कमिटी ऑफ़ इंडिया के खाते में आए हैं. वहीं पिछले साल हज पर जाने के लिए कुल 4,48,266 आवेदन प्राप्त हुए थे और इनसे कुल 13 करोड़ 44 लाख 79 हज़ार 800 रूपये हज कमिटी ऑफ़ इंडिया को हासिल हुए.

स्पष्ट रहे कि इस साल भारत से कुल 1,75,025 लोग हज पर जाएंगे. इसमें 1,28,702 लोग हज कमिटी ऑफ़ इंडिया के माध्यम से जाएंगे. इनमें भी वीआईपी के लिए 500 सरकारी कोटा, ख़ादिमूल हुज्जाज के लिए 625 और मेहरम के लिए 200 सीट का कोटा रिजर्व है. बाक़ी लोग प्राईवेट टूर ऑपरेटर्स के ज़रिए हज के लिए जाते हैं.

नोट : BeyondHeadlines हज को लेकर अपना एक ख़ास सीरीज़ आगे भी जारी रखेगा. अगर आप भी हज करने का ये फ़र्ज़ अदा कर चुके हैं और अपना कोई भी एक्सपीरियंस हमसे शेयर करना चाहते हैं तो आप afroz.alam.sahil@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं. हम चाहते हैं कि आपकी कहानियों व तजुर्बों को अपने पाठकों तक पहुंचाए ताकि वो भी इन सच्चाईयों से रूबरू हो सकें.

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