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Reading: Ghoul: एक ‘एंटी नेशनल’ भूत
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BeyondHeadlines > Entertainment > Ghoul: एक ‘एंटी नेशनल’ भूत
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Ghoul: एक ‘एंटी नेशनल’ भूत

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published September 3, 2018 24 Views
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13 Min Read
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By Abdullah Mansoor

‘देशभक्ति हमारा आख़िरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकता, मेरा आश्रय मानवता है. मैं हीरे के दाम में ग्लास नहीं खरीदूंगा और जब तक मैं ज़िन्दा हूं, मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा.’ — रविंद्रनाथ टैगोर

अरबी दास्तानों में एक राक्षस/जिन्न्न के बारे में ज़िक्र है जो इंसानों की रूह के बदले उनका कोई काम कर देता है. इस राक्षस का नाम “Ghoul” है. इसी राक्षस के नाम पर Netfilix ने एक हॉरर सीरीज़ बनाई है, जो मात्र 3 एपिसोड की है. जिसे Patrick Graham ने निर्देशित किया है.

Ghoul एक राक्षस है, जिसे मेटाफ़र की तरह इस्तेमाल किया गया है, क्योंकि इस कहानी में मौजूद ज़्यादातर इंसान राक्षस ही हैं. Ghoul उनके अंदर के राक्षस से उनका और हमारा सामना कराता है और उन्हें ज़िंदा चबा जाता है.

“रिवेल दियर गिल्ट, इट दियर फ़्लैश” प्रत्यक्ष में Ghoul की कहानी जितनी भूतिया और काल्पनिक नज़र आती है, परोक्ष में उतनी ही यथार्त और प्रसांगिक है.

आगे बढ़ने से पहले मैं बता दूं कि जिसने भी ये सीरीज़ नहीं देखी है, वह आगे की समीक्षा न पढ़ें, क्योंकि इसमें बहुत से spoilers आएंगे.

Ghoul की कहानी शुरू होती है निकट भविष्य से (जो हमारा वर्तमान है) जहां हमारे बुरे सपने यथार्त बन चुके हैं. किताबें पढ़ना देशद्रोह है, सवाल करना देशद्रोह है, मानवाधिकार की बात करना देशद्रोह है. हमें बताया जा रहा है कि क्या खाना है और क्या नहीं. हम क्या देख सकते हैं और क्या नहीं, हम क्या बोल सकते है और क्या नहीं. क्लास रूम में जहां कैमरे लगे हों, लोगों को देशद्रोही बोलकर उनके घरों से उठा लिया जाता हो.

राष्ट्रवाद का चरम रूप हमारे सामने है. ऐसे में एक राष्ट्र-भक्त मुस्लिम लड़की निदा रहीम (राधिका आप्टे) अपने प्रोफ़ेसर अब्बू शाहनवाज़ रहीम को सिर्फ़ इसलिए सेना के हवाले कर देती है क्योंकि वह कुछ ऐसी किताब पढ़ रहे थे जो सरकारी निसाब में शामिल नहीं थी और लोगों को सवाल पूछने के लिए उकसाते रहते थे.

क्या ये सुनकर आप को ‘बिनायक सेन’ की याद नहीं आ रही है जिन्हें इसलिए पकड़ा गया कि उनके पास कुछ किताबें थी, जिन किताबों पर नक्सल किताब होने का आरोप था.

अभी हाल में पकड़े गए मानवाधिकार कार्यकर्ता क्या इसी श्रेणी में नहीं गिने जाएंगे? ऐसा नहीं है कि बोलने पर पाबन्दी है जो सत्ता के पक्ष में है वह कुछ बोल सकता, कुछ भी कर सकता है यहां तक कि लोगों को मार भी सकता है.

निदा रहीम को लगता है कि सेना उसके अब्बू का माईंड वाश करके दुबारा उन्हें “अच्छा नागरिक” बना देगी. ऐसा नागरिक जो सत्ता से सवाल नहीं करता. राष्ट्रवाद के नाम पर हर अपराध हर गुनाह को माफ़ कर देता है.

इसी दौरान एक खूंखार आतंकवादी ‘अली सईद’ (महेश बलराज) सेना द्वारा पकड़ा जाता है. सेना उसे पूछताछ के लिए ‘मेघदूत – 31’ नाम का एक एडवांस इंट्रोगेशन सेंटर ले जाती है. ये सेंटर कभी परमाणु हमले से बचने के लिए बनाया गया होता है.

इधर निदा रहीम सेना की एक ‘उच्च स्तरीय इंट्रोगेशन यूनिट’ में ट्रेनिंग ले रही होती है. निदा रहीम को उसकी ट्रेंनिग ख़त्म होने से पांच हफ़्ते पहले ही इस सेंटर में बुला लिया जाता है. इस सेंटर में 5 क़ैदी और 12 स्टाफ़ मेंबर्स हैं. इस स्टाफ़ का हेड सुनील डाकुन्हा (मानव कौल) हैं. सेंटर में पहुंचने के बाद एक इंट्रोगेटर, लक्ष्मी (रत्नाबली भट्टाचार्जी) निदा से सवाल करती है कि ‘तुम यहां कम्फर्टेबल तो हो न, वह क्या है कि यहां आने वाले सभी आतंकवादी तुम्हारे ही धर्म से हैं?’

लक्ष्मी का ये सवाल भारत में ख़ुफ़िया एजेंसियों की मानसिकता को दिखाता है. यूं ही ये सवाल नहीं पूछा जाता है. बृजेश सिंह ने 5 सितम्बर, 2014 को ‘तहलका’ में ‘भारतीय खुफिया संस्थाएं’ नाम से एक रिपोर्ट की थी, जिसमें वो लिखते हैं —“रॉ और एसपीजी की तरह ही एनटीआरओ (नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन) ने भी किसी मुस्लिम अधिकारी को अपने यहां नियुक्ति नहीं किया.”

वो आगे लिखते हैं कि कुछ ऐसा ही हाल मिलिट्री इंटेलीजेंस (एमआई) का भी है. एमआई के एक अधिकारी कहते हैं, ‘अभी इसमें कुछ नहीं किया जा सकता क्योंकि सालों से चले आने के कारण ये चीज़ें परंपरा के रूप में स्थापित हो चुकी हैं. इसमें किसी को कुछ अजीब नहीं लगता.’

मीडिया से बातचीत में इसको कुछ और स्पष्ट करते हुए रॉ के पूर्व विशेष सचिव अमर भूषण कहते हैं, ‘मुस्लिमों को संवेदनशील और सामरिक जगहों से बाहर रखने का एक सोचा-समझा प्रयास किया जाता है. समुदाय को लेकर एक पूर्वाग्रह बना हुआ है.’

रिटायर्ड वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी एस.आर. दारापुरी भी कहते हैं, ‘इन संस्थाओं में बंटवारे के बाद से ही एक सांप्रदायिक पूर्वाग्रह बना हुआ है. उनकी (मुस्लिमों की) देशभक्ति पर ये एजेंसियां संदेह करती हैं.’

‘मेघदूत – 31’ नाम के इस एडवांस इंट्रोगेशन सेन्टर में मौजूद सभी इसी सोच के हैं. जिनकी नज़र में अल्पसंख्यक होना गद्दार होना है. निदा रहीम को भी यहां इसलिए बुलाया जाता है कि उन्हें शक है कि निदा रहीम और अल सईद के बीच कोई संबंध है, पर सबूत के अभाव में वह सीधे निदा को आरोपी नहीं बनाना चाहते हैं.

निदा रहीम को इंट्रोगेशन सेन्टर घूमते हुए ये अहसास हो जाता है कि ये सेंटर अमानवीयता की चरम प्रकाष्ठाहै. जैसा कि Guantanamo Bay detention camp में था या शायद उससे भी बुरा.

वह अभी कुछ और सोचती या बोलती उससे पहले ही उसके स्टाफ़ हेड सुनील डाकुन्हा कहते हैं कि ‘यहां पर तुम सब सुरक्षा भी कर रहे हो और न्याय भी‘ अर्थात देश की रक्षा के नाम पर तुम किसी को पकड़ भी सकते हो और मार भी सकते हो बिना उसका पक्ष सुने. कितनी ख़तरनाक कल्पना है ये जब सेना सुरक्षा के साथ न्याय भी करने लगे. पर ये मात्र कल्पना नहीं है, वास्तविक संसार में हम इसके कई उदाहरण पाते हैं.

नाज़ीवाद और फांसीवाद का दौर अभी बहुत पुराना नहीं हुआ जब सेना न्याय भी करती थी. लाखों यहूदियों का नर-संहार हमें याद है. अभी पिछली साल ही म्यांमार के सैनिक तानाशाहों ने रोहिंगिया मुसलमानों का नरसंहार किया था. इसके बावजूद भी जब हम ये कहते हैं कि सेना के कार्यों पर सवाल नहीं किया जा सकता तो दरसल हम सेना को निरंकुश बनाने की बात कर रहे होते हैं.

ये इतिहास रहा है कि सेना जब भी जहां भी निरंकुश हुई है, वह अमानवीय बन गई है. यहां बात हम किसी देश विशेष की सेना की नहीं कर रहे, बल्कि एक संस्था के रूप में सेना की प्रकृति के बारे में बात कर रहे हैं.

मेघदूत –31 में भी सेना का वही अमानवीय चेहरा नज़र आता है. यहां एक क़ैदी को तीन हफ़्तों से ज़्यादा नहीं रखा जाता. नहीं-नहीं उन्हें छोड़ा नहीं जाता बल्कि मार दिया जाता है. मेघदूत – 31 में एक क़ैदी है ‘अहमद’ जिससे सच उगलवाने के लिए उसकी  बीवी बच्चों को उसके सामने गोली मार दी जाती है और इन सैनिकों को अफ़सोस नहीं है, क्योंकि इनका मनना है कि मुसलमानों की नस्लें ही ख़राब है.

यहाँ आप ‘शौर्य’ फिल्म के ब्रिगेडियर (के.के. मेनन) को याद करिए वह भी यही कहता है कि “मैंने अपने कमांडर से कहा जो भी बूढ़े, बच्चे, जवान मिले मार दो उन्हें. मुसलमानों के खून में ही ख़राबी है और मै देश की रक्षा के लिए इनकी पूरी नस्लें साफ़ कर रहा हूं.”

सिर्फ़ मुसलमानों की बात नहीं है. आप ने ‘सोनी सूरी’ के बारे में पढ़ा होगा कि कैसे उनके गुप्तांगों में पत्थर ठूंस दिए गए राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर. हमने ये भी देखा है कि कैसे भारतीय माँओं ने नंगे होकर सेना के सामने प्रदर्शन किया ‘Indian Army, Rape Us’ के नारों के साथ. कश्मीर की ‘आधी बेवाओं’ के बारे में हम जानते हैं जिनके शौहर लापता हो गए.

Ghoul की कहानी आगे बढ़ती है तो हमें पता चलता है कि Ghoul को निदा रहीम के अब्बू ही बुलाए होते हैं, ताकि वह निदा को कुछ दिखा सकें. कुछ सीखा सकें, जिसे निदा राष्ट्रवादी चश्मा लगाकर न देख पा रही है और न सीख पा रही है.

जैसे हैमलेट में पिता का प्रेत आता है. हैमलेट को सन्देश देने, हैदर में रुहदार (इरफ़ान खान) हैदर (शाहीद कपूर) को सन्देश देने तो Ghoul में राक्षस निदा को उसके अब्बू का सन्देश देने आता है और राष्ट्रवाद और अंधराष्ट्रवाद के बीच फ़र्क़ को समझाता है.

निदा Ghoul द्वारा दिए गए सन्देश को समझती है. अंत में जब निदा रहीम ‘मेघदूत –31′ में होने वाली गैर-क़ानूनी गतिविधियों के बारे में बताती है तो उसके सीनियर उसकी बात नहीं सुनते और कहते हैं ‘मेघदूत –31′ में कुछ ग़लत था तो वह तुम थी. फिर सवाल करते हैं निदा से “अब क्या करोगी तुम? पूरे स्टेट से लड़ेगी?”

ये सीरीज़ बस यहीं संकीर्ण राष्ट्रवाद पर समाप्त हो जाती है, जहां राष्ट्रवाद जनित संकीर्णता मानव की प्राकृतिक स्वच्छंदता एवं आध्यात्मिक विकास के मार्ग में बाधा.

यही वजह है कि टैगोर राष्ट्रवाद को पसंद नहीं करते थे. रवीन्द्रनाथ टैगोर लिखते हैं —“राष्ट्रवाद को युद्धोन्मादवर्धक एवं समाजविरोधी हैं, क्योंकि राष्ट्रवाद के नाम पर राज्य शक्ति का अनियंत्रित प्रयोग अनेक अपराधों को जन्म देता है.”

Ghoul अलग-अलग तरह के डर का सामना करता है. हमसे  पर आपको महसूस होता है कि सिर्फ़ 3 एपिसोड में सीरीज़ अपनी कहानी के साथ इन्साफ़ नहीं करती. बहुत से किरदार पूरी तरह खुल नहीं पाते. बहुत सी बातें बताकर बस आगे बढ़ गए हैं जैसे अहमद के बीवी-बच्चों का क़त्ल नहीं दिखाया. निदा के अब्बू की यातना नहीं दिखाई.

वैसे अभिनय की दृष्टि से सभी ने बहुत अच्छा काम किया है. मानव कौल, रत्नावली भट्टाचार्जी, महेश बलराज, राधिका आप्टे अपने-अपने किरदारों में बेहद सहज हैं. फिल्म का ट्रीटमेंट डार्क है और इसमें किसी भी तरह की अश्लीलता या फूहड़ जोक नहीं डाला गया है, जैसा कि डरावनी फ़िल्मों के साथ किया जाता है.

इसमें डर दिखाने के लिए फनी ट्रिक्स और इफेक्ट्स का इस्तेमाल नहीं किया गया है. फिल्म का ट्रीटमेंट पूरी तरह डार्क है जो आपके दिमाग़ में गहराई तक घुस जाती है. ये इस सीरीज़ की सबसे ख़ास बात है. हम उम्मीद करते हैं कि आने वाला सीज़न मिनी सीरीज़ का न हो ताकि कहानी में आने वाले ट्विस्ट एंड टर्न्स शुरू होते ही ख़त्म न हो जाएं…

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