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BeyondHeadlines > India > नोएडा के ‘शिमला’ हो जाने के जश्न के पीछे एक बवंडर की भयावह कहानी
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नोएडा के ‘शिमला’ हो जाने के जश्न के पीछे एक बवंडर की भयावह कहानी

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published February 11, 2019 14 Views
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10 Min Read
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Md Umar Ashraf & Syed Ejazul Haque for BeyondHeadlines 

ग्रेटर नोएडा के अलीवर्दीपुर में क्षतिग्रस्त हुए 150 मकानों में एक साथ क़रीब एक हज़ार लोग बेघर हुए. उन्हीं बेघरों में एक दिलासाराम भी हैं. लेकिन इन्हें अब तक कोई दिलासा देने भी नहीं पहुंचा है. 

बता दें कि ये घटना उस वक़्त की है कि जब दिल्ली-एनसीआर के लोग नोएडा में ‘शिमला’ होने का मज़ा ले रहे थे. यहां हुए ओलावृष्टि ने इस इलाक़े को किसी हिल स्टेशन जैसी तस्वीर में बदल दिया था. 

राष्ट्र की राजधानी दिल्ली से सटे होने के बावजूद इस आपदा की ख़बर को दिल्ली पहुंचने में दो दिन लग गए. शनिवार की सुबह हम ग्राऊंड पर पहुंचे. दिल्ली से यहां पहुंचने में हमें तक़रीबन तीन घंटे लग गए. आम लोगों को अलीवर्दीपुर कहां है, पता ही नहीं… 

गुगल मैप की मदद से जब हम अलीवर्दीपुर पहुंचे तो पता चला कि अब अलीवर्दीपुर दो हिस्सों में बंट चुका है. न्यू अलीवर्दीपुर और अोल्ड अलीवर्दीपुर और ओलावृष्टि का सबसे अधिक नुक़सान ओल्ड अलीवर्दीपुर को उठाना पड़ा है. हमें अोल्ड अलीवर्दीपुर जाना था. बांध पर बनी सड़क जिसे पुश्ता रोड के नाम से जानते हैं, अपने जर्जर स्थिती में थी. 

बताते चलें कि अलीवर्दीपुर पहले इसी पुश्ता रोड के दोनों ओर बसा था; पर 1977 में आए भीषण बाढ़ के कारण यहां के लोगों को पलायन करना पड़ा और कुछ दिन बाद ये गांव सिमट कर रोड के एक किनारे रह गया, जो अब ओल्ड अलीवर्दीपुर है. 

हम कई किलोमीटर पैदल लोगों से रास्ता पूछकर चलते रहे. काफ़ी देर चलने के बाद हम अोल्ड अलीवर्दीपुर गांव में थे. यहां पहुंचने पर हमने पाया कि लोग गिरी हुई दीवारों से ईंटे निकाल कर एक जगह इकट्ठा कर रहे हैं. 

जैसे ही हमने पूछा कि क्या हुआ? एक साथ कई आवाज़ आई कि —‘हम तो बर्बाद हो गए. मज़दूर आदमी हैं, मज़दूरी करते हैं, दो-दो पैसा जोड़कर घर बनाया और बवंडर ने हमारा सब कुछ छीन लिया.’ 

हमने पूछा —बवंडर? यहां तो नुक़सान ओलावृष्टि से हुआ है न? तब जवाब मिला, नहीं! यहां शाम 7:30 के आस-पास कुछ सेकंड का बवंडर आया था जिस कारण सारे घर टूट गए. लोगों के ऊपर दिवार गिर गई और लोग घायल हो गए.

लोगों की बात सुनने के बाद अब समय था जायज़ा लेने का. पूरा गांव हमारे साथ चल रहा था. सबका यही कहना था कि सर! हमारा घर देख लीजिए. सर! हमारा खटाल देख लीजिए. हम जैसे-जैसे गांव के अंदर जा रहे थे, बर्बादी का एक भयावह नज़ारा हमारे सामने था. दर्जनों बिजली के खंभे गिरे पड़े थे. कई दर्जन मकान पूरी तरह ज़मींदोज़ हो चुके थे. सिमेंट से बने मकान की अधिकतर दीवार गिर चुकी हैं. यहां की मस्जिद टूट चुकी है. मदरसा खंडहर में बदल चुका है. ये वो नज़ारा था जिसकी उम्मीद हमने नहीं की थी. 

इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी कोई सरकारी अधिकारी हमें मौक़े पर नहीं दिखा. प्राथमिक ईलाज के नाम पर लोगों को अस्पताल में ले जाकर छोड़ दिया गया; जहां पैसे की कमी के कारण कई लोग प्राथमिक ईलाज करवाकर ही वापस आ गए. लोगों के अनुसार हादसे के तीन घंटे बाद ऐम्बुलेंस मौक़े पर पहुंची.

हम कई लोगों से मिले जिनके सर, हाथ या पैर पर पट्टी लगी हुई है. बड़ी तादाद में महिलाओं को चोट आई थी, पर पर्दा-प्रथा के कारण वो सामने नहीं आ रही थीं. बावजूद इसके हमने कुछ महिलाओं से बात की. जो कहानी उनसे सुनने को मिली वह और भी भयावह है.

शमा परवीन गर्भवती हैं. उनके ऊपर दीवार गिर गई थी. काफ़ी चोट लगी. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, पर पैसे की कमी के कारण पूरा इलाज नहीं हो पाया. उनके पति मज़दूरी करते हैं, पर वो भी अभी बुरी तरह घायल हैं. इनके मुताबिक़ कोई भी सरकारी या ग़ैर-सरकारी नुमाईंदा उनकी मदद के लिए नहीं आया.

पट्टे पर ज़मीन लेकर खेती करने वाले वीर सिंह अपनी पत्नी के साथ खेत में खड़े हैं. डबडबाई हुई आखों के साथ बोलते हैं, पूरी खेती बर्बाद हो गई. 50 हज़ार का नगद नुक़सान हुआ है.

बोरिंग के लिए खुदाई करने वाले मुंशीराम बुरी तरह घायल हैं. सर में काफ़ी चोट लगी है. उनके मुंह से आवाज़ तक नहीं निकल रही है. उनके साथी ने बताया कि एक निजी अस्पताल ने उनके इलाज के बदले लाखों रुपये की मांग कर डाली, जिस कारण उन्हें अस्पताल से छुट्टी लेनी पड़ी.

अहसान अली के पास 20 से अधिक भैंसे हैं. पर छत के गिर जाने के कारण उनकी सभी भैंसे अभी घायल हैं. इसके इलावा उनके घर के 6 लोग भी घायल हुए हैं. वो निहायत ही गुस्से में कहते हैं कि, वोट लेने तो सब आ जाते हैं, पर जब हमें उनकी ज़रुरत है तो वो हमारा चेहरा देखने तक नहीं आते हैं.

सजमा ख़ातून 45 साल की हैं. उनके ऊपर भी दीवार गिर गई थी. अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन पैसे की कमी के कारण वापस आना पड़ा. ऐसी ही कहानी हर घायल की है. 

राजू राव की माताजी के ऊपर भी दीवार गिर गई. जिस कारण अब वो बिस्तर पर हैं. ठीक उनके सटे हुए मकान में रह रहे उस्मान अभी बोलने की हालत में नहीं हैं. छत गिरने के कारण उनकी गर्दन टूट चुकी है. अस्पताल में भर्ती कराया गया; पर पैसे की कमी के कारण उन्हें भी वापस घर आना पड़ा.

तबारक अली मज़दूर हैं. मज़दूरी से उनका जीवन चलता है. पर घर टूट जाने की वजह से वो काम पर नहीं जा पा रहे हैं. खाने के नाम पर सिर्फ़ प्रशासन द्वारा डीलर की मदद से मुहैया कराया पांच किलो चावल है. 

पेशे से राजमिस्त्री रघुनाथ हमें अपने घर ले जाते हैं. जिसे देखने के बाद लगता ही नहीं है कि वो कभी घर था. पूरा घर मलबे में बदल चुका है. उनके भाई की पत्नी रेखा देवी कहती हैं, नुक़सान बहुत हो गया है, पर कोई मदद को आगे नहीं आ रहा है.

यहां मस्जिद के साथ एक मदरसा भी चलता है, जिसमें 12 बच्चे 4 मौलवियों की निगरानी में रह कर पढ़ाई करते हैं. इनमें से चार बच्चे दीवार की चपेट में आकर घायल हो चुके हैं. साथ ही एक मौलवी मोहम्मद मिन्हाज उल हक़ को भी काफ़ी चोट आई है. उनके अनुसार जब वो पुलिस अधिक्षक से मिलने उनके दफ़्तर गए तो उन्हें यह कहकर वापस कर दिया गया कि साहब अभी नहीं हैं.

हालात का अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि यहां तीन दिन से बिजली नहीं है. आधा दर्जन से अधिक बिजली का खंभा तार सहित गिर चुका है. फ़रमान अली बताते हैं कि अब पूरा गांव रात के समय मोमबत्ती के सहारे रह रहा है.

रजनी के सर पर दीवार गिर गई थी. वो बोलने की हालत में नहीं है. पूरा चेहरा ख़ून जम जाने के कारण काला पड़ गया है. वहीं जहांगीर कहते हैं कि ऊपर वाले की मेहरबानी से उनके परिवार में किसी को चोट नहीं आई है, पर मकान पूरी तरह टूट चुका है. सब्ज़ी बेचकर अपना गुज़ारा करने वाले शोना दास का मकान भी इसी तरह बर्बाद हो चुका है.

कोटक बैंक में काम करने वाले अंकुर कहते हैं कि 19 सेकंड में उनके दो तल्ले मकान का नक़्शा बिगड़ गया और उनकी माताजी को काफ़ी चोट भी आई है.

इन लोगों की प्रशासन से बहुत शिकायते हैं. नाम नहीं बताने के शर्त पर एक शख़्स हमें बताता है कि इस जगह पर भू-माफ़ियाओं की नज़र है और कुछ रिपोर्ट में इस जगह को अनाधिकृत  बताया गया है. जिस कारण प्रशासन यहां के लोगों की मदद नहीं कर रहा है.

वहीं थाना ईकोटेक-3 की एसएचओ अनीता चौहान बताती हैं कि शुरु से ही हम गांव वालों की मदद कर रहे हैं. पुलिस की संख्या कम होने के कारण हम लगातार वहां डेरा नहीं डाल पा रहे हैं. पर बेघर हुए लोगों के रात बिताने के लिए नज़दीकी स्कूल में व्यवस्था कराई गई है और एसडीएम साहब ने एक-एक घर वालों का लिखित नाम लिया है. मुआवज़े की कार्रवाई चल रही है.

लेकिन हमारे साथ स्थानीय फ़रमान अली ने जब एसएचओ को बताया कि वहां ठहरने की उचित व्यावस्था नहीं है, तब आनन-फ़ानन में एसएचओ साहिबा की तरफ़ से प्राथमिक मदद के रूप में पचास कम्बलों की व्यवस्था की गई.

(लेखक heritagetimes.in वेबसाईट चलाते हैं और विभिन्न मुद्दों पर लगातार लिखते रहे हैं.)

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