Edit/Op-Ed

चीन कब हमें बराबर की ताक़त मानना शुरू करेगा?

Rajiv Sharma for BeyondHeadlines

भाजपा की मोदी सरकार विदेश नीति के मोर्चे पर हमेशा अपनी पीठ बार-बार थपथपाती नज़र आई है. हालांकि हमारे पड़ोस में चीन और पाकिस्तान की दो दीवारें अभी भी वैसी की वैसी ही तनी खड़ी हैं. 

ज़ाहिर है कि सबसे बड़ी चुनौतियां भी यही हैं. देश के आस-पास का भूगोल ऐसा है कि इनका इसी तरह बना रहना भी तय है यानी सरकार चाहे जो रहे, उसे इन्हें इसी तरह झेलना होगा. इनमें से पाकिस्तान को झेलना तो एक तरह की मजबूरी है, लेकिन चीन का नकारात्मक शिकंजा किसी तरह टूटता दिखाई नहीं दे रहा. 

चीन के साथ पिछले दो दशक हमने यह दुआ करते हुए ही गवाएं हैं कि किसी न किसी तरह चीन की बर्फ़ पिघलेगी और दुनिया की दो सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं जल्द से जल्द विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आ खड़ी होंगी. लेकिन पूरे भारत और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूरा ज़ोर लगाने के बावजूद हालात जस के तस हैं. 

हालांकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दावा है कि हमने दूसरे देशों को आंखों में आंखें डालकर बात करना सिखाया है और फिर भी डोकलाम में 70 दिनों तक दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी रहीं. अब सवाल यह है कि मौजूदा मोदी सरकार की तरह क्या आने वाली सरकार भी इन मुक़ामों और बदलावों को आगे बढ़ाएंगी या उसी पुराने ढर्रे पर लौट जाएंगी? 

अब तक होता यही आया है कि सरकारें तो बदलती रही हैं, लेकिन भारत ने कभी अपनी विदेश नीति को बदलते नहीं देखा. इस बार मोदी सरकार तो बदलाव की बात कहती है, लेकिन उसे अभी ज़मीन पर उतरना बाक़ी है.

विदेश संबंधों को लेकर प्रधानमंत्री ने स्वयं काफ़ी मेहनत की है और एशिया, मध्य पूर्व, अफ़्रीक़ा से लेकर अमेरिकी तटों तक दोस्त तलाशने की क़वायद को हल्का नहीं पड़ने दिया. हिंद प्रशांत क्षेत्र में भारत ने आसियान पर नज़रें गढ़ाए रखकर अपने छोटे मित्र राष्ट्रों को लगातार इस बारे में आगाह किया है कि कहीं वे चीन के पैसे की चकाचौंध में फंसकर उसके उपनिवेश न बन जाएं. 

ज़ाहिर है कि ये छोटे-छोटे देश चीनी ख़तरे को लेकर हमेशा भारत की ओर देखते हैं और भारत को न सिर्फ़ उनकी चिंताओं को समझते रहना होगा, बल्कि संकट की किसी घड़ी के लिए उन्हें आश्वस्त भी करना होगा. चीन अपने फ़ायदों को ध्यान में रखकर हमारे छोटे पड़ोसी देशों नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव आदि में भारी निवेश कर रहा है. 

इसकी काट भारत को दोनों तरह से करनी होगी, उन देशों को आर्थिक तौर पर ग़ुलाम न बनने के लिए आगाह करके और साथ ही इन देशों को ज़रूरी आर्थिक मदद देकर. हाल ही में भारत की चिंता पर श्रीलंका के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया है कि उनके बंदरगाह हंबनटोटा का संचालन और सुरक्षा अभी भी उनके देश के हाथों में है, किसी चीन जैसे दूसरे देश के हाथ में नहीं.

विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि दुनिया की अकेली महाशक्ति अमेरिका के साथ देश के संबंघों को उन्होंने एक नए मुक़ाम तक पहुंचाया है. विज्ञान और रक्षा के क्षेत्र में अब दोनों देशों के सहयोग संबंधों ने एक नई ऊंचाई को छुआ है. हालांकि भारत आज भी अपना 60 फ़ीसदी रक्षा साजो-सामान रूस से ही खरीदता है, लेकिन अब अमेरिका और इज़राइल से ख़रीददारी में भारी इज़ाफ़ा हुआ है. इससे भारत और अमेरिका के संबंधों ने एक नया आयाम हासिल कर लिया है. हालांकि ये रिश्ते बराक ओबामा के कार्यकाल में ही नए मुक़ाम तक पहुंच गए थे जब ओबामा गणतंत्र दिवस पर भारत के मेहमान बने थे, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में इन्होंने और बड़ा मुक़ाम हासिल किया है. 

यही वजह है कि चीन से निपटने के लिए अमेरिका, भारत, जापान और आॅस्ट्रेलिया को मिलाकर अमेरिका की अगुवाई में एक चतुष्कोणीय संबंध विकसित किया गया है. ज़ाहिर है कि इसमें वन बेल्ट वन रोड जैसी ख़तरनाक योजना पर काम कर रहे चीन से बढ़ती सुरक्षा चिंताओं का ही सबसे बड़ा हाथ है.

यहां भारत की मुश्किल और चिंता सिर्फ़ इतनी है कि बराक ओबामा सारी दुनिया के प्रति अपनी महाशक्ति के दायित्व को समझते थे और उसे ध्यान में रखकर ही अमेरिका की नीतियां तय होती थीं, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप बहुत ज्यादा स्व-केंद्रित हैं. उनके लिए अमेरिकी हित ही सबसे ऊपर है. इसलिए वे कब किधर पलटी मार जाएंगे, इसे समझना आसान नहीं है. 

जैसे उनकी मैक्सिको के बोर्डर पर दीवार बनाने की जिद ने अमेरिका में शट डाउन जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी. वे अमेरिका में अप्रवासियों को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं. उन्होंने न सिर्फ़ जी-20 समिट से खुद को अलग किया, बल्कि क्लाइमेट समिट से भी कन्नी काट ली. इसलिए वे कब किधर खड़े हो जाएंगे, इस बारे में पूर्वानुमान लगाना आसान नहीं है. उन्होंने भारत के कई बड़े मित्र देशों पर कड़े प्रतिबंध लगाकर भी भारत के लिए नई मुश्किलें खड़ी की. 

ट्रम्प प्रशासन के रूस पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के कारण भारत का उससे बड़े हथियार खरीदना क़रीब-क़रीब नामुमकिन हो गया था, लेकिन जब ट्रम्प प्रशासन को भारत ने यह साफ़ शब्दों में बता दिया कि भारत किसी भी क़ीमत पर रूस से एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदेगा ही, तब डोनाल्ड ट्रम्प के सहायकों ने इन प्रतिबंधों में से भारत के लिए नया रास्ता निकालते हुए उसे ख़ास छूट प्रदान की और भारत ने रूस से 40 हज़ार करोड़ रुपए की लागत वाला एयर बेलेस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदा. 

कुछ ऐसा ही मामला ईरान पर प्रतिबंधों का है. भारत ईरान से दूसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है. यहां भी भारत ने विशेष छूट का इस्तेमाल किया और ईरान से तेल आयात करना बंद नहीं किया. लेकिन इसके बाद हालात और बिगड़ गए. अमेरिका ने ईरान के रेवल्यूशनरी गार्ड्स को आतंकी संगठन घोषित कर दिया. जवाब में ईरान ने भी अमेरिका के सैन्य संगठन के आतंकी संगठन होने का ऐलान कर दिया. 

यहां यह याद रखना ज़रूरी है कि ईरान की समस्या को समाप्त करने के लिए बराक ओबामा के समय में कुछ बड़े पश्चिमी देशों ने मिलकर ईरान के साथ परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए थे, जिससे यह मसला सुलट गया था. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता संभालने के बाद न सिर्फ़ इस क़रार को रद्द कर दिया, बल्कि नया क़रार न होने तक ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. 

अमेरिका के ऐसे तुग़लकी फ़ैसलों के कारण भारत असहज ही नहीं हुआ. उसके लिए धर्मसंकट की स्थिति पैदा हो गई क्योंकि भारत ने ही ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित करके अभी-अभी उसका इस्तेमाल करना शुरू किया है. यही नहीं, अब तो अमेरिका ने भारत को तरजीही राष्ट्र का दर्जा ख़त्म करने तक की धमकी दे डाली है.

आने वाली सरकार चाहे जो भी हो, उसके लिए भी सबसे बड़ी चुनौती चीन ही होगा. उसी से निपटने के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले पांच सालों में शी जिनपिंग से लगभग डेढ़ दर्जन मुलाक़ातें की. गुजरात में सपरिवार उनका गरमागरम स्वागत किया तो वुहान में कई दौर की अनौपचारिक वार्ता का इंतज़ाम किया गया, वह भी डोकलाम विवाद के बावजूद. 

लेकिन चीन है कि मानता नहीं. संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में वह लगातार पाकिस्तानी आतंकवाद की ढाल बना हुआ है, वह भी भारत को अमेरिका और फ्रांस जैसे राष्ट्रों के खुले समर्थन के बावजूद. पहले उसने भारत को सुरक्षा परिषद में परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों में शामिल होने से रोका. तब भी भारत को अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन का समर्थन हासिल था. 

उसके बाद उसने कई बार सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान पोषित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर को विश्वव्यापी आतंकी घोषित होने से रोके रखा. हालांकि उसे इस मामले में अंततः हार माननी पड़ी और अपना विरोध वापस लेना पड़ा. तब कहीं जाकर मसूद अज़हर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित किया जा सका. यह वही मसूद अज़हर है जो भारतीय संसद पर हमले और विमान अपहरण का मास्टरमाइंड था. फिर भी चीन को यह मंज़ूर नहीं था कि उस पर प्रतिबंध लगे. दूसरी तरफ़ यह वही चीन है जो लाखों उइगर मुसलमानों को बंधक बनाकर उनका धर्म बदलने का खेल खेल रहा है और नकली द्वीप विकसित करके उन पर मिसाइलें तैनात कर रहा है.

असल में चीन के साथ संबंधों में हमने पिछले दो दशक इसी दुआ के हवाले कर दिए हैं कि आप जो भी करते रहो हम तो आपके साथ हैं. अब इस स्थिति को बदलने का समय आ गया है. अब समय आ गया है कि बालाकोट की धमक को चीन भी सुने. वह अरुणाचल और कश्मीर के लोगों को स्टेपल वीज़ा जारी करता रहा है और हम उसे चुपचाप ऐसा करते हुए देखते रहे हैं. 

तिब्बत का मुद्दा कितना संवेदनशील है, लेकिन हमने उस पर कभी ज़ुबान नहीं खोली. इसके उलट जिन दलाई लामा का हमारी सरकारें पूरा सम्मान करती रही हैं. हमने उन्हें सरकारी मंचों और सम्मानों से दूर कर दिया. आख़िर इससे हासिल क्या हुआ? 

जब ख़बर आई है कि दलाई लामा बेहद बीमार हैं तो चीन ने कहा है कि अगले दलाई लामा का चयन भी तिब्बती परंपराओं के अनुसार नहीं, उसकी मर्ज़ी से ही होगा. क्या यह वह समय नहीं है जब हम माननीय दलाई लामा और उनको चाहने वालों के साथ खड़े हों? 

ताईवान के मसले और वन चाइना पाॅलिसी के मुद्दे पर भी हम ख़ामोश ही रहते हैं. लेकिन अब इन हालात को बदलने का समय आ गया है. जब हर मुद्दे पर चीन का समर्थन करके कुछ हासिल नहीं है तो हमें भी उसकी दुखती रग पर हाथ रखना ही चाहिए. हम दलाई लामा का सम्मान क्यों न करें और पूरी दुनिया को तिब्बत की हक़ीक़त से अवगत क्यों न कराएं? 

जब हमारा देश पूरी गर्मजोशी से गुजरात में जिनपिंग परिवार का स्वागत कर रहा था तब उनके सैनिक सीमा पर घुसपैठ कर रहे थे. क्या यही यह समझने के लिए पर्याप्त नहीं है कि चीन के इरादे क्या हैं? 1962 के हमले में उसने हमसे अक्साई चिन जैसा लंबा-चैड़ा इलाक़ा छीन लिया और हम चुपचाप देखते रहे. इसके बाद भी उसकी विस्तारवादी, साम्राज्यवादी और आक्रामक नीति में कोई बदलाव नहीं आया. अभी भी वह भारत के कई और क्षेत्रों और दूसरे देशों के द्वीपों पर अपना हक़ जताता है. 

यदि हमने उसे पलटकर जवाब देना नहीं सीखा तो वह पैसा फेंककर जैसे हमारे पास-पड़ोस में जगह बनाता जा रहा है. वैसे ही वह किसी दिन हमें हमारा अपना गिरेबां भी पकड़ता हुआ दिखाई देगा. इसलिए ज़रूरी है कि हम समय रहते चेत जाएं और उसके हर क़दम पर चुप्पी साधने के बजाए दुनिया को उसकी हक़ीक़त से अवगत कराएं. 

इस बारे में तो सबसे पहले विचार करने की ज़रूरत है कि उसके लिए हमने जो इतना बड़ा अपना बाज़ार बिना खुद को वैसी सहूलियत के खोल रखा है क्या यह एक सही फ़ैसला है? हम इस एक मुद्दे पर ही अपनी कमर सीधी कर लें तो वह बिगड़ैल चीन को सीधा करने में काफ़ी कारगर साबित हो सकता है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और विभिन्न अख़बारों में अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखते रहे हैं.)

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