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दिल्ली के हिन्दुस्तान टाईम्स के पत्रकार को गांव वालों ने समझा बच्चा चोर, बिहार में लिंच होने से बचे

BeyondHeadlines Correspondent

बेतिया (बिहार): बच्चा चोरी की अफ़वाह धीरे-धीरे विकराल रूप धारण करती जा रही है. आज बिहार के पश्चिम चम्पारण ज़िले में दिल्ली से गए हिन्दुस्तान टाईम्स के पत्रकार इस अफ़वाह के जाल में फंस गए, लेकिन स्थानीय पत्रकार की सूझ-बूझ के कारण किसी अनहोनी घटना से बाल बाल बच गए.

दरअसल, कहानी पश्चिम चम्पारण ज़िले के बेतिया शहर से कुछ दूर महुआवा गांव की है. जहां दिल्ली से हिन्दुस्तान टाईम्स के पत्रकार नेयाज़ फ़ारूक़ी अपने ऑफ़िस से कैमरामैन संचित खन्ना के साथ चम्पारण किसी कवरेज के सिलसिले में गए थे. इसी दौरान गांव के लोगों ने इन्हें बच्चा चोर समझ घेर लिया. बता दें कि नेयाज़ फ़ारूक़ी पत्रकार होने के साथ-साथ एक मशहूर लेखक भी हैं. पिछले साल उनकी पुस्तक ‘An Ordinary Man’s Guide to Radicalism: Growing up Muslim in India’ काफ़ी चर्चे में रह चुकी है.

पत्रकार नेयाज़ फ़ारूक़ी ने BeyondHeadlines से बातचीत में बताया कि मैं यहां दिल्ली से गांधी के चम्पारण कनेक्शन पर एक स्टोरी करने आया था. इसी सिलसिले में यहां के हरदिया कोठी आया. सड़क की हालत ठीक नहीं होने के कारण क़रीब के एक गांव में अपनी गाड़ी रोककर हम अपने कैमरामैन संचित खन्ना और एक स्थानीय पत्रकार व शिक्षक शकील अहमद के साथ कोठी की तरफ़ पैदल चल दिए. जब लौटकर आए तो देखा कि क़रीब 50 लोग हमारी गाड़ी को चारों तरफ़ से घेर कर खड़े हैं. कुछ लोगों के हाथों में लाठी, बैट, विकेट आदि है. उनका कहना था कि किसी ने कल ही पड़ोस के गांव में एक बच्चे का अपहरण करने की कोशिश की थी, हम उनमें से एक हो सकते हैं.

वो बताते हैं कि क्योंकि मैं खुद बिहार के गोपालगंज का हूं और भोजपूरी आती है लेकिन अपने कपड़े व हावभाव से कहीं से भी लोकल  नहीं लग रहा था, बावजूद इसके मैंने और शकील साहब ने उनसे बातचीत करनी शुरू की. उन्होंने पड़ोस में गांव के स्कूल में वर्षों पहले पढ़ाया था; इसलिए वह क्षेत्र और आसपास के लोगों के बारे में पर्याप्त जानते भी थे. बस किसी तरह से हम ये समझा पाने में कामयाब रहे कि हम बच्चा चोर नहीं हैं. इस तरह हम आज लिंच होने से बच गए. हम अब सुरक्षित हैं.

इनसे पहले गांव के लोग गाड़ी के ड्राईवर का आईडी कार्ड चेक कर चुके थे. जब ड्राईवर ने देखा कि भीड़ बढ़ती ही जा रही है तो डर के कारण तुरंत गाड़ी लॉक करके गाड़ी के अंदर ही बैठ गए.

वहीं पत्रकार शकील अहमद ने बताया कि सोशल मीडिया के ज़रिए जिस तरह से बच्चा चोरी की अफ़वाह फ़ैली हुई है, वो बहुत घातक है. लोग इस अफ़वाह में इतने अंधे हो गए हैं कि कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं. जब मैंने बताया कि मैं इस गांव के बग़ल के कुजलहीं गांव में 12 साल रहा हूं, झकड़ा गांव में भी तीन साल रह चुका हूं. और ये लोग दिल्ली से आए हैं. आपका सतर्क रहना ठीक है, लेकिन ऐसे ही उतावला नहीं हो जाना चाहिए. इस बीच मेरे पढ़ाए हुए कुछ छात्र भी आ गए, जिन्होंने हमारी पहचान की और एक बड़ी घटना होने से बच गई.

उन्होंने कहा कि जिस तरह गांव-देहातों में बच्चा चोरी की अफ़वाह फैलाई जा रही है, उस पर प्रशासन को ध्यान देने की ज़रूरत है. प्रशासन को ये समझने की ज़रूरत है कि आख़िर ऐसा क्यों और कैसे हो रहा है. अगर प्रशासन ने जल्द ही इस ओर ध्यान नहीं दिया तो शायद जल्द ही किसी बेगुनाह के पीट-पीटकर मारे जाने की ख़बर हम जैसे पत्रकार ही लिख रहे होंगे.

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