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BeyondHeadlines > Latest News > सरकार जानती है देश बीमार है!
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सरकार जानती है देश बीमार है!

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published December 6, 2012 23 Views
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4 Min Read
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Ashutosh Kumar Singh for BeyondHeadlines

“हमारे देश की जन-स्वास्थ्य सुविधाएं बांगलादेश व केन्या जैसे गरीब देशों से भी बद्तर है.” यह बात मैं नहीं बल्कि हमारे केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश कह रहे हैं. आश्चर्य की बात यह है कि सरकार यह सबकुछ जानते हुए भी चुप्पी साधे हुए है.

स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है. यह बात हम बचपन से सुनते आ रहे हैं. सही भी है. जब तक शरीर स्वस्थ नहीं होगा, आप कुछ बेहतर कर नहीं पायेंगे. अगर आप अपनी हुनर का इस्तेमाल अस्वस्थता के कारण नहीं कर पा रहे हैं, तो कहीं न कही इससे राष्ट्र को क्षति पहुंचती है. शायद यही कारण है कि मन को धारण करने वाली इस काया को निरोगी बनाये रखने पर सदियों से हमारे पूर्वज ध्यान देते रहे हैं.

मानव स्वभावतः स्वस्थ रहना चाहता है. कई बार विपरित परिस्थितियां ऐसी बनती है वह अपने शरीर को स्वस्थ नहीं रख पाता. भारत जैसे देश में लोगों को बीमार करने वाली और लंबे समय तक उन्हें बीमार बनाये रखने वाली परिस्थितियों की लम्बी-चौड़ी सूची है. लेकिन इन सभी सूचियों में एक कॉमन कारण है अर्थाभाव. यानि भारत के लोग धनाभाव में अपना ईलाज व्यवस्थित तरीके से नहीं करवा पाते हैं.

भारत एक लोक-कल्याणकारी राज्य है. आधिकारिक तौर पर भारत में गरीबी दर 29.8 फीसदी है या कहें 2010 के जनसांख्यिकी आंकड़ों के हिसाब से यहां 350 मिलियन लोग गरीब हैं. वास्तविक गरीबों की संख्या इससे से भी ज्यादा है. ऐसी आर्थिक परिस्थिति वाले देश में स्वास्थ्य कारोबार में कलाबाजारी अपने चरम पर है. मुनाफा कमाने की होड़ लगी हुयी है. धरातल पर स्वास्थ्य सेवाओं की चर्चा होती है तो मालुम चलता है कि हेल्थ के नाम पर सरकारी अदूरदर्शिता के कारण आम जनता लूट रही है और दवा कंपनियाँ, डाँक्टर और दवा दुकानदारों की त्रयी मालामाल हो रही हैं.

आजादी के बाद से अभी तक के आंकड़े बताते हैं कि भारत अपने स्वास्थ्य नीति को लेकर कभी भी गंभीर नहीं रहा है. ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत अपने सकल घरेलु उत्पाद का लगभग 1 प्रतिशत राशि ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है. भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में स्वास्थ्य सेवाओं पर इतना कम खर्च राष्ट्र को स्वस्थ रखने के लिए किसी भी रूप में पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है.

अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं को स्वस्थ करने के लिए सरकार दवा कंपनियों द्वारा अपने मनमर्जी से तय की जा रही एप.आर.पी को कंट्रोल करें. सरकारी केमिस्ट की बहाली करें. जीवन-रक्षक दवाइयों को मुफ्त वितरण की व्यवस्था करें. अगर सरकार अभी नहीं चेती तो आने वाले समय में राष्ट्र का स्वास्थ्य और खराब होने की आशंका है, ऐसे में भारत को विकसित राष्ट्र के रूप में देखने का सपना, सपना ही बन कर रह जायेगा.

(लेखक स्वस्थ भारत विकसित भारत अभियान चला रही प्रतिभा-जननी सेवा संस्थान के राष्ट्रीय संयोजक व युवा पत्रकार हैं.)

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