अरविन्द केजरीवाल (कविता)

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आरोपित किया गया हूँ
कई मित्रों द्वारा
अपने बदलते सुर पर
कभी तारीफ़, कभी निंदा
अपना मत बदलने के लिए
आज के समय के अनोखा व्यक्तित्व पर
एक और सिर्फ एक-एके ,
अर्थात भारतीय कलाशनिकोव
उन सभी भारतियों का
जो देखते उसमे नायक
एक वास्तविक हीरो
एक रखवाला, एक अद्भुत व्यक्ति
और इस देश को बदलने वाला.

मुझे गरियाया गया
मेरी निंदा की गयी
मुझे आरोपित किया गया
मुझ पर हंसा गया
मुझे चुप कराया गया
और बहुत कुछ कहा गया
ठीक उस दिन से
मैंने जब विरोध किया
जनलोकपाल का
और तब से अब जब
हुआ राजनैतिक चोला-बदल
उस व्यक्ति का
जिन्होंने पूरे देश को
चकित कर रखा है.

मैं डरता नहीं गरियाये जाने से
मैं भला-बुरा को बुरा नहीं मानता
विरोध किये जाने से पीछे नहीं हटता
मैं आँखें दिखने पर खुश होता हूँ
इसीलिए यह कोई समस्या नहीं है.

जो बात मुझे बहुत परेशान करती
कि क्या मैं सही रहा हूँ
अथवा गलत हूँ मैं
श्री केजरीवाल के विश्लेषण में
एक व्यक्ति के रूप में
युग-परिवर्तक की कथित भूमिका में
उनकी सत्यता को लेकर
और इस रूप में उनकी ईमानदारी पर.

मैं नहीं कहता मुझमे है क्षमता
और उतनी बुद्धि
आंक सकूँ एक ऐतिहासिक व्यक्ति को
पर यह भी कृपया जानें
कि साधारण व्यक्ति भी
महान व्यक्तियों के जज हो सकते.

पुनः एक बार भी नहीं कहता
मुझमे अंशमात्र भी महानता
खुलेआम स्वीकारता हूँ मैं
अपनी समस्त कमियों, बुराईयों को
अपने झूठ को, अपने फरेब को
कई-कई चीज़ों के प्रति
लेकिन ये कमजोरियां भी
रोक नहीं सकती हैं
दुसरे के आकलन से.

अब मूल प्रश्न पर आते हैं-
मेरे कथित चंचल सोच पर
एके के प्रति मेरी टिप्पणी पर
मैं स्पष्ट करना चाहूँगा
एक बार भी शंका नहीं
उनकी अद्भुत क्षमता पर
उनकी असीम सोच पर
रिस्क लेने की ताकत पर
उनके आत्मविश्वास पर
कार्य के प्रति लगन पर
उनके शानदार उत्साह पर
और स्वयं को
उपस्थित करने की मेधा पर.

अब एक बात नहीं जानता
मैं आज की तारीख तक
वह है श्री के की आतंरिक सत्यता,
अंतरतम की बात
चेहरे के पीछे का सच
वह असल आदमी
और यही वह बिंदु
जिसपर मैं, जो उन्हें दूर से ही जानता
पा रहा हूँ अनवरत
विरोधाभाषी वक्तव्य.

एक तरह उनके समर्थक
और अब उनके “शिष्य”
उनके तमाम चाहने वाले
और वे सभी लोग
उन्निदें हैं जिनकी टिकी
श्री अरविंद केजरीवाल पर
जो उन्हें मानते
शुद्ध हीरा
युगान्तकारी व्यक्तित्व
गाँधी, नेहरु, टैगोर,
विवेकानंद, पटेल आदि
का अद्भुत सम्मिश्रण.

दुसरे तरफ उनके विरोधी
कहते जो उन्हें धूर्त
कहते जो उन्हें ठग
खुलेआम करते आरोपित
और देते हैं गालियाँ.

मेरे लिए वे दोनों
बहुत मतलब नहीं रखते
वे अपने बंधनों से जकडे
मुक्त चिंतन नहीं कर सकते.

मेरी दिक्कत यह कि
वे कुछ लोग
जिनकी मैं करता इज्जत
और लेता उन्हें गंभीरता से
एक संवेदनशील व्यक्ति
एक संजीदा आदमी के रूप में
बहुत अच्छे नहीं रखते विचार
जबकि दूसरी ओर
उतने ही संवेदनशील
उनते ही संजीदा लोग
मानते उन्हें बहुत अच्छा
जबकि मैंने स्वयं
इस समयावधि में
देखा है उन्हें
बदलते हुए अपनी बातें
कई-कई बार
सार्वजनिक जीवन में
और देखा है
करते हुए ऐसे वाडे
मुझे लगते असत्य
हवा-हवाई, लुभावने
उस समय से
जब उन्होंने कहा
जनलोकपाल है समाधान
सभी बीमारियों का
जो था निश्चित रूप से
एक सफ़ेद झूठ
साथ ही उनकी आदत
लोगों को बांटने की
सफ़ेद और स्याह में
औरों को चोर बताना
और खुद को
इतना स्वच्छ और ऊँचा
मानो बर्फ से भी उज्जवल
और यही वे बातें
कम करतीं मेरे विश्वास को
क्योंकि बुनियादी बातों का मतलब है
जबकि इसके साथ
ह्रदय से चाहता
कि यह व्यक्ति
जिसने आसमान को झंक्झोरा
साबित हो सच्चा
अपने शब्दों के प्रति.

अतः यह ढुलमुल मत
अफ़सोस नहीं मुझे जिसका
क्योंकि गलतियाँ करता मनुष्य और मनुष्य हूँ मैं.

Written by: Amitabh Thakur

-इस कविता को अंग्रेज़ी में यहां पढ़ सकते  हैं :  Arvind Kejriwal (Poem)

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