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Reading: मुज़फ़्फ़रनगर : वो सुबह कभी तो आएगी…
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मुज़फ़्फ़रनगर : वो सुबह कभी तो आएगी…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published January 2, 2014 5 Views
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3 Min Read
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Farhana Riyaz for BeyondHeadlines

जाती धर्म के नाम पे जब भी दंगे-फ़साद हुए
हिन्दू मुस्लिम सिख न यारो, इंसान ही बर्बाद हुए…

जब भी दंगा होता है नुक़सान हमेशा इंसान का ही होता है. और इनमें सबसे ज्यदा हताहत होने वाला समूह महिलाओं व बच्चों का है. इन दंगों में हुए अमानवीय कृत्य महिलाओं को शारीरिक पीड़ा के साथ-साथ मानसिक पीड़ा का ऐसा दंश दे जाते हैं जिसकी भरपाई सारी ज़िन्दगी नहीं हो सकती. और इसका सबसे दुखद पहलू ये है कि इसमें आपके ही आस-पड़ोस के लोग जिनके साथ वर्षों से जीवन-यापन कर रहे थे, वही जान व आबरू के लूटेरे बन जाते हैं. मुज़फ्फरनगर के राहत कैंपों में मौजूद बलात्कार पीड़ित महिलाएं भी कुछ ऐसा दर्द लिए खुले मैदानों में रहने को मजबूर हैं.

अल्लामा इकबाल ने कहा था कि ज़िन्दगी एक जद्दोजहद है. मुज़फ्फरनगर रहत शिविर में मौजूद इन महिलाओं की दशा देख कर ये पता चलता है कि ये ज़िन्दगी वाक़ई में एक जद्दोजहद है. इन दंगों ने महिलाओं को एक ऐसा कलंक दे गए हैं जो इनके भविष्य को अन्धकारमय कर गया है.

वर्तमान परिस्थिति में जब देश की राजधानी में महिलाएं सुरक्षित नहीं तो इस ठिठुरन भरी सर्दी में दूर-दूर तक फैले जंगल में कोई महिला कैसे सुरक्षित महसूस कर सकती है? असुरक्षा की भावना, अपनों के बिछड़ जाने का दर्द, बेबस मजबूर घर वालों के सामने अपनी आबरू लूट जाने का ग़म कैसा होता है, ये आप यहां आकर देख सकते हैं.

कन्या विद्या धन योजना, लैपटॉप और साइकल बांट कर कन्याओं का भविष्य बनाने वाली और महिला सशक्तिकरण का दावा करने वाली सरकार की लापरवाही का नतीजा है कि इन महिलाओं के अपने उज्जवल भविष्य के सपने धूमिल हो गए हैं.

मेरा सरकार से प्रश्न है कि क्या यही उनके महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के वायदे थे? क्या ऐसे ही उत्तर प्रदेश सरकार प्रदेश का विकास करेगी? क्या इन पीड़ित महिलाओं को कभी न्याय मिल पायेगा? सरकार की वर्तमान नीतियों से नहीं लगता कि यह सरकार कभी इन प्रश्नों के उत्तर देगी. महिला हितों की रक्षा की बात करने वाले और निर्भया केस में इंडिया गेट और जंतर-मंतर पर मातम मनाने वाले लोगों से भी मेरा सवाल है कि क्या महिला अधिकार शहरों तक ही सिमित हैं? क्या वो कभी इन महिलाओं के लिए भी आवाज़ उठाएंगे? मैं अपने कक्ष में कागज़ क़लम लिए उस नई सुबह के इंतज़ार मैं बैठी हूँ. जिस दिन ये सोये हुए लोग जागेंगे और नव वर्ष की संध्या पर लिए गए महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के अपने प्रण को निभाएंगे.

तू करेगी स्वछंद विचरण प्रभात की प्रथम किरणों में
वो सुबह कभी तो आएगी…

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