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Reading: यूं बनारस से हारेंगे मोदी!
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BeyondHeadlines > Exclusive > यूं बनारस से हारेंगे मोदी!
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यूं बनारस से हारेंगे मोदी!

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published April 17, 2014 10 Views
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5 Min Read
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Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines

बनारस की सियासी समीकरण नरेन्द्र मोदी को नाको चने चबवाने पर मजबूर कर सकता है. BeyondHeadlines इस वक़्त बनारस में रहकर काशी की इस दिलचस्प लड़ाई का जायज़ा ले रही है. इस दौरान हमें मोदी की कई ऐसी बातें मालूम पड़ी जो आपको चौंका सकती है. BeyondHeadlines आपके सामने सिलसिलेवार तरीके से ऐसे पहलू रखने जा रहा है, जो चक्रव्यूह में फंसे मोदी की हक़ीक़त बेपर्दा कर देंगे.

  1. मोदी ने काशी की लड़ाई में पार पाने के खातिर आनन-फानन में ‘अपना दल’ से समझौता कर लिया. अपना दल की पटेल-कुर्मी वोटरों पर पकड़ है और बनारस में इस तबके की आबादी ढाई लाख के करीब है. ऐसे में मोदी की जीत-हार में यह फैक्टर निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है. दिलचस्प बात यह है कि यह समझौता ‘अपना दल’ की युवा अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल ने आनन-फानन में बग़ैर अपनी काडर की राय लिए कर लिया और बदले में मिर्ज़ापूर की लोकसभा सीट पर बीजेपी के सहयोग से टिकट हासिल कर लिया. जबकि इससे पहले ‘अपना दल’ की बातचीत कांग्रेस के साथ चल रही थी. ऐसे में काडर खुद को बुरी तरह ठगा महसूस कर रहा है. चर्चा गर्म है कि ‘अपना दल’ का यही काडर इस दग़ाबाज़ी का बदला  चुनाव में मोदी की हार सुनिश्चित करके ले सकता है.
  2. काशी में भूमिहार वोट तकरीबन सवा से डेढ़ लाख के बीच में है. यह पूरा वोट लामबंद होकर कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय के हक़ में गिर रहा है.
  3. काशी की लड़ाई में दलित वोट भी बहुत महत्वपूर्ण है. एक से सवा लाख के बीच का यह दलित वोट-बैंक बीजेपी की तमाम कोशिशों के बावजूद टस से मस होने को तैयार नहीं है.
  4. काशी में चौरसिया समाज के डेढ़ लाख वोट हैं. यादव 70 से 80 हज़ार हैं. पाल, सैनी जैसे दूसरे वोट-बैंक भी दो से ढाई लाख के करीब हैं, जो खांटी तौर पर जाति राजनीति के साथ जा रहे हैं. बीजेपी मज़हब की चाशनी के नाम पर इन्हें अपने खेमे में खींचने की पूरज़ोर कोशिश कर रही है, मगर यह वोट बैंक अपनी जातिय प्रतिबद्धताओं को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है.
  5. मुस्लिम वोटबैंक बनारस में तीन से साढ़े तीन लाख के करीब है, जो ध्रुवीकरण की सूरत में बग़ैर बंटे एक तरफा तरीके से मोदी के खिलाफ जाएगें, जो मोदी के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद घातक हो सकता है.
  6. मोदी की सबसे बड़ी चिंता ब्रहमण वोट बैंक को लेकर है. काशी में ढ़ाई लाख के करीब ब्रहमण हैं. यह तबका मुरली मनोहर जोशी की उपेक्षा और जातिय स्वाभिमान का उचित प्रतिनिधित्व न मिलने से भड़का हुआ है. इस बात की संभावनाएं है कि इस तबके के वोटों में चुनाव के मौके पर भारी बिखराव हो सकता है.
  7. अरविन्द केजरीवाल जिस तरीके से मोदी के गुजरात में छाए भ्रष्टाचार की कलई खोल रहे हैं, उसका असर पढ़े-लिखे तबके पर सीधे तौर पर पड़ रहा है. यह तबका अपनी विवेक के आधार पर सही मौके पर सही क़दम उठा सकता है.
  8. मोदी का दो जगह से चुनाव लड़ना भी उनके खिलाफ काम कर रहा है. काशी के मतदाताओं के बीच यह मुद्दा उथल-पुथल पैदा कर चुका है. इस बात की चर्चाएं आम होती जा रही है कि मोदी चुनाव जीतने पर बनारस को चूसे हुए आम की गुठली की तरह फेंक देंगे.
  9. मोदी के लिए राजनाथ फैक्टर भी टेढ़ी खीर बन चुका है. सुत्रों के मुताबिक राजनाथ सिंह अंदर ही अंदर मोदी को काटने में लगे हुए हैं. राजनाथ सिंह को अच्छी तरह से मालूम है कि अगर मोदी बनारस से हार गए तो उनके पीएम बनने की राह में हमेशा के लिए दीवार खड़ी हो जाएगी.
  10. मोदी की काशी से दूरी भी उनके खिलाफ जा रही है. सुत्रों के मुताबिक मोदी के सलाहकारों ने उन्हें समझा दिया है कि उन्हें बनारस में जीत की खातिर पसीने बहाने की कोई ज़रूरत नहीं है. यहां जीत तय है. उन्हें नामांकन छोड़कर बनारस आने की भी ज़रूरत नहीं है. यही वजह है कि मोदी बनारस में दिखाई नहीं पड़ रहे हैं, जबकि पास-पड़ोस के ज़िलों में रैली करके निकल जा रहे हैं. मोदी का यह अति आत्म-विश्वास उन पर भारी पड़ सकता है.

नरेन्द्र मोदी के लिए काशी की लड़ाई किसी वाटर लू से कम नहीं है. अगर मोदी यहां हारे तो उनके राजनीतिक भविष्य को कोई नहीं बचा सकता है. काशी में मोदी के वाटर लू की शुरूआत हो चुकी है.

TAGGED:Modi in Varanasi
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