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BeyondHeadlines > Exclusive > बुनकरों के लिए मोदी-केजरी एक जैसे…
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बुनकरों के लिए मोदी-केजरी एक जैसे…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published May 9, 2014 17 Views
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6 Min Read
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Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines

कबीर के ज़माने से ही बनारस बुनकरों का तीर्थ रहा है. मगर राजनीत की चक्की ने इन बुनकरों को कहीं का न छोड़ा है. अजब संयोग है कि बनारस की लड़ाई में ताल ठोंक रहे राजनीत के दो बड़े सुरमाओं ने इन ग़रीब बुनकरों के सपने उजाड़ने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.

मोदी के सूरत ने बनारस के बुनकरों के पेट पर असहनीय लात मार रखी है, तो वहीं केजरीवाल ने दिल्ली के जिस सुन्दर नगरी इलाके से अपने ‘परिवर्तन आंदोलन’ की शुरुआत की, वहां भी बुनकरों के दर्द से आंख मूंद लेने वाले यह दोनों ही नेता अब जीत के खातिर उन्हीं बुनकरों को वोटों पर आंखें गड़ाए बैठे हैं.

एक कोऑपेरिटिव सोसाइटी के चेयरमैन 52 वर्षीय रमज़ान अली अंसारी अपनी बात यह शब्द के साथ शुरू करते हैं कि “या अल्लाह! हमारी बनारस को किसी बाहरी की बुरी नज़र न लग जाए.”

उनके मुताबिक इस बनारस में 2 लाख से अधिक बुनकर हैं और इन्हीं बुनकरों से बनारस में हर दिन तकरीबन 5 करोड़ रूपये का बिजनेस होता है. वो बताते हैं कि इस समय बनारस में 40 हज़ार हैण्डलूम व एक लाख साठ हज़ार पावरलूम है. उनका यह भी मानना है कि सबसे ज़्यादा नुक़सान पिछली एनडीए सरकार के दौरान हुआ जब बनारसी साड़ी के निर्यात में मुश्किलें पैदा की गईं.

65 वर्षीय यासीन का कहना है कि सबसे अधिक बनारस के बुनकरों का नुक़सान मोदी के गुजरात ने किया है. सूरत वाले हमारे तमाम डिजाइन की चोरी कर लेते हैं. हमारी हर चीज़ों की नकल करते हैं.

वहीं, अनवार का कहना है कि चुनाव करीब आते ही सब हमारी बात करने लगते हैं. सबको हमारी चिंता सताने लगती है. पर होता कुछ नहीं है. बनारस में उपर से लेकर नीचे बीजेपी के लोग ही राज कर रहे हैं. सांसद, विधायक, मेयर सब तो उन्हीं के पार्टी के हैं, यह लोग तो हमारे पास झांकने भी नहीं आए.

आगे वो यह भी बताते हैं कि केजरीवाल साहब को भी हमारी चिंता सता रही है. लेकिन हम आपको बता दें कि उन्हें हमसे नहीं, सिर्फ हमारे वोटों से मतलब है. अनवार बताते हैं कि उनके ज्यादातर रिश्तेदार दिल्ली के उसी इलाके में रहते हैं, जहां अरविन्द केजरीवाल की परिवर्तन संस्था काम करती है. लेकिन अफसोस सब लोग तबाह व बर्बाद हो गए. हुनरमंद हाथों में अब हथकरघे का हत्था नहीं रिक्शा, फावड़ा या फिर भीख का कटोरा है. अनवार अपनी बात कहते कहते रो पड़ते हैं और मुंह से सिर्फ इतनी ही निकलता है –‘हमारा कोई भला नहीं चाहता. अब बस अल्लाह पर ही यकीन है.’

मदनपूरा के फैसल हुसैन का कहना है कि सारी चीज़ों का दाम बढ़ गया है, पर बुनकरों की आज भी एक दिन की कमाई 200 रूपये से उपर नहीं जाती. वोट किसको देंगे, यह सवाल पूछने पर उनका सीधा जवाब है –‘जो स्थानीय है. बाहरी तो सिर्फ हमें लूटने आए हैं. इससे पहले भी अभी अभी एक लूट कर गया है.’ सलीमुल्लाह 40 साल से बुनकरी का काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि हमारा कोई मदद करने वाला नहीं है. सब हमारे दुश्मन हैं. आज के टाइम रिक्शा चलाने या इंटा जोड़ने वाला भी रोज़ के 500 रूपये कमा ले रहा है, लेकिन हमारी अधिक से अधिक 200 हो पाती है. हमारी 4 बेटियां हैं, शादी कैसे करूंगा यह सोचकर मैं पागल हो जाता हूं.

एजाज़ अहमद का कहना है कि एक साड़ी हथकरघे पर बनाने में हफ्ते दिन का समय लगता है. और इस पर मजदूरों को सिर्फ 1000 रूपये ही मेहनताना मिल पाता है. हमको यह भी बताते चलें कि यही साड़ी मालिक बाज़ार में 4000 तक में बेचता है, और दुकानदार उसी साड़ी को 10 से 12 हज़ार तक में ग्राहकों को देता है.

ज़हीर अनवर का कहना है कि बुनकरों का कोई रहनुमा नहीं है. सब अपना पेट भरने के लिए रहनुमाई कर रहे हैं. किसानों को तो सब्सिडी मिल जाती है, लेकिन हथकरघा बुनकरों के लिए कोई सब्सिडी इस देश में नहीं है. हालांकि पावरलूम वालों को कुछ सब्सिडी मिल जाती है. सरकार की सारी स्कीमें यह नेता लोग ही खा जाते हैं.

सेराज बताते हैं कि बनारस के मार्केट में भी अब असली बनारसी साड़ी बहुत कम है. सूरत का माल यहां बनारसी बोलकर धड़ल्ले से बिक रहा है. असली रेशम 4 हज़ार रूपये किलो मिल रहा है, जबकि सूरत का नकली रेशम सिर्फ 150 रूपये किलो है. सूरत के यही नकली रेशम जब बनारस मंगाते हैं तो हमें टैक्स देकर तकरीबन 250-300 रूपये किलो पड़ती है. हमें तो इन सूरत वालों ने ही बर्बाद कर दिया. और अब मोदी आए हैं बर्बाद करने… यहां के लोगों की माने तो  बुनकरों के लिए मोदी-केजरी एक जैसे ही हैं.

खैर, यहां जितने लोग हैं, उनकी उतनी बातें हैं. लेकिन इतना ज़रूर है कि बनारस के इस चुनावी महाभारत में बुनकर एक बड़ा मुद्दा है. ऐसे में मोदी और केजरीवाल दोनों ही इनके वादों और आश्वासनों का पिटारा खोलने में जी जान से लगे हैं. इनके मैनिफेस्टों में इनके कल्याण के लिए बेशुमार वायदे व दावे किए गए हैं. लेकिन लब्बो- लबाब यह है कि बुनकर एक बार फिर से धोखा खाने की तैयारी में हैं.

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