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BeyondHeadlines > India > कानपुर हिंसा साम्प्रदायिक तत्वों और प्रशासन के षडयंत्र का नतीजा
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कानपुर हिंसा साम्प्रदायिक तत्वों और प्रशासन के षडयंत्र का नतीजा

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published August 30, 2014 12 Views
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8 Min Read
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BeyondHeadlines News Desk

लखनऊ/कानपुर : भीतरगांव, कानपुर में हुए सांप्रदायिक हिंसाको सांप्रदायिक तत्वों और प्रशासनिक अमले की मिली भगत का नतीजा बताते हुएघटना स्थल का दौरा करने वाले एक जांच दल ने पूरे मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की है.

जांच दल में शामिल इंडियन नेशनल लीग, आम जन मोर्चा, ऑल इंडिया मुस्लिम मशावरत और रिहाई मंच के नेताओं ने कहा कि घटना के एक हफ्ते बाद भी पीडि़तों का एफआईआर दर्ज न होना साबित करता है कि शासन-प्रशासन पूरे मामले को दबाने की फिराक में है.

जांच दल में शामिल इंडियन नेशनल लीग के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहम्मद सुलेमान, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पीसी कुरील, आम जन मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा0 बीके सिंह यादव, ऑल इंडिया मुस्लिम मशावरत के अखलाक चिश्ती, आईएनएल के कानपुर अध्यक्ष एडवोकेट अशफाक गनी खां, रिहाई मंच नेता शाहनवाज़ आलम व राजीव यादव ने जारी बयान में कहा कि जिस तरह चोरी के एक छोटे से विवाद को सांप्रदायिक रंग दे दिया गया और गांव में रह रहे 30-32 मुस्लिम परिवारों में से अधिकांश घरों को जिस तरह हजारों की भीड़ द्वारा मुस्लिम विरोधी नारे लगाते हुए आग के हवाले कर दिया गया वह साबित करता है कि घटना किसी तात्कालिक कारण का नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश का नतीजा है.

जांच दल ने बताया कि घटना की शुरुआत एक मुस्लिम परिवार के घर में गांव के ही गुड्डू तिवारी और गुड्डू पासी नाम के युवकों द्वारा चोरी करने से हुई. जिसमें पुलिस द्वारा आरोपियों के घर से चोरी का सामान भी बरामद कर लिया गया. लेकिन कोई कार्रवाई न कर पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया जिसके दूसरे दिन साजिशन यह अफवाह फैलाकर कि उक्त दोनों युवकों की हत्या मुसलमानों ने कर दी है, हजारों की भीड़ ने मुसलमानों के घरों पर सुबह 8-9 बजे के तकरीबन ईंटा-पत्थर, गुम्मे चलाना और आग लगाना शुरु कर दिया था. जिसमें 20 वर्षीय मुहम्मद एजाज पुत्र मोहम्मद मजीद मौके पर ही जल कर मर गए. जहां बाकी मुस्लिम परिवारों के लोग किसी तरह अपनी जान बचाकर वहां से भागने में सफल रहे तो वहीं मेंहदी हसन के घर में एक छोटे से कमरे में 14 लोगों ने पनाह ली. जिसे बाहर से तेल छिड़ककर आग के हवाले कर दिया गया और किसी तरह दीवार तोड़कर लोग भागे और अपनी जान बचाई. लेकिन हमले में बुरी तरह जल चुकीं जाकरा पत्नी साजिद की बाद में मौत हो गई. वहीं बच्चों और महिलाओं समेत कई लोग बुरी तरह जल गए और आज भी कानपुर के हैलेट अस्पताल में भर्ती हैं.

जांच दल ने पाया कि इस पूरी सांप्रदायिक हिंसा के दौरान पुलिस मूक दर्शक बनी रही. आखिर सवाल उठता है कि जब पूरी रात सांप्रदायिक हिंसा का षडयंत्र रचा जाता रहा, जिसके बाद सुबह मुस्लिम परिवारों पर हमले शुरु हो गए तब खुफिया एजेंसियां क्या कर रही थीं?

जांच दल ने पाया कि मिली-जुली बाजार वाले इलाके में सिर्फ मुसलमानों के ही व्यवसायिक प्रतिष्ठान जलाए गए. जो साबित करता है कि उनके प्रतिष्ठानों को पहले से ही चिन्हित कर लिया गया था.

जांच दल ने पाया कि दोनों हिंदू युवकों की हत्या की झूठी अफवाह किन लोगों ने फैलाई यह अब पता नहीं चल पाया, जिससे संदेह गहराता है कि यह अफवाह किसी मुस्लिम विरोधी राजनीतिक सांप्रदायिक गिरोह द्वारा बहुत सुनियोजित तरीके से फैलाया गया. जिसकी पुष्टि इससे भी हो जाती है कि लगातार यह मांग की जा रही है कि मुस्लिमों पर एफआईआर दर्ज हो, जबकि इस पूरी घटना में हिंदू समुदाय से जुड़े लोगों पर कोई हमला या उनकी क्षति नहीं हुई है और दबाव बनाने के लिए पूरे बाजार को बंद रखा जा रहा है.

यह एक राजनीतिक रणनीति है, क्योंकि अभी तक मुस्लिम पीडि़तों की तरफ से एफआईआर दर्ज नहीं हुआ है और ऐसा दबाव बनाकर वे अपने ऊपर दर्ज होने वाले मुक़दमों को रोकना चाहते हैं.

जांच दल का मानना है कि राजधानी से सटे हुए जिले में इतनी गंभीर घटना के बावजूद सरकार के किसी भी मंत्री द्वारा घटना स्थल का दौरा न किया जाना भी साबित करता है कि सरकार इस मामले में पीडि़तों को न्याय दिलाने के बजाए पूरे मामले को दबाना चाहती है और इसीलिए अब तक जानमाल की क्षति पूर्ति का कोई आंकलन नहीं कराया गया है. जो लगभग 60 से 70 लाख के करीब है.

जांच दल ने पाया कि सरकार की तरफ से सद्भाव कायम करने में बरती जा गई लापरवाही के चलते दोनों समुदायों में काफी खाई पैदा हो गई है. जबकि यह गांव मिली-जुली संस्कृति और मेल-मिलाप का रहा है. जहां पहले कभी भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं हुआ था. इस बदले माहौल का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अपने मुस्लिम पड़ोसियों की जान बचाने वाले कमलेश वाजपेई और राकेश कुमार अवस्थी के परिवार बाकी हिंदू ग्रामीणों से अलगाव में आ गए हैं. क्योंकि इस परिवार की महिलाओं जिनमें एक विकलांग अनुरागिनी भी हैं, व बच्चों ने अपने परिवार के पुरुष सदस्यों की अनुपस्थित में हमलावरों का विरोध झेलते हुए भी हैंड पाईप और सब्मरसिबल से बर्तनों में पानी लेकर आग बुझाई.

उनका कहना है कि उन्हें अब उनके ही गांव के हिंदू ‘मुसलमान’ कहकर दूरी बनाने लगे हैं. तो वहीं उनके परिवार की बच्चियों को भी अपने स्कूल में ऐसे ही ताने सुनने को मिलने लगे हैं. जांच दल का मानना है कि मुसलमानों की जान बचाने के कारण इस तरह के व्यवहार का उत्पन्न होना इस सांप्रदायिक हिंसा से भी ज्यादा त्रासद है, जो भविष्य में भी इस तरह की घटनाओं के दोहराए जाने की पृष्ठभूमि तैयार करता है.

जांच दल मांग करता है कि समस्त पीडि़तों का एफआईआर प्रशासन खुद उनके सम्पर्क में जाकर अलग-अलग दर्ज करे, क्योंकि अधिकांश पीडि़त कमजोर तबके से आते हैं, भय में हैं और अशिक्षित हैं. मृतकों के परिजनों को दस-दस लाख रुपया मुआवजा व परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए. घटना के वास्तविक अपराधियों जिन्होंने झूठी अफवाह फैलाकर घटना को अंजाम दिलवाया की शिनाख्त कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए व अपने मुस्लिम पड़ोसियों की जान बचाने वाले दोनों हिंदू परिवारों को सम्मानित कर समाज में सांप्रदायिक सौहार्द को मज़बूत किया जाए.

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