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BeyondHeadlines > India > बचपन से ही घर वाले ‘कलेक्टर साहिबा’ ही कहकर पुकारते थे…
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बचपन से ही घर वाले ‘कलेक्टर साहिबा’ ही कहकर पुकारते थे…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published June 11, 2019 28 Views
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7 Min Read
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Afroz Alam Sahil, BeyondHeadlines

बुलंद हौसलों को कभी किसी सहारे की ज़रूरत नहीं होती. ऐसा हौसला रखने वालों के लिए तमाम रूकावटें कामयाबी की सीढ़ी बन जाती हैं. कन्नौज की डॉ. बुशरा बानो की भी यही कहानी है.

उत्तर प्रदेश के कन्नौज के सौरिख क़स्बे के सुभाष नगर मोहल्ले में जन्मी बुशरा बानो ने इस बार यूपीएससी के सिविल सर्विस परीक्षा में 277वीं रैंक हासिल की है. इनके पिता मोहम्मद अरशद हुसैन व्यवसायी हैं. वहीं मां शमा बानो घर का काम संभालती हैं.

30 साल की डॉ. बुशरा बताती हैं कि बचपन से ही पता नहीं क्यों घर के लोग व मेरे क़रीबी रिश्तेदार कलेक्टर साहिबा ही कहकर पुकारते थे. और फिर जब मैं बड़ी हुई तो मेरे दिल में हमेशा ये ख़्याल रहा कि अपने मुल्क की ख़िदमत करनी है. इसी जज़्बे के तहत एएमयू में पढ़ाई के दौरान मैंने एक सर्वे किया कि सिविल सर्विसेज़ में मुसलमानों की संख्या आख़िर इतनी कम क्यों है, क़ौम के बच्चे सिविल सर्विस में क्यों नहीं आ रहे हैं. तब पता चला कि ये लोग फ़ॉर्म ही नहीं भर रहे हैं. 

बुशरा की पढ़ाई गांव में ही हुई. यहां के नेहरू नर्सरी स्कूल से पांचवीं, सरस्वती मांटेसरी स्कूल से आठवीं और हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की पढ़ाई ऋषि भूमि इंटर कालेज से पूरी की. आगे की पढ़ाई के लिए कानपुर चली गईं. यहां के देवांशु समाज कल्याण महाविद्यालय से बीएससी की पढ़ाई की. इसके बाद सहारा एंड मैनेजमेंट एकेडमी लखनऊ से एमबीए और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री हासिल की. 

बुशरा बताती हैं कि 2013 में डिस्ट्रेस मैनेजमेंट में पीएचडी करते ही 2014 में मेरी शादी हो गई. और शादी के कुछ ही महीनों बाद मैं अपने पति असमर हुसैन के साथ सऊदी अरब चली गई. असमर यहां के एक यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे थे. मैं भी यहां के जीज़ान यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर बन गईं और यहां के बच्चों को मैनेजमेंट पढ़ाने लगी. 

वो बताती हैं कि यहां सबकुछ काफ़ी बेहतर चल रहा था. सैलरी भी लाखों में थी, लेकिन बार-बार ये बात दिल व दिमाग़ में आती थी कि अपने वतन में ही रहकर कुछ करना चाहिए. हमारा टैलेंट अपने मुल्क के काम आना चाहिए. बस यहीं से मूड बना सिविल सर्विस में जाने का. मैंने ये बात अपने शौहर को बताई, बस फिर क्या था वो भी मेरे साथ वहां सबकुछ छोड़कर मेरे सपनों के लिए 2016 में भारत चले आए. फिर यहां अलीगढ़ में रहकर तैयारी शुरू की. लेकिन जब आर्थिक हालात ने साथ नहीं दिया तो कॉल इंडिया में जॉब करने लगी. लेकिन साथ में तैयारी भी जारी रही और अब कामयाब हूं. लेकिन इस रैंक पर आईएएस नहीं मिलेगी और चाहत ‘कलेक्टर साहिबा’ ही बनने की है, इसलिए इस बार फिर से 2 जून को परीक्षा दी है ताकि रैंक बेहतर करके आईएएस बन सकूं.

बता दें कि 2015 में इन्होंने एक बेटे को जन्म दिया. यानी बुशरा ने नौकरी, घर और बच्चे तीनों को संभालते हुए देश की सबसे बड़ी परीक्षा की तैयारी की. बुशरा ने इस परीक्षा की तैयारी के लिए कहीं कोई कोचिंग ज्वाईन नहीं की, लेकिन वो बताती हैं कि एएमयू के रेजिडेंशियल कोचिंग सेन्टर के लाइब्रेरी का इस्तेमाल ज़रूर किया है. यहां के टीचरों से काफ़ी गाईडेंस मिली. 

ज़कात फाउंडेशन के बारे में पूछने पर बुशरा बताती हैं कि मेन्स परीक्षा में पास करने के बाद मॉक इंटरव्यू के लिए उन्होंने मेल किया था. इसके लिए वो अलीगढ़ से दिल्ली आईं, लेकिन उस दिन मॉक इंटरव्यू नहीं हो सका. ऐसे में वो वापस चली गईं, बावजूद इसके इनका नाम ज़कात फाउंडेशन की लिस्ट में है.

इस परीक्षा के लिए कौन सा विषय लिया था और क्यों? तो इस सवाल के जवाब में बुशरा बताती हैं कि, मैंने मैनेजमेंट लिया था, क्योंकि सारी पढ़ाई इसी सब्जेक्ट में हुई थी. मैंने इसी सब्जेक्ट से एमए और पीएचडी की थी. साथ ही मेरे पास पूरे 6 साल इसे पढ़ाने का भी एक्सपीरियंस था. ऐसे में यही लेना मुनासिब लगा. वैसे भी मेरी इस सब्जेक्ट में काफ़ी दिलचस्पी है.

यूपीएससी की तैयारी करने वालों को क्या संदेश देना चाहेंगी? इस सवाल पर बुशरा बताती हैं कि सबसे पहले ज़रूरी है कि ज़्यादा से ज़्यादा तादाद में पार्टीसिपेट करें. यूपीएससी इतना मुश्किल नहीं है जितना बताया जाता है. अगर सही प्लानिंग व स्ट्रैजी के साथ तैयारी की जाए तो कोई भी इंसान इसे आसानी से पास कर सकता है.

अपनी क़ौम के नौजवानों ख़ास तौर पर लड़कियों से क्या कहना चाहेंगी? इस पर बुशरा कहती हैं कि क़ौम के नौजवान खुद को सिस्टम से एलीनेटेड महसूस करने के बजाए सिस्टम में अपने पार्टिसीपेशन के बारे में सोचें. आपका पार्टिसीपेशन जितना ज़्यादा होगा सिस्टम के बेहतर होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी. और यक़ीनन आपके एलीनेटेड महसूस होने वाली फीलिंग ख़त्म हो जाएगी. और सच यही है कि क़ौम की हालत तभी बेहतर हो सकती है जब आप ज़्यादा से ज़्यादा सिस्टम में दाख़िल होंगे. लड़कियों को ख़ास तौर पर ध्यान देने की ज़रूरत है, क्योंकि उन्हें एक नहीं, बल्कि दो परिवारों को संभालना होता है. वो दो परिवार के लिए काम करती है. अगर बच्चों का मुस्तक़बिल रोशन करना है तो ख़ास तौर पर लड़कियों को आगे आना होगा. मैं चाहती हूं कि लड़कियां हर फिल्ड में आगे बढ़ें और काम करें. याद रहे कि लड़कियां सशक्त होंगी तो क़ौम सशक्त होगी, मुल्क सशक्त होगा. 

डॉ. बुशरा के लिए ये कामयाबी इतनी भी आसान नहीं थी. हालात ने इनके साथ खूब खेल खेला. बार-बार इनकी तबीयत ने इनका साथ छोड़ा. इस दौरान तीन बार इनकी सर्जरी हो चुकी है. इसके बावजूद अपनी तैयारी में लगी रहीं और इनके बुलंद हौसलों के सामने दूसरी कोशिश में ही यूपीएससी के सिविल सर्विस ने घुटने टेक दिए. फिलहाल डॉ. बुशरा एएमयू में डॉ. एस. राधाकृष्णन पोस्ट डॉक्ट्रल फेलो हैं. साथ ही कॉल इंडिया के एनसीएल बीना परियोजना, सोनभद्र में मैनेजमेंट ट्रेनिंग एचआर के पद पर कार्यरत हैं. जल्द ही इससे इस्तीफ़ा देकर ट्रेनिंग में शामिल होंगी.

TAGGED:Bushra BanoEditor's PickIASRank-277UPSCUPSC (Civil Service) is not tough: Bushra Bano
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