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शौक़त पर लश्कर का ठप्पा लगाने की फिराक में यूपी एटीएस

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published June 19, 2012 33 Views
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24 Min Read
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राजीव यादव

आने वाले दिनों की खतरनाक आहट, जेल की काल कोठरी या पुलिस प्रताड़ना से उसे डर नहीं लगता. उसे फिक्र हैं अपनी ग्यारह साल की बच्ची हाजरा का जो सेरिब्रल पालिसी से पूरी तरह से मानसिक और शारीरिक रुप से विकलांग है और फिक्र है अपने उस भाई वाहिद अली (25 वर्ष) का जो हर अनजान व्यक्ति की आहट सुनके डर जाता है, और उसकी इस हालत का जिम्मेवार वो अपनी खामोशी को मानता है. पर अब उसने अपनी खामोशी तोड़ने का फैसला किया है. इस पूरी दास्तान से यह बात हमारे सामने आएगी कि कैसे लश्कर-ए-तैयबा, इंडियन मुजाहिदीन, हुजी और न जाने किन-किन संगठनों के नाम पर बेगुनाह मुसलमानों को कभी एरिया कमाण्डर तो कभी मास्टर माइण्ड कहा जाता है, पर असल के मास्टर माइण्ड कौन हैं?

इस शख्स का नाम है- शौकत अली (45 वर्ष) पुत्र साबित अली, गांव- श्रीनाथपुर, थाना कन्धई, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश…

मैं जब इस शख्स से मिला तो मेरे दिमाग में एक खाका बनने लगा कि अगर इस शख्स ने अपनी खामोशी उन तमाम लोगों की तरह नहीं तोड़ी होती तो इसके बारे में हमें जो जानकारी मिलती या इसकी जो हालत होती वो बड़ी भयावह होती. शौकत पर यूपी एटीएस द्वारा आतंकवाद का ठप्पा लगाने से पहले ही उसकी जुबानी उसकी दास्तान को सुनने की कोशिश करते हैं.

शौकत उस दिन काफी परेशान हो गया. जब उसके भाई नासिर अली (40 वर्ष) को 11 जून 2012 को साढ़े दस बजे के तकरीबन जिला अस्पताल प्रतापगढ़ पहुंचने पर कुछ अनजान व्यक्तियों ने उससे पूछताछ की. नासिर जान गए कि वे एटीएस के लोग हैं. उन लागों ने इधर-उधर की बात करते हुए नासिर की पर्ची को जांचा. फिर उनका एक सहयोगी जो फोन पर था उसने पूछा कि इसे उठाना है, तो पर्ची जांच चुके व्यक्ति ने बोला अभी नहीं. नाशिर ‘खुदा का शुक्र’ कहते हुए कहते हैं कि उस दिन हमने लू के मारे अपने मुंह पर गमछा बांधा था, वे लोग पहचान नहीं पाए पर जब पर्ची देखा तो वे सन्तुष्ट हो गए पर जब तक मैं अस्पताल में था वे वहीं रहे. जब मैं साइकिल से वहां से निकला तो वे पांचों अपने दो पहिया से वहां से निकले.

इसके पीछे की कहानी शौकत बताते हैं कि मैंने अपने मोबाइल नम्बर 08726692670 से 10 जून 2012 को दिन में 9 बजे के तकरीबन अपने मित्र मास्टर शमीम को फोन किया कि मैं कल 11 जून 2012 को अपने बेटे अब्दुल्ला अज्जाम को दिखाने के लिए जिला अस्पताल प्रतापगढ़ आउंगा. पर मैं कुछ व्यक्तिगत कारणों से नहीं जा सका. पर मेरे भाई अपने को दिखाने 11 जून 2012 को जब जिला अस्पताल गए तो उनसे हुई पूछताछ से यह बात स्पष्ट होती है कि मेरे मोबाइल को सर्विलांस पर लगाया गया है. ऐसे में जिस तरीके से उन लोगों ने भाई नासिर से कहा कि इसे नहीं उठाना है उससे यह भी स्पष्ट होता है कि वे मुझे उठाने की फिराक में थे. दरअसल मेरे भाई और मेरी शक्ल काफी मिलती जुलती है.

शौकत जब अपनी कहानी फ्लैश बैक से शुरु करते हैं तो उसमें कहीं ठहराव नहीं होता. ठहरती है तो बस उनकी जिन्दगी और एक संगठन जिसके इर्द-गिर्द उनके खिलाफ साजिशों दौर शुरु होता है. शौकत बीएससी करने के बाद एसआईएम जिसे अब सिमी कहा जाता है से जुड़े और फिर 1992 में बीएड करने के बाद 1995 से प्राइमरी अध्यापक के रुप में कार्य करने लगे.

2001 में एसआईएम के प्रतिबंधित होने के बाद देश के तमाम मुस्लिम नौजवानों की तरह शौकत भी खूफिया और बेनामी सादी वर्दियों के पूछताछ के आदी हो गए, और उन्हें लगने लगा कि जैसे वो उनके जीवन का हिस्सा हो गए हों. पर 2008 का दौर वे कभी नहीं भूलेंगे क्योंकि यह वह दौर था जब यूपी एटीएस की सादी वर्दियों के बूटों की आवाजें उनके दरवाजे गाहे-बगाहे कभी भी दस्तखत दे देती.

दरअसल, 2008 में शौकत के घर यूपी एटीएस की यह दस्तक इलाहाबाद के चक हिदायत उल्ला से आमिर महफूज की गिरफ्तारी के बाद शुरु हुई. 15 अगस्त 2008 के अमर उजाला प्रतापगढ़ के संस्करण में एक खबर छपी की इलाहाबाद से गिरफ्तार हुए आमिर महफूज को शौकत जाली नोट सप्लाई करता था. दरअसल इसके पीछे की कहानी कुछ और ही थी. 10-11 अगस्त 2008 में आमिर महफूज को घूरपुर (इलाहाबाद) के थाने वालों ने बुलाया कि तुम अपने बहनोई मौलाना अशफाक को बुलाओ तब तुम्हें छोड़ेगे. पुलिस वालों की अनुसार मौलाना अशफाक को लंबे समय से पुलिस खोज रही थी. इस बीच आमिर महफूज के घर वालों ने 12-13 अगस्त में डीएम-एसपी वगैरह को फैक्स कर दिया, जिसके बाद पुलिस ने कहानी बनाने के लिए 14 को उसे जाली नोटों के साथ गिरफ्तार करने का दावा किया.

शौकत को इस कहानी में लाने की वजह यह थी की मौलाना अशफाक जो मालेगांव के थे उससे शौकत के जरिए ही आमिर महफूज की बहन की शादी हुई थी. बहरहाल, खबर यह भी है कि आमिर महफूज पिछले दिनों छूट गया है और उसके जिस बहनोई को पुलिस बहुत खोजने का दावा कर रही थी लोग बताते हैं कि वो आज भी वहीं रहते हैं.

बहरहाल, यह कहानी शौकत की है. 2008 के स्वतंत्रता दिवस के दिन छपी इस खबर से ही शौकत को गुलामी की बेडि़या जकड़ने लगती हैं. इस बारे में शौकत से कोई सीधी पूछताछ नहीं की गई, बल्कि विकास क्षेत्र बेलखरनाथ धाम के जिस प्राथमिक विद्यालय नौहर हुसैनपुर में शौकत पढ़ाते थे के प्रधानाध्यापक राम प्रताप पटेल से एलआईयू के इंस्पेक्टर ओपी पाण्डेय ने पूछतछ की. प्रधानाध्यापक से खास तौर पर आर्थिक स्थित, रहन-सहन, व्यवहार के बारे में पूछा गया. जब प्रधानाध्यापक ने कहा कि वो सामान्य रहन-सहन वाले व्यक्ति हैं और साइकिल से चलते हैं, मामूली मकान में रहते हैं तो एलआईयू इंस्पेक्टर ने कहा कि आप सामान्य आदमी बता रहे हैं पर वो तो जाली नोट छापता है.

इन हालात में आस-पास के लोगों और स्कूल में अध्यापकों और छात्रों की निगाहों में शौकत अपने को दोषी मानने लगता है. हर नए चेहरे के सामने वह जवाब देने को तैयार हो उठता है, क्योंकि जब न तब कोई भी दरवाजे की कुंडी खटका देता और देर तक उससे पूछताछ के नाम पर एक लंबी खामोशी के लिए उसे तैयार कर चला जाता. भारतीय नागरिक से ज्यादा भारतीय मुसलमान होने के संकट से जूझ रहा शौकत देश की सुरक्षा के नाम पर जवाब दर जवाब देता रहा. पर उसे संदेह रहता था कि उसके हर जवाब से उसे किसी बड़ी साजिश में फसाने के सबूत गढ़े जा रहे हैं.

शौकत बताते हैं कि सितम्बर-अक्टूबर 2008 के तकरीबन एक दिन यूपीएटीएस के लोग मेरे पास आए. उन्होंने मुझसे कहा कि प्रतापगढ़ की रानीगंज तहसील में एक आदमी तलहा अब्दाली रहता था. क्या तुम उसे जानते थे?  मैंने अपनी जानकारी के अनुसार उन्हें बता दिया कि उससे मेरी मुलाकात को एक अरसा हो गया है. उससे पहली बार मेरी मुलाकात 98-99 के तकरीबन रानीगंज ईद मिलन समारोह में हुई थी. उसके बाद कभी कभार रानीगंज बाजार और प्रतापगढ़ शहर आते जाते उससे कभी-कभार मुलाकात हुई. उसके बाद लंबे समय से मेरी उससे कोई मुलाकात नहीं हुई. इसके बाद यूपीएटीएस के लोगों ने कहा कि हम तलहा को खोज रहे हैं अगर कोई जानकारी मिले तो हमें बताना. उन लोगों ने कहा कि तलहा प्रतापगढ़ के किसी स्कूल में अभी भी पढ़ाता है और साथ ही कहा कि वह तुम्हारे सम्पर्क में है. मैंने उनसे तलहा से किसी भी प्रकार के सम्पर्क और सम्बन्ध से इनकार कर दिया.

तलहा के बारे में पूछताछ का यह सिलसिला कईयों के साथ हुआ और हो भी रहा है. दरअसल, तलहा हो या फिर पिछले दिनों चर्चा में रहे यासीन भटकल उर्फ इमरान उर्फ शाहरुख और न जाने कौन-कौन ये सब खूफिया थ्योरी के क्रिएशन हैं, जिनको खूफिया खुद प्लांट करती है और उसके बाद उनके पीछे-पीछे अपनी जांच की फर्जी पटकथा रचती है. शौकत को फांसने की पटकथा भी इसी से मिलती-जुलती है.

प्रतापगढ़ की एसओजी में रहे हेमंत भूषण जब एटीएस में गए तो फरवरी-मार्च 2009 में फिर से वे तलहा की तफ्तीश में शौकत से मिले. शौकत बताते हैं कि वो कहते थे कि वे पूर्वांचल के एटीएस इन्चार्ज हो गए हैं. हेमन्त भूषण ने मुझसे कहा कि हमें लंबे समय से तलहा अब्दाली की तलाश है. क्या तुम्हारे पास उसका कोई फोटो है? मेरे मना करने के बाद कि मेरे पास उसका कोई फोटो नहीं है उन्होंने कहा कि वह देश की सुरक्षा के लिए एक खतरनाक व्यक्ति है. मुझसे उन्होंने पूछा कि कहां का रहने वाला था, तलहा अब्दाली? तो मैंने कहा कि उसने अपने बारे में बताया था कि वो बाराबंकी का रहने वाला है. इस बात पर हेमंत ने कहा कि नहीं वो सीतापुर का रहने वाला है. मैंने कहा कि मुझे नहीं मालूम… हेमन्त ने कहा कि आप को हमारा सहयोग करना चाहिए और कहीं से उसकी फोटो और जो भी जानकारी उपलब्ध हो सके उसे हमें बताएं. इसके बाद उनके साथ आए एक सिपाही से हेमन्त भूषण के सामने ही तय हुआ कि मैं अगले दिन रानीगंज क्षेत्र जाकर जिन लोगों से भी जानकारी प्राप्त हो सकती है, उन्हें प्राप्त कराऊं.

उस दरम्यान 2009 लोकसभा चुनाव का दौर चल रहा था. मैंने रानीगंज पहुंचकर हेमन्त भूषण के सहयोगी एटीएस के सिपाही को फोन किया कि मैं रानीगंज आ गया हूं, आप आ जाइए. इस पर एटीएस के सिपाही ने नाराजगी जताते हुए कहा कि आप अकेले क्यों चले गए? साथ चलने की बात हुई थी जब. तो मैंने कहा कि यहां आकर जानकारी ही आपको इक्ट्ठा करनी थी तो मैंने सोचा कि मैं जब यहां आया हूं तो आपका भी यह काम कर दूं. इस पर उसने जानकारियों में कोई दिलचस्पी न दिखाते हुए कहा कि आप ही इक्ट्ठा कर लो, और आगे से साथ चलने को कहा जाय तो साथ ही चला करो.

दरअसल, यहां जानकारियां इकट्ठा करने की फिराक में एटीएस नहीं थी वो शौकत को कहीं अनजान जगह से उठाने की फिराक में थी. क्योंकि जिस दिन शौकत को एटीएस अकेले बुलाने का यह प्रपंच कर रही थी, उसी दिन इलाहबाद के आमिर महफूज के भाई आरिफ महफूज को भी इलाहाबाद में उठाया था. पर पूर्व निर्धारित पटकथा में शौकत के अकेले जाने की हरकत ने पुलिस को एक कदम पीछे हटने को मजबूर किया और उसने आरिफ महफूज को भी छोड़ दिया.

शौकत बताते हैं कि बाद में एटीएस अधिकारी हेमन्त भूषण का फोन आया कि मैं उनसे इलाहाबाद या लखनऊ आकर मिलूं. पर मैंने मना कर दिया कि जब मैं आपसे बात कर लेता हूं और जिस वक्त भी आप कहते हैं तो ऐसे में मेरा कहीं दूसरी जगह आने का क्या मतलब है. हेमंत बार-बार मुझे घर से कहीं दूर बुलाने की कोशिश करता. पर मैंने एटीएस के बारे में जिस तरह सुन रखा था, वैसे में मैं कहीं दूसरी जगह अकेले में एटीएस वालों से मिलना मुनासिब नहीं समझता था.

एटीएस के हेमन्त भूषण से इस मुलाकात के दस-पन्द्रह दिन बाद ही शौकत की पत्नी फरीदा महजबीन द्वारा संचालित स्कूल शहपर पब्लिक स्कूल, आजादनगर प्रतापगढ़ में शौकत के नाम से एक कोरियर आया. इस कोरियर को भेजने वाले का नाम तलहा अब्दाली था और यह कोरियर इलाहाबाद से भेजा गया था. जिस पर बाराबंकी का पता लिखा था. शौकत बताते हैं कि इस कोरियर में एक उर्दू भाषा में लिखा पत्र था जो मेरे नाम से संबोधित था, जिसमें लिखा था कि मुझे लश्कर-ए-तैयबा का एरिया कमाण्डर बना दिया गया है, आपके स्कूल में असलहे छिपा दिए गए हैं. इस पत्र में एक महत्वपूर्ण बात के रुप में यह लिखा था कि ख्वातीन (महिला) की विंग भी कायम हो चुकी है. यह पत्र मिलने के साथ ही आप अपना काम शुरु कर दीजिए.

इस पत्र के मिलने के बाद शौकत और उसका पूरा परिवार डर व दहशत में आ गया. दूसरे ही दिन शौकत ने जिलाधिकारी और एसपी को एक पत्र के माध्यम से इस पत्र के बारे में सूचित करते हुए इस पत्र की फोटो कापी नत्थी कर उन्हें प्रेषित कर दिया. इसके बाद शौकत को लगा कि एटीएस भी तलहा के बारे में पूछताछ कर रही है और उसके नाम से ही पत्र आया है तो ऐसे में एटीएस को सूचित कर देना चाहिए. शौकत ने एटीएस अधिकारी हेमंत भूषण को फोन किया और कोरियर आए पत्र का पूरा ब्योरा दिया. हेमन्त ने आकर शौकत से उस खत की मूल प्रति ले ली और कहा कि क्या जरुरत थी एसपी-डीएम को बताने की, मुझसे पहले बताया होता. चलो अब तो बता ही दिया, लेकिन अब जो भी हो पहले मुझे बताना. शौकत ने इसके बारे में एलआईयू को भी सूचित कर दिया था.

शौकत से इस पत्र के बारे में आईबी ने भी पूछताछ की. पर लंबे समय तक जब प्रशासनिक हल्के से को कोई जानकारी नहीं मिली तो उसने सूचना अधिकार के तहत एसपी कार्यालय से जानकारी मांगी. इतने गंभीर सवाल पर प्रतापगढ़ का एसपी कार्यालय शौकत को सूचना से वंचित रखा.

शौकत बताते हैं कि हेमन्त का मुझे लगातार फोन आता कि मुझसे डीआईजी साहब बात करना चाहते हैं, मैं आकर उनसे मिल लूं. मैंने हेमन्त से कहा कि आप तो जानते ही हैं कि मेरी आठ साल की बच्ची हाजरा जो सेरिब्रल पालिसी से पूरी तरह से मानसिक और शारीरिक रुप से विकलांग है और उसकी देख-रेख के चलते मैं कहीं जा नहीं पाता हूं. ऐसे में जो भी बात करनी है आप मुझसे फोन पर बात कर लें. मैं कहीं नहीं आ पाउंगा. हेमन्त का बार-बार जोर रहता कि मैं घर से दूर कहीं उससे मुलाकात करुं.

यूपी एटीएस की इस आपराधिक पूछताछ में शौकत ने भाई वाहिद अली (25 वर्ष) को एक खतरनाक बीमारी की चपेट में जाते देखा. वो घर आने-जाने वाले व्यक्ति और अनजान व्यक्ति से डरने लगा. वो इस डर में कपड़े निकाल कर फेकना और इस तरह की तमाम पागलपन की हरकतें करने लगा है. जिसका इलाज उसने नूर मंजिल लाल बाग, लखनऊ में साइक्रेटिक के डाक्टर एस नायडू से करवाया. आज वो फिर से हो रही इस पूछताछ से परेशान हो रहा है. इस पूरी पूछताछ ने शौकत के पूरे पारिवारिक जीवन को तहस-नहस कर दिया है.

पर एटीएस कहां रुकने वाली थी. अक्टूबर 2009 में एटीएस अधिकारी हेमन्त भूषण 26/11 की बाम्बे की घटना का टेलीफोनिक टेप लेकर शौकत के विद्यालय नवहर हुसैनपुर आए. शौकत को टेप सुनाकर हेमंत ने पूछा कि क्या यह आवाज तलहा अब्दाली की है. तो शौकत ने कहा कि मेरी याददाश्त की हद तक तलहा अब्दाली की आवाज नहीं लगती. इस पर हेमन्त भूषण ने मुझसे कहा कि ‘आजकल वो इंडिया से बाहर है, हो सकता है उसकी आवाज बदल गई हो’. तो मैंने उनसे साफ कहा कि मैं आवाज पहचानने में असमर्थ हूं.

28 फरवरी 2012 को कुछ लोग आजमगढ़ एटीएस कहकर शौकत से मिले. शौकत बताते हैं कि वो लोग बीआरसी शीतलागंज जहां पर मेरा विभागीय प्रशिक्षण चल रहा था वहां आए पहले आकर उन्होंने मुझसे सिमी के बारे में और उनके लोगों के बारे में पूछताछ की. उसके बाद उन लोगों ने तलहा के बारे में पूछताछ की कि वह प्रतापगढ़ कब आया कब तक रहा. वहां पर किन-किन लोगों से उसके सम्बन्ध और रहे. रानीगंज के अब्दुल कादिर अंसारी के बारे में तफसील से पूछताछ की और उसके घर के लोकेशन के बारे में पूछा. जो व्यक्ति मुझसे प्रमुख रुप से बात कर रहा था उस व्यक्ति का नाम अश्वनी था, जो घंटो की बातचीत में कुछ बात करने के बाद फोन पर दूर हट कर बात करने लगता. उनका प्रयास था कि मैं उनके साथ चलूं. लेकिन मैंने उनके साथ चलने के उनके प्रस्ताव को टाल दिया.

शौकत बताते हैं कि 12 मई 2012 को लखनऊ एटीएस के नाम पर कुछ लोग फिर उसके घर आए. उन्होंने बताया कि वे रानीगंज से होकर आए हैं. जहां तलहा अब्दाली रहता था. उन्होंने बहुत सारे नाम पूछ-पूछकर मुझसे उनके बारे में जानना चाहा. जो नाम मुझे याद है वो कुछ इस तरह के थे- शाहबाज (भदोही), अब्दुल कयूम (लखीमपुर खीरी), खालिद (आजमगढ़), इस्माल, रियाज भटकल आदि. इन बातों में एक खास बात यह रही की उन्होंने शहबाज के बारे में पूछते हुए कहा कि शहबाज लश्कर वाला और फिर उन्होंने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा कि आप भी तो लश्कर के ही हैं न? उन्होंने मुझसे पूछा कि आप को मालूम है, तलहा पकड़ा गया? जब मैंने कहा कि नहीं तो उन लोगों ने कहा हम ही ने पकड़ा है, कोई बच नहीं पाएगा. मुझसे मेरी फोटो मांगी जब मैंने कहा कि नहीं है तो उन लोगों ने मोबाइल से मेरी फोटो खींची. उन लोगों ने मेरे पूरे परिवार की डिटेल ली. जाते-जाते कहा कि जरुरत पड़ी तो आपको लखनऊ एटीएस ऑफिस बुलाया जाएगा.

अब शतरंज की इस आतंकी बिसात पर शौकत एटीएस का एक मोहरा है, जिसे वो कभी भी चल देना चाहती है. इसी तरह सीतापुर के रहने वाले शकील से भी लंबे समय तक पूछताछ कर उस पर आतंकवाद का आरोप लगा दिया. यहां गौर करने की बात है कि शकील को फरवरी में गिरफ्तार किया और उसी दरम्यान शौकत पर भी एटीएस का शिकंजा फिर से मजबूत हुआ. दूसरे कि शकील को 12 मई 2012 को दिल्ली एटीएस ने दुबग्गा लखनऊ से उठाया और उसी दिन यूपी एटीएस जो शकील की गिरफ्तारी से पल्ला झाड़ रही है वो शौकत के घर गई. अब सवाल तलहा अब्दाली का है कि आखिर वो कौन है तो इसका जवाब भी एटीएस के हेमंत ने शौकत को फरवरी-मार्च 2009 के तकरीबन ही दे दिया था. जब हेमंत ने शौकत से पूछा कि तलहा कहां का है तो उसने बताया कि बाराबंकी का तो हेमंत ने कहा कि नहीं सीतापुर. अब हो न हो यह पूरी खूफिया थ्योरी बशीर पर आकर टिकती है. बशीर, शकील का बहनोई है और उसे 5 फरवरी 2012 को उन्नाव से उठाया गया था, जो बाराबंकी का रहने वाला है और सीतापुर में लंबे समय तक रहा है.

यहां अहम सवाल यह है कि अगर तलहा अब्दाली हो या फिर कोई और जब वह गिरफ्तार कर लिया गया तो शौकत से किस तरह की पूछताछ? शौकत कहते हैं कि मैं चाहता हूं की सरकार सालों-साल से चल रही मेरी इस पूछताछ की जांच करवाए. इसने मेरे पूरे परिवार को तबाह कर दिया. मैंने देश की सुरक्षा के सवाल पर उनकी हर स्तर पर मदद की. पर आज मैं जब स्कूल में अपने बच्चों के सामने खड़ा होता हूं तो नजर नहीं मिला पाता हूं. क्योंकि जब न तब एटीएस के लोग मेरे स्कूल में आ धमकते हैं. मैंने इस चुप्पी में अपने भाई के पागलपन को देखा है कि किस तरह वो हर नई आहट से डर जाता है.

शौकत की इस दास्तान को सुनते-सुनते रात के दस बज गए. हमने उनसे कहा कि इतनी रात कहां जाएंगे. तो शौकत का जवाब था, बेटी परेशान होगी, मेरी पत्नी को भी पैरों से दिक्कत है…

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