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दवाओं ने तो लूट लिया है…

आशुतोष कुमार सिंह

क्या आप बता सकते हैं कि कोई ऐसा घर जहाँ पर कोई बीमार नहीं पड़ता. जहाँ दवाइयों की जरूरत नहीं पड़ती. नहीं न! सच पूछिए, अगर जीना है तो दवा खानी ही पड़ेगी. यानी दवा उपभोग करने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है. किसी न किसी रूप में लगभग सभी लोगों को दवा का सेवन करना ही पड़ता है. कभी बदन दर्द के नाम पर तो कभी सिर दर्द के नाम पर…

भारत एक लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा वाला विकासशील राष्ट्र है. जहाँ आज भी 70 प्रतिशत जनता 30 रूपये प्रति दिन भी नहीं कमा पाती. ऐसी आर्थिक परिस्थिति वाले देश में दवा कारोबार की काला-बाजारी अपने चरम पर है. मुनाफा कमाने की होड़ लगी हुई है. मैं कुछ तथ्य को सामने रखकर बात करना चाहता हूं.

सबसे कॉमन बीमारी है सिर दर्द/बदन दर्द… इसके लिए दो प्रकार की दवाएं बाजार में बहुत कॉमन है. एक है डाक्लोफेनेक सोडियम+पैरासेटामल नामक सॉल्ट से निर्मित दवाएं, जिसमें डाइक्लोविन प्लस, आक्सालजीन डी.पी जैसी ब्रान्ड नेम वाली दवाएं उपलब्ध हैं.

रोचक तथ्य यह है कि डाइक्लोविन प्लस टैबलेट का होलसेल प्राइस 30-40 पैसा प्रति टैबलेट है और यह रिटेल काउंटर पर 2 रूपये प्रति टैबलेट की दर से यानी 500 प्रतिशत से भी ज्यादा मुनाफा लेकर बेची जा रही है. ठीक इसी तरह बहुत ही पॉपुलर सॉल्ट है निमेसुलाइड. यह भी एंटी इन्फ्लामेट्री टैबलेट है. दर्द निवारक गोली के रुप में इसकी भी पहचान बन चुकी है. इस सॉल्ट से सिपला जैसी ब्रान्डेड कंपनी निसिप नामक उत्पाद बनाती है. जिसमें 100 मि.ग्रा. निमेसुलाइड की मात्रा रहती है.

इस दवा की होलसेल प्राइस 4 रूपये से 4.5 रूपये ( हो सकता है कि कहीं-कहीं इससे भी कम हो) प्रति 10 टैबलेट यानी प्रति स्ट्रीप है. मार्केट में इस दवा को धड़ल्ले से 2 से ढ़ाई रूपये प्रति टैबलेट बेचा जा रहा है. यानी प्रति स्ट्रीप 20 रूपये का मुनाफा. लगभग 500 प्रतिशत का शुद्ध लाभ…

इसी तरह दैनिक जीवन में उपभोग में लाइ जाने वाली कुछ दवाएं हैं, जिनमें कॉटन, बैंडेज, स्पिरिट, डिस्पोजल सीरिंज है. इन दवाओं पर भी लगभग 300 प्रतिशत से लेकर 700 प्रतिशत तक मुनाफा कमाया जाता है.

यह तो कुछ बानगी भर है. अंदर तो अभी और कितनी परत है. जिसे ‘ब्यॉन्डहेडलाईन्स’ के माध्यम से धीरे-धीरे खोलने का प्रयास करूंगा…

फिलहाल सोचनीय यह है कि आखिर में ये दवा कंपनियां अपने उत्पाद का विक्रय मूल्य इतना बढ़ा कर किसके कहने पर रखती है? क्या सरकार को मालुम नहीं है कि इन दवाओं को बनाने में वास्तविक कॉस्ट कितना आता है? अगर सरकार को नहीं मालुम हैं तो यह शर्म की बात है, और अगर जानते हुए सरकार अंधी बनी हुयी है तो यह और भी शर्म की बात है!

अब तो अन्धेर नगरी के चौपट राजाओं को लदने का समय आ गया है. नहीं तो दवा के लुटेरे कारोबारी गरीब भारतीयों को और गरीब करते जायेंगे. धन्य देश हमारा, धन्य है हमारी सरकार!

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