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टीम अन्ना और उसके आन्दोलन के मायने…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published August 5, 2012 19 Views
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17 Min Read
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अब्दुल हफीज़ गाँधी

समाज में अच्छे और बुरे में हमेशा संघर्ष रहा है और यह संघर्ष आज भी ज़ारी है. समाज और राजनीति को दिशा देने का काम कभी आसान नहीं रहा. इसलिए इस काम में जल्द बाज़ी ठीक नहीं होती. पिछले 18 महीनों में जो जल्द बाजी टीम अन्ना ने दिखाई उसे किसी भी मायने में उचित नहीं ठहराया जा सकता है . हाँ, इस संघर्ष का सकारात्मक परिणाम यह हुआ कि आज भ्रष्टाचार को लेकर लोगों में अधिक चेतना जागृत हुई है. पिछले कई सालों से भ्रष्टाचार को लेकर गुस्सा है और यही गुस्सा लोगों ने आन्दोलन में हिस्सेदारी लेकर दर्शाया. ऐसा बिलकुल नहीं है कि सरकार और लोग इस समस्या को लेकर गंभीर नहीं है, लेकिन ना तो टीम अन्ना और ना ही सरकार को समझ आ रहा है कि विकराल समस्या से निपटने के लिए क्या कारगर प्रयास किये जायें.

मैं स्वतंत्रता और लोकतंत्र का समर्थक हूँ और इसलिए कोई भी इन दोनों को आगे बढाने और गहरा करने की कोशिश करता है तो मैं उसका पूरी तरह से समर्थन करता हूँ. शुरुआती दौर में टीम अन्ना का भी किया. पर लोकतंत्र की आड़ में तानाशाही चलायी जाये यह उचित नहीं है. कई बार लोगों को हम हसीन सपने दिखा कर अपना छुपा हुआ मकसद पूरा करने लगते हैं. अन्ना आन्दोलन ने भी यही किया. टीम अन्ना के लोग सिर्फ अपनी बात सुनाते हैं, उन्हें दूसरों की सुनना बिलकुल पसंद नहीं है, इसलिए यह आन्दोलन गैर-लोकतान्त्रिक बन कर रह गया. सिर्फ लोगों के हिस्सा लेने से ही कोई आन्दोलन जनतांत्रिक नहीं बन जाता.

आन्दोलन को लोकतान्त्रिक बनाने के लिए उससे जुड़े प्रमुख लोगों का लोकत्रांत्रिक होना ज़रूरी है. परन्तु इस हालिया आन्दोलन में ऐसा कम ही देखने को मिला. जिस व्यक्ति ने भी किसी बात पर इन प्रमुख लोगों का सैद्धांतिक विरोध किया तो उसको आन्दोलन से दूर कर दिया गया. सिवाए कोर टीम के इस आन्दोलन में दूसरे लोगों को जुड़ने नहीं दिया गया. क्या चंद व्यक्ति सभी वर्गों और लोगों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं ? बिलकुल नहीं. आन्दोलन जितना व्यापक होगा, जितना समावेशी होगा, जितना सैद्धांतिक होगा, उतना ही लोकतान्त्रिक होगा. लेकिन इस आन्दोलन में ऐसा कम ही देखने को मिला.

पूरे 18 महीने इस मुहीम से जुड़े लोगों ने जिस भाषा का प्रयोग किया उससे तो सिर्फ घमंड ही झलकता है. अपने को छोड़ कर सभी को बेईमान बताना, मानना और सभी संवैधानिक संस्थाओं को शक के दायरे में लाना सिर्फ एक संकुचित मानसिकता का पर्याय नहीं तो और क्या है ? कैसी विचित्र प्रस्थिति है कि आप आरोप तो लगायें पर उन आरोपों को सिद्ध करने के लिए कानूनी प्रक्रिया का सहारा न लें. सरकार के मंत्रियों पर आरोप तो लगाये गए लेकिन पुलिस थाने में कोई शिकायत नहीं की गयी, सिर्फ उन आरोपों को भुनाने के लिए मीडिया का सहारा लिया गया. इस मुहीम से जुड़े लोगों का इस देश की व्यवस्था पर से इतना विश्वास उठ गया है, तो देश जानने को आतुर है कि यदि लोकपाल बन भी जाये तो क्या वह शक-ओ-शुब्हा के दायरे से बहार होगा. संभव है, लोकपाल भी भ्रष्ट हो जाये तो क्या होगा? क्या हमारा किसी एक संस्था पर इतना विश्वास जायज़ है? क्या लोकपाल संस्था में बैठने वाले लोग स्वर्ग या परलोक से आयेंगे? सब पर शक करने वाले और उंगुलियां उठाने वाले महात्मा बुद्ध की वह सीख भूल जाते हैं कि किसी पर ऊँगली उठाने पर चार उंगलियाँ अपनी तरफ भी होतीं हैं.

मेरी समझ से सिर्फ लोकपाल बनाने से भ्रष्टाचार रुपी राक्षस से छुटकारा नहीं पाया जा सकता. मगर टीम अन्ना का यही मानना है. वह समझती है कि लोकपाल ही सारी समस्या का हल है. दूसरी समस्या इस टीम के साथ है कि जो इन्होने कहा वही सही मन जाये. ऐसा नहीं होता. खासकर लोकतंत्र में आपको सभी पक्षों को सुनना होता है और जो सर्वसम्मति से हल निकले उसके लिए प्रयास करने होते हैं. पर नहीं, यदि टीम अन्ना ने कोई बात कह दी तो वह पत्थर की लकीर हो गयी. जो उनकी कही बात कहेगा वही भ्रष्टाचार- विरोधी है और जो कहेगा कि नहीं उनके विचारों में बदलाब की आवश्यकता है तो वह भ्रष्टाचार समर्थक है .

कहा जा रहा है कि देश को राजनीतिक विकल्प देना है, इसलिए पार्टी बनाने की ज़रुरत महसूस हुई . क्या पार्टी बनाना और चुनाव लड़ना ही राजनीति होती है. हमें राजनीति की परिभाषा को इतना सिमित तरीके से नहीं देखना चाहिए. सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में एक पतली सी रेखा होती है, यानी जो काम सामाजिक है वह राजनीतिक भी है और जो राजनीतिक है वह सामाजिक भी है. राजनीति में बदलाब के लिए चुनाव लड़ना उतना आवश्यक नहीं है, जितना जन चेतना पैदा करना. इस देश में चुनाव लड़ने वालों की कमी नहीं है, हाँ, यदि कमी है तो सच्ची भावना, लगन और मेहनत से जन जागरण करने वालों की. महात्मा गाँधी ने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा पर विश्व में एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन करके दिखाया. ज़रुरत मजबूत इरादों और प्रबल राजनीतिक इच्छा की है न की राजनीतिक दलों की. क्या टीम अन्ना बताएगी कि उहोने देश में जनमत बनाने के लिए कहाँ कहाँ भ्रमण किये ? गाँधी जी जैसे इंसान, जो पहले ही दक्षिण अफ्रीका में आंदोलनों का नेतृत्व कर चुके थे, को भी गोपाल कृष्ण गोखले जी के कहने पर पूरे एक साल तक देश का भ्रमण करना पड़ा ताकी वह देश की समस्याओं, संस्कृति, वेश- भूषा और खानपान से अपने आप को अवगत करा सकें. टीम अन्ना की तरफ से ऐसी कोई पहले देखने को नहीं मिलती. इनका तो पूरा आन्दोलन मीडिया और सोसल नेटवर्किंग पर चल रहा था. क्या कभी इन्होने गाँव गाँव जा कर लोगों की राय जानने की कोशिश की? नहीं ! आज भी भारत की 70 प्रतिशत आबादी 6 लाख से जियादा गावों में वास करती है. इतनी बड़ी आबादी को कभी भी इस आन्दोलन में विस्वास में नहीं लिया गया. जब भी जनता की राये पूँछी गयी तो फेसबुक और एस एम् एस के द्वारा. भारत के 120 करोड़ लोगों में कितने लोग फेसबुक और एस एम् एस का प्रयोग करते हैं? कुछ शहरों घूम कर मीटिंग कर लेना और यह मान लेना कि हमने हर किसी भारतीय की राय ले ली तो यह यह उचित नहीं होगा . सही तरीक यह होता कि कुछ साल इस मुद्दे पर देश भर में घूम कर लोगों में जागरूकता पैदा की जाती और ग्रामीण और शहरी लोगों को इसमें जोड़ा जाता. परन्तु टीम आना की लोगों की राय लेने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. यह लोग तो बहुत जल्दी में थे जैसे व्यस्था परिवर्तन का काम दो दिन का हो. जो अन्ना टीम के चार पांच लोगों ने कह दिया वहीँ अंतिम सत्य मान लिया गया. और तो और टीम को चार-पांच के अलावा बढाया नहीं गया. पिछले 18 महीनों में टीम में कितनी बार विरोधाभास दिखे. अरविन्द केजरीवाल के अड़ियल रवये को मीडिया ने कई बार मुद्दा बनाया. यह कैसी लोकतंत्र को घेहरा और मज़बूत करने की लडाई है कि एक आदमी जो कहे वह सही और सबको वही मानना पड़ेगा. समाज और राजनीति में बदलाब के संघर्षों में इंसान को समावेशी और दूसरे की सोच का आदर करने वाला होना चाहिए, वरना लोकतंत्र और तानाशाही में अंतर ख़त्म हो जाता है.

कितनी हास्यापद बात है कि इस आन्दोलन की तुलना जे पी के 70 के दसक के संपूर्ण क्रांति के आन्दोलन से की जा रही है. जे पी का आन्दोलन व्यापक था और सबसे बाड़ी बात कि वह नीचे से ऊपर की तरफ था बल्कि अन्ना का आन्दोलन ऊपर से नीचे की तरफ है. यह सच बात है कि जे पी संपूर्ण क्रांति के आन्दोलन में भूल गए कि किसी भी आन्दोलन की जान उसकी विचारधारा और मूल्य होते हैं, परन्तु जे पी सरकार को गिराने और हटाने के चक्कर में यह भूल गए कि वह किस तरह के लोगों का साथ ले रहे हैं. जे पी ने गांधीवादी होते हुए भी दक्षिण पंथी लोगों से तक समर्थन लिया और आर एस एस जैसी कट्टरपंथी संस्था का साथ लिया. इस संस्था के एक कार्यक्रम को जे पी ने संबोधित भी किया. सही लोगों का चयन न कर पाने के कारण जो सरकार 1977 में सत्ता में आई उसे बहुत जल्दी सत्ता से हटना पड़ा क्योंकि सही लोग उस आन्दोलन से नहीं जुड़ पाए और सत्ता के लालची लोगों ने सरकार में अपना सिक्का जमा लिया था. ठीक उसी तरह अन्ना के आन्दोलन में चीजे देखने को मिलीं. मंच पर सभी कट्टर और उदार संथाएं और लोगों का आना हुआ. कई बार तो पूरे आन्दोलन को आर एस एस द्वारा चलाने का आरोप भी लगा. जे पी की तरह यह आन्दोलन भी एक व्यक्ति पूजा पर ही आधारित रहा. कई बार तो ऐसा भी समय आया कि अरविन्द केजरीवाल ने अन्ना को संसद से भी ऊपर बता दिया. यह सुन कर कई बार लगा कि भारत के संविधान में इन लोगों की आस्था है भी कि नहीं. एक व्यक्ति चाहे वह कितना भी ईमानदार, मज़बूत और ज़रूरी क्यों न हो, लोकतान्त्रिक व्यवस्था और संविधानिक संस्थाओं से ऊपर नहीं हो सकता. कानून की नज़र में संविधान सर्वोपरि है कोई व्यक्ति विशेष नहीं चाहे .

अब जब इन लोगों ने एक राजनीतिक दल बनाने का निर्णय कर ही लिया है, तो सवाल उठाना लाज़मी है कि पार्टी की विचारधारा और पोलिसीस क्या होंगी? क्या जो लोग सिर्फ अपनी बात ही सच मानते हैं, वह लोकतान्त्रिक व्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं? क्या वह लोग जो 2006 में सामाजिक न्याय की लडाई के विरोध में आन्दोलन चला चुके हैं, समाज में समरसता और बराबरी की लडाई को आगे बढायेंगे या उसको नुकशान पहुंचाने की भरपूर कोशिश करेंगे ? मुझे याद आता है कि 2006 में सरकार ने शेक्षिक संस्थाओं में आरक्षण के लिए कानून पास किया तो लोकपाल आन्दोलन के अरविन्द केजरीवाल ने यूथ फॉर एकुयेल्टी नामक संघठन का पूरा साथ दिया और इस आरक्षण का पूरे दम-ख़म से विरोध किया था. यह लोग सामाजिक न्याय की लडाई को अधिक हानि नहीं पहुंचा पाए क्योंकि 2008 में सर्वोच्य न्यालय ने 27 प्रतिशत ओ बी सी आरक्षण को संवेधानिक करार दे दिया और इन लोगों को मुंह की खानी पड़ी थी. सवाल यह उठता है जिस देश में गैर-बराबरी हर स्तर पर हो, जहाँ लोगों को अभी तक हम शिक्षा जैसी ज़रूरी चीज़ नहीं पहुंचा पाए हैं, टीम अन्ना को सामाजिक न्याय के मुद्दे पर देश के सामने अपनी राय रखनी ही होगी. देश की जनता इस नई बनने वाली पार्टी से यह जानना ज़रूर चाहेगी कि सामाजिक न्याय के मुद्दे पर इनका क्या रवईया रहेगा. यह देश विविधताओं से भरा हुआ है, क्या यह नहीं पार्टी इस विविधता को सम्मान देगी ? क्या इस नई पार्टी की सोच में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उनके विकास की कोई जगह होगी ? क्या दलितों के लिए इस पार्टी में कोई सोच चल रही है या नहीं ? टीम अन्ना के पिछले 18 महीने के इतिहास से तो इन दोनों मसलों पर निराशा ही हाथ लगती है. टीम अन्ना ने अपने बीच कभी भी अल्पसंख्यकों और दलितों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया, इसलिए मेरा शक और मज़बूत होता है कि लोकपाल तो सही है और यह संस्था बननी भी चाहिए पर इस संस्था से ज़रूरी सवाल सामाजिक न्याय, बराबरी, और सरकारी संस्थाओं में मौके की बराबरी का है. क्या टीम अन्ना की यह नई पार्टी यह सब सुनिश्चित कर पायेगी? इनके हालिया इतिहास से तो ऐसा विश्वास नहीं होता. देश में अभी बहुत से ज्वलंत मुद्दे चल रहे हैं लेकिन टीम अन्ना ने कभी भी इनपर राय नहीं दी. अब तो आपको सभी मुद्दों को उठाना पड़ेगा और राय भी बनानी पड़ेगी. जनता उसकी निंदा भी करेगी तो टीम अन्ना को सहनशील भी होना पड़ेगा. मै इंतज़ार के लिए तैयार हूँ .

सवाल यह भी है कि क्या सबको चोर भर कह देने से समस्या का हल हो जायेगा ? यदि टीम अन्ना सही मायनों में इस देश को राजनीतिक विकल्प देना चाहती है तो इस टीम को हर मुद्दे पर अपनी एक राय रखनी होगी. यह राय गरीबी हटाने से लेकर विदेश निति तक होनी होगी . पर कहने और करने में ज़मीन आसमान का अंतर होता है. हाँ, इनसे इतनी जल्दी इतनी अधिक उमीदें बंधना भी ज़ियादती होगी पर अभी से इन्हें अपना रुख धर्मनिरपेक्षता, समावेशी विकास, लोकतंत्र , विदेश निति, आर्थिक निति, विश्व शांति इत्यादी पर बनानी होगी. इन्हें यह भी बताना होगा कि कल जा कर अगर यह सत्ता में आते हैं, तो न्यायिक, पुलिस, प्रशासनिक और चुनावी सुधारों पर इनका क्या रुख रहेगा ? और हाँ, क्या टीम अन्ना की बनने वाली पार्टी भी वही जाति, धर्म और धन-बल के तरीके अपनाएगी जो मुख्यधारा के दल अभी तक अपनाते आये हैं? मैं आखिर में उनको यह याद भी दिलाता चलूँ कि भारत सिर्फ फेसबुक और एस एम् एस से नहीं चलता. अगर जनता से जुड़ना है तो विडियो कोंफेरेंसिंग की सोच से आगे निकलना पड़ेगा. आज भी भारत गाँव में रहता है जिसकी राय कभी टीम अन्ना ने ली ही नहीं. भारत का विकास गाँव और शहरों को मिला कर होगा. इसलिए टीम अन्ना पार्टी को शहरों और टी वी स्टूडियो से निकल कर असली भारत के दर्शन करने होंगे.

(लेखक अलीगढ मुस्लिम विश्वविधालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं.)

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