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BeyondHeadlines > Latest News > रंगभेद के खिलाफ गांधी ने खेला था फुटबॉल
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रंगभेद के खिलाफ गांधी ने खेला था फुटबॉल

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published January 30, 2013 45 Views
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5 Min Read
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Smita Mishra for BeyondHeadlines

महात्मा गाँधी आधुनिक भारत की अन्यतम विभूति थे. 1893 में बैरिस्टर के रूप में वे एक भारतीय मुसलमान व्यापारी के साथ दक्षिण अफ्रीका गए थे. भारत में सक्रिय राजनीति का अभिन्न अंग बनने से पूर्व गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में एक युवा वकील की हैसियत से अपना कैरियर प्रारंभ किया. वहाँ अंग्रेजो द्वारा भारतीयों के उत्पीड़न को देखकर वे क्षुब्ध हो उठे. उन्होंने अंग्रेजो के अमानवीय आचरण के विरोध का संकल्प किया और इसके निमित्त सन 1894 में नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की. सन 1914 तक वहाँ के भारतीयों का सफल नेतृत्व करते हुए सविनय अहिंसक आन्दोलन के बल पर उन्होंने अंग्रेजो को अनेक काले कानूनों को रद्द करने पर विवश कर दिया. इस पूरे आन्दोलन में गांधीजी ने फुटबॉल को माध्यम बनाया.

क्रिकेट और साईकिलिंग के शौकीन गांधीजी ने आश्चर्य जनक रूप से फुटबॉल को रंगभेद विरोध का प्रमुख हथियार बनाया. फुटबॉल के माध्यम से ही उन्होंने अपने विचारों का प्रचार प्रसार किया. चूंकि गांधी जी ने इंगलैंड से कानून की पढ़ाई की थी. उस प्रवास के दौरान वे अच्छी फुटबॉल खेलना भी वे सीख गए थे. गांधी जी अपने दक्षिण अफ्रीकी प्रवास के दौरान फुटबॉल से बहुत नजदीकी रूप से जुड़ गए. उन्होंने पाया कि दक्षिण अफ्रीकी समुदाय में इस खेल के प्रति अत्यंत लगाव है. गांधीजी को बहुत जल्दी ही यह बोध हो गया कि वहां के वंचित वर्ग में फुटबॉल अत्यंत लोकप्रिय है. इसलिए राजनीतिक विचारों के प्रसार में फुटबॉल अत्यंत प्रभावी सिद्ध होगा. एकल खेल की अपेक्षाकृत टीम खेल होने के कारण इसमें सामूहिकता ज्यादा थी.

Gandhi Football Team

दक्षिण अफ्रीकी सरकार की रंगभेद नीति का विरोध और लोगों को एकत्र करने का साधन गांधी जी को मिल गया. गांधी जी ने जोहानसबर्ग और प्रिटोरिया में पैसिव रिसिस्टर के नाम से फुटबॉल क्लब स्थापित किया. वे स्वयं उस क्लब के मैनेजर बने. गांधी जी ने फुटबॉल जैसे रोमांचक, गतिपूर्ण और उत्तेजना से पूर्ण खेल को रंगभेद नीति के खिलाफ आवाज़ उठाने के माध्यम के रूप में चुना. 

गांधी जी ने खेल के साथ अहिंसा और सत्य के माध्यम से संघर्ष करने का आह्वान किया. गांधी जी फुटबॉल मैचों में मध्य अंतराल के दौरान अपनी टीम को कम उत्तेजित होने का व्याख्यान भी देते थे. इस प्रकार गांधी जी ने अपने सत्याग्रह के सिद्धांतो को फुटबॉल के मैदान से ही फैलाना शुरू किया. गांधी जी ने अपने खेल प्रेम को लोगों में जागरूकता फैलाने के साधन के रूप में प्रयोग किया. उन्होंने खेल के द्वारा लोगों को समाज में समान अधिकार और एकीकरण के लिए अहिंसक कार्रवाई के लिए प्रेरित किया. जिससे उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक न माना जाए.

निर्विवाद रूप से गांधी जी रंगभेद के विरूध आवाज़ उठाने वाले समुदाय के नेता बन गए. उन्होंने पिछली सदी में तीन फुटबॉल क्लबों की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई. ये क्लब डर्बन, प्रिटोरियो और जोहानसबर्ग में स्थापित हुए. इन तीनों क्लबों को नाम दिया गया पैसिव रैसिस्टर सौकर क्लब. गांधी जी का खेलों के प्रति लगाव प्रारंभ से ही था. खेल का विशुद्ध मनोरंजन के तौर पर ही वे लेते रहे. लेकिन दक्षिण अफ्रीका में उन्हें यह अहसास हुआ कि खेल की ताकत विशुद्ध मनोरंजन से परे भी कोई लक्ष्य हो सकता है. खेल के द्वारा राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति भी की जा सकती है. फीनिक्स समझौते के स्थल रूप में फीनिक्स खेल के मैदान को संरक्षित किया गया है. जहां गांधी जी समतल खेल का मैदान बन गया था. जोहानसबर्ग में वालस्ताप फार्म भी ऐसा ही स्थल है. इन स्थानों पर खेले जाने वाले मैचों का पैसा उन परिवारों को दिया जाता था जो रंगभेदपूर्ण कानून से त्रस्त होकर अहिंसापूर्ण उसका मुकाबला कर रहे हैं. 1910 में इसी क्लब की जोहानिसबर्ग और प्रिटोरिया की टीमों के बीच खेले गए मैच का उद्देश्य अलगाववादी कानून के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले सौ कमरेड़ो की गिरफ्तारी का विरोध करना था.

खेलों को राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रयोग करने के अतिरिक्त खेलों को भाईचारा और सौहार्द बढ़ाने के साधन के रूप में प्रयोग करने में भी गांधीजी एक नए सूरज की भूमिका निभाई. गांधी जी मानते थे कि टीम खेलों में समूह भावना विकसित करने की अदभुत क्षमता होती है. इसलिए उन्होंने पैसिव रिसिसटर क्लब में खेल भावना साफ खेल और नैतिक मूल्यों की स्थापना पर अत्यधिक बल डाला.

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