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आम इंसान खुद डॉक्टर बन बैठा है… जानिए कैसे?

Anita Gautam for BeyondHeadlines

विक्स विपोरब जो कि यूरोपियन देशों में प्रतिबंधित है, भारत में खुल्लेआम धड़ल्ले से बिक रही है. अपितु इसका विज्ञापन के माध्यम से भी प्रचार हो रहा… बंद नाक से तुरंत राहत दे, विक्सविपोरब…

भारत की अपेक्षा यूरोपियन देशों मे ठंड ज्यादा होती है, फिर भी वहां की सरकार ने इसे बैन कर रखा है. गलती से यदि कोई डाक्टर मरीज़ की दवा पर्ची पर लिख भी देगा तो उसे 14 वर्ष की जेल के साथ उसे अपनी डॉक्टरी डिग्री से भी हाथ धोना पड़ता है. यह बाम इतनी घातक है कि अस्थमा, दमा और ब्रोंमकाइटिस अर्थात् मनुष्य में फिट्स आने तक की बीमारी पैदा कर सकती है.

विपरित इसके आमतौर पर भारत में डॉक्टर जुखाम या अस्थमा की शिकायत होने अथवा छोटे बच्चों को सांस में होनी वाली तकलीफ में बच्चे को विक्स की भाप देने की सलाह देते हैं. आप स्वयं सोचिए जिस बाम के प्रयोग से फिट्स तक होने की आशंका हो सकती है, तो फिर डॉक्टर इसे खुले आम मरीजों को खास तौर से बच्चों के लिए लगाने की सलाह क्यों देते हैं?

बात सिर्फ विक्स तक ही सीमित नहीं है. विज्ञापनों के माध्यम से आम इंसान खुद डॉक्टर बन बैठा है. दांतों में दर्द, सूजन या पानी लगता हो अथवा सेंसिटीव टूथ के लिए अपनाएं सैंसोडाईन, आजकल खुब प्रचलन में है. तो वहीं बुखार, सरदर्द, बदनदर्द के साथ सर्दी-जुखाम के लिए क्रोसिन एडवांस और  क्रोसिन कोल्ड एंड फलू नामक दवा बिना किसी डॉक्टर के सुझाव से आप ले सकते हैं.

वहीं दूसरी ओर बाजार में महिलाओं के लिए भी आकर्षित और दवायुक्त घरेलू उपचार और निदान भी हैं. मैनकाइंड की प्रैगा न्यूस- अब घर में ही प्रेगनेंसी कंफर्म करने का आसान तरीका, केवल पांच मिनट में ही परिणाम जानिए… और अगर गलती से कल रात बड़ी गलती हो गई हो और प्रिकॉशन नहीं लिया हो तो अनचाही पे्रगनेंसी 72 घंटों के अंदर अनवान्टिड-72 लिजिए और अनचाही प्रेगनेंसी को रोकिए… इस बात के विपरित यदि आपको प्रेगनेट होने का उचित दिन जानना है तो इसके लिए भी बाजार में ऐसी दवा या किट विज्ञापन के माध्यम से आसानी से मिल जाएगी.

अब आप ही सोचिए जहां एक और दवाओं का खुला व्यापार है वहां डॉक्टर भी दवा कंपनियों की साठ-गांठ से दवाईयां लिखते हैं और जानबुझ कर ऐसी दवाएं, जिनकी ज़रूरत ही नहीं होती, लिखते हैं.

इस देश में जानवरों पर प्रतिबंधित दवाओं का खुलेआम इस्तेमाल होता है. उपरोक्त लिखी बातों से निष्कर्ष लगाया जा सकता है कि आम इंसान के स्वास्थ्य और जीवन से खिलवाड़ करना सरकार के लिए बहुत ही आसान है.

2012 के संसद शीतकालीन सत्र के दौरान एक मंत्री द्वारा भ्रमित करने वाले विज्ञापनों के बारे में चर्चा हुई. चर्चा के दौरान अनेक प्रश्न उठाए गए जिसके उत्तर में मनीष तिवारी, जो कि सूचना एवं प्रसारण मंत्री हैं, उन्होंने आनन-फानन में कुछ कंपनियों पर 10 लाख रूपयों तक का जुर्माना करने की बात कही थी और बाकि कंपनियों के खिलाफ कार्यवाही तक करने बात कह डाली थी किन्तु यह उचित कार्यवाही कितनी सफल हुई आज तक इसका खुलासा नहीं हो पाया और न ही आज तक ऐसे विज्ञापनों पर बैन लगा.

सरकार तो खुले आम राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में हुए घोटालों पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं कर पाई. अलबत्ते मामले को ठंडे बस्ते में कैद कर दिया गया. देश की राजधानी के बड़े अस्पताल एम्स और सफदरजंग जैसे अस्पालों में आज तक एक भी एयर एंबंलेंस तक की व्यवस्था नहीं है और ज़रूरत पड़ने पर यही सरकार निजी अस्पतालों के सामने हाथ फैलाती है तभी शायद उचित अस्पताल, सही दवा और डॉक्टर के अभाव में इंसान को अपने बहुमुल्य जीवन से हाथ धोना पड़ता है.

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