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BeyondHeadlines > Holi Special > त्यौहार रंगो से नहीं दिल से मनाए जाते हैं…
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त्यौहार रंगो से नहीं दिल से मनाए जाते हैं…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published March 27, 2013 23 Views
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7 Min Read
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Anita Gautam for BeyondHeadlines

होली रंगों का त्यौहार, नीले-पीले, लाल गुलाबी चारों ओर रंगमय खुशनुमा माहौल, कुछ लोग रंग खेलते हैं तो कुछ होली को नशे के साथ धूमधाम से मनाते हैं. पर मेरा मानना है कि त्यौहार अनेक रंगो से नहीं दिलों से मनाए जाते हैं.

लोगों का कहना है इस दिन सारी दुश्मनी भूला दुश्मन को भी गले गलाना चाहिए. अगर किसी के मन में किसी के प्रति बैर है तो उसे हमेशा के लिए समाप्त करना चाहिए न कि सिर्फ एक दिन हर बातों को भूल, अपने दुश्मन को गला लगाना उचित होगा और वो भी दिल से.

त्यौहार होली के रंगों और दिपावली के दीयों से नहीं दिलों से मनाए जाते हैं, हाथ में रंग थामे जबरन लोगों को रंग लगाना आसान हो सकता है, पर लोगों के मन में बुरे भाव को निकालना उतना ही मुश्किल. दीपावली पर अपने घरों को रोशन तो हर इंसान करता है, पर किसी अंधियारे के घर रोशनी करना, गोवर्धन पर्वत उठाने समान है. 364 दिन भगवान को भूल जाना और एक दिन एकाएक धर्म और संस्कृति की बात करना… मेरे लिए हर रोज होली और दीपावली है. मात्र एक दिन नहीं…

Photo Courtesy: santabanta.com

जबसे समाज को समझने की शक्ति आई है, मैंने आजतक हिन्दू हो कर भी कभी कोई भी एक दिवसीय त्यौहार अर्थात् सिर्फ एक दिन भगवान का नाम लेना, एक दिन पवित्रता की बात करना, साल भर महिलाओं और बच्चियों को बुरी नज़र से देखना पर नवरात्रों में देवी का रूप मान पूजा करना, साल भर पति को गाली देना और एक दिन उसकी लंबी आयु की मंगलकामना करना, तो श्राद्ध के नाम पर अपने पितरों के नाम पितरों के मनपसंदीदा भोजन बना ब्राह्मणों को भोजन कराना पर ये भूल जाना कि जिसको जिंदा पर पानी देना आफत सा लगता था, उसके हिस्से की एक रोटी सेंकना बहुत मुश्किल काम था, आज उसके मरणोपरांत श्राद्ध कर रहे हैं…

लोग एक दिपावली के त्यौहार को मनाने में हजारों लाखों रूपये तक बरबाद कर देते हैं, अपने घर का कोई कोना नहीं छोड़ते जहां रोशनी न हो, यहां तक कि लोग बाथरूम के बाहर दीया लगाकर लक्ष्मी का स्वागत करते हैं, लेकिन देश में ऐसे भी अनेक घर हैं जहां एक समय भी लोग ठीक से खाना नहीं खा पाते, कोई बीमारी के कारण गरीब है, तो कोई गरीबी के कारण गरीब है, उस घर में कोई एक मोमबत्ती का उजाला करने के नाम पर एक मोमबत्ती देते हुए लाखों बार सोचता है, पर बात जंतर-मंतर और इंडिया गेट पर हो रहे प्रोटेस्ट की हो तो लोग मोमबत्तियों पर मोमबत्त्यिां लिये चल देते हैं. लोगों को प्रोजेस्ट करना, जुलुस निकालना, बलात्कारी को फांसी की सजा देने की मांग करना ज़रूरी सा लगता है, पर वहीं लोग अपने अंदर के इंसान को मार देते हैं. और उन्हीं में से अनेक रेपिस्ट तैयार होते है.

मुझे नहीं लगता दामिनी के मरने के बाद भी देश में रेप के अपराध पर कुछ काबू भी पाया गया हो अलबत्ते रेपिस्टों को एक सैक्स के नाम नया रॉड स्टाईन भी पता लग गया. होली के रंगों के साथ-साथ लोग मादक पदार्थों के नशे में चूर लोग त्यौहार के नाम पर कोई ऐसी जगह नहीं छोड़ते, जहां महिलाओं के साथ बदसलूकी न हो. लोग त्यौहार तो बड़ी धूमधाम से मनाते हैं, पर उस त्यौहार के पीछे की कहानी, उसको मनाने का औचित्य, लोगों की अवधारणा तक को भूल जाते हैं.

अजीब है मेरा देश, मेरे घर होली के रंग, दीपावली की रोशनी, मिठाईयां ही मिठाईयां, तो दूध में ठंडाई का स्वाद और दूसरी ओर मेरा पड़ोस का मकान जो टूटा है, जिनके घर कमाने वाला एक इंसान, बेटी की शादी की जिम्मेवारी, पढ़े लिखे बेटे को नौकरी की समस्या, बहु की डिलीवरी की चिंता, छोटे बेटे की नशे की लत, बड़ी बेटी के पति ने दहेज के लिए उसे अपने घर से निकाल दिया उसका हर रोज सामाजिक दबाव, इतनी परेशानी के साथ जी रहे लोगों के लिए आप ही बताइए क्या होली क्या दिपावली?

और मैं, जब से होश संभाला मां-पिताजी को हालात से जुझते पाया, हम तीन भाई बहनों के अच्छे भविष्य के लिए माता-पिता ने कठोर परिश्रम किया. जब भैया घर की जिम्मेवारियां संभालने लायक हुए तो अचानक एक्सीडेंट से रीढ की हड्डी टूट गई, एक मिनट न बैठने वाला मेरा भाई इतने सालों से बिस्तर पर लेटा पल-पल मर रहा है, तो कुदरत का क़हर, दो साल पहले बारिश के कारण एकाएक हमारा घर ढह गया, उसे ठीक करवाने के पैसे नहीं थे क्योंकि उसी दौरान मेरे पिताजी ब्रेनफिवर के कारण हॉस्पिटल में कोमा में पड़े थे, ठीक होने के बाद भी आए दिन बुढ़ापा उनकी आयु से कुछ साल पहले ही आ गया.

कोई रात ऐसी नहीं जब दिल में छुपाए दर्द को ले हर रात मेरी मां सोते हुए आंखों में नींद से पहले भैया, परिवार और शायद मेरी चिंता और आंसूओं के साथ न सोए, तो आप ही बताईए मेरे लिए, मेरे परिवार के लिए किसी होली दिपावली का क्या मलतब. ये त्यौहार तो खुशियों के लिए मनाया जाता है, पर मेरे चौखट पर न जाने कब वो खुशियां आई और कब चलीं गईं कुछ पता ही नहीं लगा.

पर फिर भी साल में एक दिन त्यौहार के नाम करना, मुझे नहीं लगता वो असली त्यौहार होगा, अगर आप वास्तव में त्यौहार में मनाना चाहते हैं, तो हर दिन को पवित्र और विचारधारा को शुद्ध करीए. ईश्वर उपवास करने वाले से खुश होने की बजाय नेक काम करने वाले खुश होते हैं. सिर्फ गंगा में डुबकी लगाने भर से ही पवित्रता नहीं होती, पवित्र होने के लिए मन के पाप को समाप्त करना पड़ता है.

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