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Reading: दिलवालों की दिल्ली में क्यूँ लगता है डर…?
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BeyondHeadlines > Latest News > दिलवालों की दिल्ली में क्यूँ लगता है डर…?
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दिलवालों की दिल्ली में क्यूँ लगता है डर…?

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published March 12, 2013 9 Views
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9 Min Read
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Nadeem Ahmad for BeyondHeadlines

16 दिसंबर का ग़म अभी ख़त्म भी नहीं हुआ है और राजधानी में बलात्कार का सिलसिला जारी है. न तो इस पर सरकार लगाम कस रही है और न ही पुलिसवालों का इस पर कोई कंट्रोल नज़र आता दिख रहा है. 16 दिसंबर के हादसे के बाद उभरे आंदोलन को देख कर ये समझ मे आ रहा था कि शायद इसके बाद किसी लड़की का बलात्कार नहीं होगा. अब किसी कि इज्ज़त नहीं लुटेगी. अब कोई लड़की मौत को गले नहीं लगाएगी. अब किसी को बेटी पैदा करने का अफसोस नहीं होगा. मगर यह आंदोलन भी बेकार साबित होता नज़र आ रहा है.

औरतें आज भी परेशान और डरी सहमी हैं. भले ही वो अपने घरों मे क्यूँ न हो.  दफ्तर मे क्यूँ न हो.  सड़कों पर.  बसों में.  ट्रेनों में.  समाज में और हर ऐसी उन जगहों पर जहां इंसान बसते हैं. आज हमारे समाज में कहीं भी किसी भी हाल में किसी न किसी तरह से हर तरह के ज़ुल्म से महिलायें जूझ रही हैं. यह सच है कि आज की तस्वीर में समाज ने औरतों पर हो रहे अत्याचार को भी बर्दाश्त नहीं किया है, क्यूँकि हमारे ही समाज मे औरतों को बेहतर स्थान हासिल है लेकिन अब सूरत बदलने लगी है. आज एक औरत को अपने घरों मे अपने पति,  बाप , भाई और यहाँ तक की औरत को औरत से भी ख़तरा लगने लगा है, क्यूंकि लगातार उन पर किसी न किसी तरह से अत्याचार हो रहा है. हमारे यहाँ हर जगह पर औरतों को जूतों की नोक पर रखा जाता है और मौका मिलने पर हवस का शिकार बनाया जा रहा है.

Fear, Anger, Femininity: Sexual Violence in Delhi

हमारे देश कि बदनसीबी ये भी है कि देश के आम नागरिक के अलावा हमारे सफ़ेद लिबास के नेता, सरकारी अधिकारी और रक्षक पुलिस भी इस ज़ुल्म मे बराबर के शरीक हैं और मौका देख कर ये भी अपना मुंह काला कर लेते हैं. और अपनी ताक़त के बल पर बच भी निकलते हैं. देश के हर हिस्से मे चाहे कश्मीर हो,  चाहे आदिवासी महिला हो,  घरों मे झाड़ूँ-पोछा करने वाली हो,  सड़कों पर भीक मांगने वाली हो या किसी सरकारी दफ्तर हो, हर जगह पर इनकी इज्ज़त को लूटा जाता है.

जिस समय हम दिल्ली के राजपथ और इंडिया गेट पर तहरीर चौक की याद को ताज़ा कर रहे थे. उस दौरान भी बाप और भाई मिलकर पिछले कई महीनों से अपनी ही बेटी और बहन कि इज्ज़त लूट रहे थे. ज़ाहिर है जब बाप-भाई ही दरिंदगी पर उतर आए तो ऐसे में भला एक मज़लूम लड़की अपना मुंह कैसे खोल सकती है ? किस पर इल्ज़ाम लगा सकती है ?

अगर वो गलती से हिम्मत कर भी लेती है तो पुलिस थाने में उसकी बाकी इज्ज़त भी लूट ली जाती है. हमारे समाज में इतना ही नहीं होता है, बल्कि एक औरत भी दूसरी कमजोर और ग़रीब लड़की का बलात्कार करवाने में पीछे नहीं हटती. अभी हाल ही में दिल्ली के बटला हाउस में एक मालकिन ने अपनी नौकरानी को चाये में नशा डालकर बेहोश कर दिया और लगातार 2 दिनों तक उस लड़की का बलात्कार करवाती रही. इस केस से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जब एक औरत उस दर्द का एहसास नहीं समझ सकती तो भला कोई शिकारी से हम क्या उम्मीद कर सकते है ?

दिल्ली मे एयर होस्टेस गीतिका शर्मा ने 14 अगस्त 2012 को हरियाणा के मंत्री गोपाल कांडा के ज़ुल्म से तंग आकर खुद को मौत के हवाले कर दिया. इस सदमे को गीतिका की माँ अनुराधा शर्मा बर्दाश्त नहीं कर सकी और कांडा की तरफ से मिल रही धमकी से घबरा कर खुद को भी बेटी के ग़म से परेशान माँ ने मौत को अपना नसीब समझ कर पंखे से लटका लिया. दिल्ली के ही लाजपत नगर मे एक केबल का काम करने वाला शिकारी 19 साल की लड़की को उसके ही घर में बलात्कार करने की कोशिश की, मगर जब इस नापाक इरादे मे कामयाब नहीं हो सका तो लड़के ने उस लड़की के मुंह मे ही लोहे का राड डाल कर बुरी तरह से ज़ख्मी कर दिया. जिस वक़्त दिल्ली में सामूहिक बलात्कार का आंदोलन चल रहा था उसी समय मे कालकाजी के एक मकान में नौकरानी की इज्ज़त को लूटा जा रहा था.

हम उस लोकतंत्र में रहते हैं और खुद को आदर्शवादी भी कहते हैं जहां एक पति अपनी ही पत्नी की इज्ज़त को सिर्फ 10 हज़ार मे सरेआम बेच देता है. बदले में सौदागरों ने एक हफ्ते तक उस औरत के साथ उसके ही घर मे बलात्कार करता रहा. ये किस समाज और किस युग के इंसान हैं, कि अपनी पत्नी को शिकारी के हाथों एक हफ्ते के लिए बेच दिया और घर मे ताला लगाकर बाहर उसका पति बैठ गया अंदर उसकी इज्ज़त लुटती रही मगर उसके पति को ज़रा भी अफसोस नहीं हुआ. महिला ने जब हिम्मत करके इंसाफ के लिए आवाज़ उठाई तो रिश्तेदारों ने भरी पंचायत में घसीट-घसीट कर उसकी पिटाई कर दी.

दरअसल इन सभी हादसों मे एक बात सामने आती है कि लोगों के सोच में अभी तक महिलाओं के प्रति कोई अच्छी सोच पैदा नहीं हुई है. वो ये समझते हैं कि औरत है तो सिर्फ बिस्तर गर्म करने के लिए ही है. शायद इसलिए ही बलात्कारी को उस दर्द का एहसास नहीं होता है और न ही वो औरतों की उम्र देखता है. हमारे देश में तो 5 साल तक की मासूम लड़की को नहीं छोडते तो जवान लड़की का कोई क्या खयाल रख सकता है.

नेशनल क्राईम रिकॉर्ड के मुताबिक देशभर मे 2009-2011 के बीच बलात्कार के 68 हज़ार केस दर्ज किए गए मगर सिर्फ 16 हज़ार को ही सज़ा मिल सकी है. सिर्फ 2011 में ही बलात्कार के 24 हज़ार 206 केस दर्ज किए गये मगर सिर्फ 5 हज़ार 724 को ही सज़ा मिल सकी. 2010 मे देशभर में बलात्कार के 22 हज़ार 172 केस दर्ज किए गये जिसमें से सिर्फ 5 हज़ार 632 को ही कसूरवार पाया गया. 2009 में देशभर मे बलात्कार के 21 हज़ार 397 केस दर्ज किए गये मगर सिर्फ 5 हज़ार 316 को ही सज़ा मिली. वहीं देशभर में साल 2009-2011 के बीच छेड़खानी के एक लाख 22 हज़ार 292 केस दर्ज किए गये हैं लेकिन अफसोस के इनमें से सिर्फ 27 हज़ार 408 का ही इल्ज़ाम साबित हो सका.

शायद हम ये भूल जाते हैं की औरत का हमारे समाज मे कितना अहम रोल है. इनके बिना तो दुनिया ही नहीं चल सकती. जो हमे मुहब्बत के हर रूप मे हमारे सामने आती है. कभी माँ बनकर तो कभी बहन, कभी बीवी तो कभी दोस्त. मगर हम इन तमाम रिश्तों को भूल जाते हैं, जो सबसे खतरनाक है. ज़ाहिर है जब एक औरत से हमे इतने सारे फायदे हैं तो हम फिर कैसे इस रिश्ते को नज़र अंदाज़ कर सकते हैं ? ज़रूरत है तो सिर्फ इन रिश्तों पर भरोसा करने की और ये कोशिश करने की हम  इन्हें आगे लाने के लिए अपने तन मन से तैयार हैं या नहीं ? हमारे पास इस छोटी सी ज़िंदगी मे एक मौका है कि हम अपने समाज मे औरतों को इज्ज़त दें और उनसे मुहब्बत करें जिसकी शुरुआत हम कर सकते हैं.

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