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पुलिस के लोगों को बात करने का सलीका नहीं मालूम

Tarannum Siddiquee for BeyondHeadlines

जब हम दिल्ली में बैठकर बात करते हैं तो हम सिर्फ 20 फीसदी लोगों का ही ख्याल करते हैं. 80 फीसदी आबादी तो ऐसे ही छूट जाती हैं. यह 80 फीसद आबादी वो है जिसे पता ही नहीं कि कानून क्या होता है? और उनके लिए क्या कानून इस देश में है?

और सबसे बड़ी बात यह है कि जो कानून इस देश में है, उनमें काफी पेचीदगियां हैं क्योंकि ज़्यादातर कानून ब्रिटिश के ज़माने के हैं. उनमें अब बदलाव की ज़रूरत है. और बदलाव सिर्फ सिविल लॉ में ही नहीं, बल्कि मुस्लिम पर्सनल लॉ व हिन्दू पर्सनल लॉ में भी बदलाव की दरकार है. यह कितना अजीब है कि महिला पहले उत्पीड़न का शिकार होती हैं और जब वह कानून का सहारा लेती हैं तो और भी ज़्यादा उत्पीड़ित होना पड़ता है. सबूत इकट्टा करते-करते पुराने ज़ख्म भर जाते हैं और नए ज़ख्म पैदा हो जाते हैं.

Tarranum Siddiquee

और उससे भी बड़ी बात यह है कि सिर्फ कानून बना देना ही सबकुछ नहीं है. बल्कि हमें यह भी देखना होगा कि उसका पालन कितना हो रहा है? सरकार को यह भी सोचना होगा कि यह कानून देश के हर नागरिकों तक कैसे पहुंचे? उसका पालन कैसे हो? उसकी सुनवाई कौन करे? हमारे देश का हाल तो यह है कि कानून पालन कराने वाले ही कानून का उल्लंघन करते हैं. महिलाओं का सबसे ज़्यादा शोषण यही करते हैं. हमारी प्रशासनिक व्यवस्था भी बड़ी अजीब है. महिला पुलिसकर्मी भी उत्पीड़न की शिकार हैं.

आप हमें बता दीजिए कि क्या कोई महिला शाम 5 बजे के बाद किसी पुलिस स्टेशन में जाने की हिम्मत कर सकती है? शायद नहीं! और शाम व रात की बात कौन करे दिन में भी कोई महिला पुलिस थानों में नहीं जा सकती. एक सच्चाई यह भी है कि गांव में कई रेप के मामले इन्हीं पुलिस चौकी में हुए और इन्हीं कानून के रखवालों ने किए हैं. क्या कभी आपने इनके बात करने का लहज़ा देखा है?

सच तो यह है कि पुलिस के लोगों को बात करने का सलीका नहीं मालूम… वजह यह है कि पुलिस में बहाली शारिरीक योग्यता के आधार पर होती है न कि शैक्षणिक योग्यता के आधार पर. सिर्फ आईएएस व आईपीएस की बहाली में ही शैक्षणिक योग्यता देखी जाती है. अब ज़रा सोचिए कि यह आईएएस और आईपीएस जनता को हैंडिल तो करते नहीं. जनता को हैंडिल तो वही मैट्रिक या आठवीं पास हवलदार करता है. उस बेचारे को तो खुद ही नहीं पता  होता कि कानून क्या है? जितना उसे ट्रेनिंग में बता दिया जाता है, उससे ज़्यादा वो कुछ भी नहीं जानता. तो ऐसे में ज़रूरत इस बात की है कि पुलिस में बहाली शैक्षणिक योग्यता के आधार पर हो न कि शारिरीक योग्यता के आधार पर. और शैक्षणिक योग्यता कम से कम ग्रेजुएशन रखी जाए.

साथ ही समाज में कानून के प्रति जागरूकता लानी सबसे अहम काम है, क्योंकि फिलहाल हमारे समाज में जागरूकता न के बराबर है. इस काम के लिए मीडिया का रोल सबसे अहम हो सकता है. सोचने की बात है कि जब लोगों को कानून की जानकारी ही नहीं होगी तो वो उसे अपने लिए कैसे लागू करवा पाएंगे?

(तरन्नुम सिद्दिकी जामिया मिल्लिया इस्लामिया के सरोजनी नायडू सेंटर फॉर वूमेन स्टडीज़ में लीगल एडवाईज़र हैं. और यह लेख उनसे बातचीत के आधार पर लिखा गया है.) 

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