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Reading: नक्सलियों की ताक़त बंदूक में नहीं, उनकी नेटवर्किंग में है…
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BeyondHeadlines > India > नक्सलियों की ताक़त बंदूक में नहीं, उनकी नेटवर्किंग में है…
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नक्सलियों की ताक़त बंदूक में नहीं, उनकी नेटवर्किंग में है…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published May 25, 2013 12 Views
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14 Min Read
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Ashish Kumar Anshu for BeyondHeadlines

बस्तर का नाम जब भी आता है, नक्सलियों का जिक्र साथ-साथ छीड़ ही जाता है. महेन्द्र कर्मा बस्तर के पुराने आदिवासी नेता रहे हैं. सलवा जुडूम के साथ प्रारंभ से जुड़े रहे. खैर अब यह महेन्द्र कर्मा हमारे बीच नहीं रहे. उनसे कुछ ही दिन पहले बस्तर और नक्सल की समस्या पर आशीष कुमार ‘अंशु’ ने लंबी बातचीत की थी. जो संभवत: मीडिया द्वारा उनका अंतिम साक्षात्कार है. प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:-

mahendra karma

बस्तर के पिछड़ेपन के लिए किसे जिम्मेवार माना जाए, नक्सलियों को या फिर यहां की राजनीति को?

नक्सल मूल रूप से किसी भी प्रकार के विकास का बुनियादी विरोध करते हैं. इसके पीछे की दलील यह है कि आम आदमी सुविधा भोगी हो जाने के बाद संघर्ष और तथाकथित क्रांति से दूर हो जाता है. यह एक बहुत ही जटिल प्रश्न है. आम तौर पर सरकारों पर यह आरोप लगता है कि पिछड़ेपन के कारणों से नक्सलियों को आधार या धरातल मिलता है. इस पिछड़ेपन के लिए सीधे-सीधे सरकार को जिम्मेवार माना जाता है. बस्तर को लेकर मैं मानता हूं कि यह जगह पिछले तीन दशकों से नक्सलियों का आधार केन्द्र रहा है. आन्दोलन का केन्द्र रहा है और देश में उनके प्रभाव का भी केन्द्र रहा है. उनके काम-काज में अपने आन्दोलन के विस्तार के अलावा कभी आम आदमी की सुविधाओं को लेकर, उनकी बेहतरी को लेकर, आदिवासी समाज के जीवन स्तर में सुधार लाने को लेकर उनकी तरफ से किसी तरह का प्रयास बस्तर में मुझे नज़र नहीं आया और ना ही मैंने किसी से इस संबंध में सुना है. नक्सली बस्तर के सम-सामयिक मुद्दों को लेकर कभी लड़ते हुए नज़र नहीं आए, वे बस्तर में अंतरराश्ट्रीय मुद्दों पर लड़ते हुए दिखे हैं, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरोध में लड़ते हुए दिखते हैं. राजधानी में बैठी सरकार के खिलाफ लड़ते हुए दिखते हैं. या फिर सरकार के प्रतिनिधियों से आदिवासियों को आगे करके लड़ते हुए दिखते हैं. आन्ध्र का जो इनका नेतृत्व है, वह मैदान में नहीं आता. वह आदिवासियों को आगे करके लड़ता है. जो नक्सली बंदूक के जोर पर कुछ भी करा सकते हैं, उनके लिए बस्तर का विकास करा लेना बहुत बड़ी बात नहीं थी. मुझे लगता है कि इस बात को समझने की ज़रूरत है और अंडरलाइन करने की भी. नक्सली आम आदमियों का सहयोग लेकर आम आदमी के नाम पर लड़ रहे हैं लेकिन यह लड़ाई आम आदमियों के लिए नहीं है.

सीआरपीएफ की भूमिका को लेकर बस्तर में अक्सर सवाल उठते रहे हैं। इस पर आपकी टिप्पणी क्या है?

सीआरपीएफ या ऐसे तमाम पारा मिलिट्री फोर्सेस जो बाहर से लाकर यहां लगाई गईं हैं, उन्हें यहां के आम आदमी की सुरक्षा को लेकर या फिर इस क्षेत्र के विकास को लेकर चिन्ता हैं या फिर यह उनकी नौकरी में कहीं शुमार है, मुझे ऐसा कभी नहीं लगा. अपने काम का जो समय होता है, वे सिर्फ उसके खात्मे के इंतजार में होते हैं. यहां नौकरी है, इसे किसी तरह पूरा करो और आगे बढ़ो. यहां नक्सलियों का सफाया हो, इसके लिए कभी उनकी तरफ से कोई प्रयास होता नहीं है. यदि गलत नहीं हूं तो पिछले सात आठ सालों में अबूझमार में एक ऑपरेशन हुआ है. जिसमें दो तीन बटालियन शामिल हुई थी. एरिया डोमिनेशन के लिए हुए उस ऑपरेशन को छोड़ दें तो मुझे लगता नहीं फोर्सेस कहीं और एरिया डोमिनेशन के लिए जा रही है. यदि नहीं जा रहे तो आपका इरादा साफ है कि आप नक्सलियों को यहां से हटाने के लिए नहीं हैं. फोर्सेस बहुत जा रहीं हैं तो रोड़ ओपनिंग के लिए जा रही है. एरिया डोमिनेशन और रोड़ ओपनिंग दो अलग बातें हैं. रोड़ ओपनिंग ये अपने लिए राशन पानी लाने के लिए करते हैं. या फिर कोई वीवीआईपी मेहमान आ जाए तो उसके लिए करते हैं. इसका सीधा सा अर्थ यह है कि बस्तर में सीआरपीएफ नेताओं के लिए है या फिर अपनी हिफाजत के लिए है. उसे आम आदमी की चिन्ता नहीं है.

क्या सरकार के पास इसे लेकर कोई योजना है? जिससे आने वाले समय में नक्सलियों से बस्तर मुक्त हो पाए?

मुझे लगता है कि सरकार के पास इसे लेकर कोई दृष्टि नहीं है. नक्सलियों के आने के बाद से यहां की स्थितियां जो असामान्य हुईं हैं. उसे लेकर सरकार और तमाम सुरक्षा में लगी संस्थाओं के बीच लंबी चर्चा होनी चाहिए. यह भी ज़रूरी है कि चर्चा हो कि फोर्सेस को किन इलाकों में जाना है और किन इलाकों में नहीं जाना है. और यह भी चर्चा हो कि अधिक से अधिक ग्रामीण कैसे दोस्त बने और इसे लेकर किस तरह के प्रयास किए जाने की ज़रूरत है? तब जाकर कुछ समाधान सामने आएगा. अभी बड़ा संकट विश्वास का ही है.

क्या सलवा जुडूम की असफलता पर अफसोस नहीं होता आपको?

सलवा जुडूम को लेकर अफसोस है. वह सफल नहीं हो पाया. नक्सलवाद के खिलाफ खड़े हुए इतने बड़े आन्दोलन को जंगल में बैठे नक्सलियों से लेकर राजधानी में बैठे लोगों ने मिलकर कुचल दिया. एक अच्छे आंदोलन का इस तरह समाप्त हो जाना तकलीफ तो देता ही है. इस देश के लिए प्रधानमंत्री भी स्वीकार करते हैं, बड़ी चुनौति नक्सलवाद है. और बस्तर के क्षेत्र में जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने से लेकर सरकार बनाए रखने तक नक्सलियों से बड़े-बड़े समझौते कर रहे हैं.

कैसे शासन की पूरी ताकत लग जाने के बाद भी नक्सली बचे रह गए?

नक्सलियों की ताकत बंदूक में नहीं है. उनकी नेटवर्किंग में है. ये ज़माना नेटवर्किंग का है. जिस नेता की नेटवर्किंग जितनी अच्छी, वह उतना बड़ा नेता है. सफल नेता है. सलवा जुडूम के माध्यम से उनका नेटवर्क कमजोर हो रहा था. उनके नेटवर्क का आदमी उन्हें छोड़कर मुख्य धारा में आ रहा था. हम उनका नेटवर्क कमजोर करके ही उन्हें मार सकते हैं. उन्होंने उस दौरान अपवादों को मीडिया में इस तरह उठाया जैसे पूरे बस्तर में यही हो रहा है. यदि आंदोलन में इतनी खामियां थीं तो हम जो शीर्ष नेतृत्व में थे, एक भी शिकायत, एक भी एफआईआर मेरे खिलाफ क्यों नहीं आई? हत्या, बलात्कार, लूट का आरोप सलवा जूडूम पर लगता रहा, हम तो आन्दोलन की अगली पंक्ति में थे, मुझ पर यह आरोप क्यों नहीं लगे?

यह लड़ाई आदिवासी बनाम आदिवासी हो गई? नक्सली की तरफ से भी आदिवासी मारे जा रहे थे और सलवा जुडूम की तरफ से भी. नेतृत्व कहीं पिछे छुप गया था?

यह कहना ठीक नहीं है कि सिर्फ आदिवासी थे उसमें. गैर आदिवासी लोग भी शामिल हुए थे, इस लड़ाई में. चूंकि यह आदिवासी बहुल क्षेत्र है, इसलिए आदिवासियों की संख्या अधिक हो सकती है. नक्सलियों का नेतृत्व महाराष्ट्र और आन्ध्र का है लेकिन वे कभी आगे नहीं आते. वह आदिवासियों के पिछे छुपकर ही वार करते हैं. इस तरह महाराष्ट्र और आन्ध्र-प्रदेश के नक्सली सरगनाओं के हाथों बस्तर के आदिवासी इस्तेमाल हो रहे हैं. हमारे कर्नल, कैप्टन लड़ाई में आगे होते हैं और नक्सलियों की लड़ाई में वे सबसे पिछे होते हैं. तीन, चार परतों के पिछे दुबके हुए.

इस तरह की स्थितियों के बाद भी उनका विस्तार होता जा रहा है और सरकार कुछ कर नहीं पा रही है?

उनके बुलेट का जवाब है हमारे पास लेकिन उनकी विचारधारा का जवाब हमारे पास नहीं है. उस विचारधारा का जवाब कौन देगा? बंदूक की लड़ाई हो तो बंदूक देकर आप किसी को सामने लड़ने के लिए खड़ा कर सकते हैं. लेकिन अब सोचने का वक्त आया है कि विचारधारा की लड़ाई में हम कहां खड़े हैं? हमने इस फ्रंट पर मैदान बिल्कुल खाली छोड़ दिया है, इसलिए वे जीत जाते हैं. यदि वे गांव वालों को बंदूक की नोक पर खड़ा करते हैं, तो गांव का हमारा परंपरागत नेतृत्व उनके सामने आत्मसमर्पण कर रहा है. यदि नहीं कर रहा तो उसे मुखबीरी के आरोप में या कुछ दूसरा आरोप लगाकर मार दिया जाता है.

यदि नक्सलियों का विस्तार हो रहा है तो इसमें गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ापन इसके पीछे बड़ा कारण है, या फिर भय या विचारधारा?

इसके लिए सभी बाते थोड़ी-थोड़ी जिम्मेवार हैं. जो एक व्यक्ति को नक्सलियों के करीब ले जाते हैं. बंदूक है, विचारधारा है, वहां अशिक्षित और पिछड़े लोग हैं, जो उनके बहकावे में आसानी से आ जाते हैं. इस बहकावे की राजनीति से वे अपने आप को ताक़तवर बना रहे हैं.

वे विचारधारा को लेकर चलने वाले लोग हैं और राजनीति करने वाले, राजनीतिक विचारधारा में विश्वास रखने वाले लोग हैं. यदि हमारी राजनीतिक पार्टी के पास विचारधारा नहीं है तो हम जीरो हैं. वे अपने विचारधारा को सांगठनिक स्तर पर फैला रहे हैं. इससे उनका विस्तार हो रहा है. वे अपने विचार को लेकर प्रतिबद्ध हैं. हम उतने कट्टर नहीं हैं. हम लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास रखते हैं. लेकिन यह भी सोचिए, वे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को सीधे सीधे चुनौति दे रहे हैं. हम कितने प्रतिबद्ध हैं?

इसका अर्थ यही लगाया जाए कि उनकी प्रतिबद्धता से सरकार की प्रतिबद्धता कमतर है और सरकार को और अधिक प्रतिबद्ध होने की ज़रूरत है?

उनको संविधान, राज्य और व्यवस्था से कुछ लेना देना नहीं है. हमें इसके दायरे में रहकर काम करना है. उन्होंने उन हाथों को हथियार दे दिया, जिन्हें कानून, राज्य और संविधान को नहीं पता. अब उनके लिए किसी अदालत का फैसला तो चलेगा नहीं.

यदि नक्सली इतने गलत हैं फिर जंगल में उनका इतना समर्थन क्यों है? इतनी संख्या में उनके सहयोग में लोग क्यों खड़े हैं?

इस देश में साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ भी लोग खड़े हो जाते हैं. दोनों के अपराध का दर्शन एक जैसा ही है. दोनों उक्सावे पर काम करता है. इसलिए मैं नक्सलियों और साम्प्रदायिक शक्तियों को एक करके ही देखता हूं. ये दोनों विचारधारा से एक दूसरे के विरोधी हो सकते हैं लेकिन काम करने की पद्धति दोनों एक सा अपनाते हैं. हथियार दोनों उठाते हैं.

सरकार चाहे तो नक्सल खत्म हो सकता है. क्या इसे सरकार की इच्छा शक्ति का अभाव माना जाए?

सरकारें बड़े बड़े चुनाव जीतने के लिए समझौते करती है. नक्सलियों से भी जन प्रतिनिधि समझौते करते हैं. जब तक सरकार में बैठे लोग अपनी गद्दी को दांव पर लगाकर समस्या सुलझाने के लिए मैदान में नहीं आएंगे, तब तक यह मामला सुलझने वाला नहीं है. हम चुनाव हार जाएं लेकिन बस्तर से नक्सलियों को बाहर करने की प्रतिबद्धता कम नहीं होगी, इस इरादे के साथ जब हम मैदान में होगे, उसके बाद ही जीत हासिल हो सकता है.

क्या नक्सल यहां की व्यवस्था की ज़रूरत बन चुका है? क्या यहां की राजनीति भी इसे बनाए रखना चाहती है?

आजादी के बाद से ही जम्मू कश्मीर का मामला चल रहा है, जिसका आज तक हम हल नहीं निकाल पाए. वहां हमने सेना ज़रूर लगा रखी है. अफसरशाही इस देस के राजनीतिक नेतृत्व को कन्फ्यूज कर रहा है. देश का नेतृत्व भी इस देश की समस्याओं को लेकर बहुत गंभीर नहीं है. इस तरह के मुद्दों पर वह पूरी तरह से अफसरशाही पर निर्भर है. जिस दिन इस देश का नेतृत्व अपने विचार में एक रूपता और स्पष्टता लेकर आएगा और एक राजनीतिक निर्णय लेगा, समस्या दूर हो जाएगी.

राजनीतिक कमियां दूर होते ही सारी कमियां दूर हो जाएंगी. हमने आजादी की लड़ाई लड़ी, हमने संविधान बनाया, और आज हम विधान सभा में पेश होने वाला विधेयक नहीं बना पा रहे हैं. वह आईएएस तैयार करके लाते हैं और हम नीचे अपना दस्तखत कर देते हैं.

हम अपने समस्याओं को लेकर गंभीर रहें. समस्या के समाधान के लिए जो भी न्यायोचित कदम हो उसे उठाते हुए सरकार को किसी प्रकार का संकोच नहीं करना चाहिए.

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