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लूट की दास्तान —1…

कोबरा पोस्ट का स्टिंग ऑपरेशन ‘रेड स्पाइडर 2’ इन दिनों चर्चे में है. और सुनने में आ रहा है कि खुलासे के बाद अब वित्त मंत्रालय सक्रिय हो गया है. लेकिन ज़रा सोचिए कि क्या वित्त मंत्रालय अपने ही सरकार में शामिल लोगों के खिलाफ कुछ कर पाएगी? BeyondHeadlines आपके सामने एक ऐसा नेता की कहानी रखने जा रही है, जिसके खिलाफ़ पिछले तीन-चार सालों में सैकड़ों बार शिकायत की जा चुकी है. इस मामले में हमारा मीडिया भी खामोश ही रहा, क्योंकि यह जनाब खुद ही कई मीडिया कम्पनियों के मालिक हैं. पेश है अफ़रोज़ आलम साहिल की रिपोर्ट…

Dr.-Akhilesh-Das-Gupta

लखनऊ का इंडियन मकेंटाइल कोऑपरेटिव बैंक की हज़ारों की जमापूंजी शातिराना अंदाज़ में लूटा गया और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, सीबीआई व रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसाएटी सब कुछ जानते हुए भी सिर्फ किसी तमाशबीन की तरह देखते रहें. अरबों की मनीलांड्रिंग तक हुई, लेकिन ईडी भी बैंक के चीरहरण का तमाशबीन ही बना रहा. ये चीरहरण भी किसी और ने नहीं बल्कि बैंक के ही चेयरमैन रहे बसपा से राज्यसभा सांसद अखिलेश दास गुप्ता व उनकी पत्नी अलका दास गुप्ता ने किया. अखिलेश इससे पहले इंडियन नेशनल कांग्रेस में थे.

18.04.2012 को डीजीएम आरबीआई को भेजे पत्र में मर्केटाइल बैंक प्रबंधन ने 2000-01 के दौरान करोड़ों के घोटालों को अपने ही स्टाफ द्वारा किया जाना कबूला है. साथ में बेनामी लोगों को अग्रिम भुगतान की स्वीकीरोक्ति यह दिखाने के लिए काफी है कि दास दंपति की लूट से बैंक प्रबंधन भी वाकिफ था.

1989-98 तक अखिलेश दास गुप्ता इस बैंक के चेयरमैन रहे तो 98 से 2001 तक घोटालों के लिए उन्होंने अपनी पत्नी अलका दास गुप्ता को चेयरमैन के पद पर बिठा दिया. मकेंटाइल बैंक प्रबंधन ने घोटाला छुपाने के लिए आरबीआई को फर्जी सूचनाएं और वित्तिय आंकड़ें दिखाकर शेड्यूल बैंक का लाइसेंस सिर्फ इसलिए प्राप्त किया, जिससे सरकारी विभागों के पैसे भी हथिया कर अखिलेश दास गुप्ता इस धन का निवेश अपनी तमाम कम्पनियों में कर सके, और हुआ भी यही.

विस्तृत रिपोर्ट में आरबीआई ने 2007 से लगातार अपनी निरीक्षण रिपोर्ट में घोटाले उजागर किये हैं. आरबीआई की सिर्फ 2009 की निरीक्षण रिपोर्ट का जिक्र करें तो इस रिपोर्ट में साफतौर पर दिया है कि एक खाता सीसी 37 एमबी कन्सल्टेंट का जनवरी 2000 से पहले खुला और 29 फरवरी 2008 को फर्जीवाड़े के पकड़े जाने के बाद अचानक से बंद हो गया.

इस खाते के जरिए 17 करोड़ 57 लाख 89 हजार रूपया बैंक से रातों रात बाहर चला गया. आरबीआई अफसरों ने अपनी निरीक्षण रिपोर्ट में लिखा कि यह फर्जी खाता था. इसी तरह खाता संख्या 280 विनय ट्रेडर्स 15 मार्च 2005 तक मौजूद था. लेकिन घोटाला उजागर न हो. इसलिए इस खाते का पैसा कई फर्जी खातें को खोलकर उसमें डाला गया. आरबीआई ने 10 करोड़ 32 लाख एक हजार रूपये का होना इस फर्जी खाते में होना दिखाया था.

बैंक के चेयरमैन रहे अखिलेश दास गुप्ता की कंपनी विराज कंस्ट्रक्शन के खाते में इस फर्जी खाते से 8 करोड़ की भारी भरकम राशि आई और फिर विनय ट्रेडर्स का फर्जी खाता एक षडयंत्र के तहत बंद कर दिया गया.

आरबीआई ने खुद इंडियन मर्केंटाइल कोआपरेटिव बैंक की निरीक्षण आख्या में लिखा है कि आरबीआई के किसी भी दिशा-निर्देश का पालन नहीं किया गया और अरबों के जितने ऋण दिए गए, वह स्टाफ वालों ने खुद ही बनाए थे. क्योंकि सभी ऋणों के दस्तावेजों में हैंडराइटिंग कमोबेश एक जैसी ही थी.

सफेद झूठ बोलकर घोटाला करने में माहिर मर्केंटाइल बैंक प्रबंधन ने 2007-08 व 09 में आरबीआई को जो प्रोजेक्ट रिपोर्ट दिखायी. उसके मुताबिक लाभ 94 लाख व नुकसान 150 लाख का है. लेकिन हकीकत में 6.72 लाख का लाभांश और 53 करोड़ 47 लाख 26 हजार का नुकसान था जिसे घोटालेबाजों ने छुपा लिया था.

इस लिहाज से बैंक का कुल नॉन परफार्मिंग एसेट (एनपीए) 42.96 प्रतिशत था. जिससे 1200 करोड़ अगर जमा पूंजी मानी जाए तो प्रथम दृष्टया करीब पांच सौ करोड़ का घोटाला परिलक्षित हो रहा है. इसके बाद यह घोटाला कहीं आगे तक बढ़ गया. यही नहीं इस घोटाले में अखिलेश दास गुप्ता व उनकी पत्नी भारत सरकार की वित्तीय संस्थाएं सिडबी, नाबार्ड व एनएचबी से मर्केंटाइल बैंक को करीब 2374.63 लाख का ऋण 31.3.2009 तक दिलवा चुके थे. इस धन को भी मिलकर लूट लिया गया.

सबसे खास बात यह है कि इन सरकारी संस्थाओं ने बिना सत्यापन व बैंक के वित्तीय दस्तावेजों की पड़ताल के ऋण दे दिया था. जबकि नियमों के मुताबिक मर्केंटाइल बैंक का एनपीए 42 फीसद की जगह केवल 6 प्रतिशत ही होना चाहिए था और तीन वर्षों से बैंक को लाभ में होना चाहिए था.

आरबीआई ने 12 दिसंम्बर 2007 को सचिव मुख्य कार्यकारी अधिकारी को धारा 35 के तहत 31 मार्च 2007 को हुए वित्तीय निरीक्षण के बाबत कड़े दिशा निर्देश दिए थे कि आरबीआई की पूर्व अनुमति के बिना लाभांश का वितरण और कार्यक्षेत्र में विस्तार करें. लेकिन मर्केंटाइल बैंक ने आरबीआई के दिशा निर्देशों को हवा में उड़ा दिया.

विराज कंस्ट्रक्शन, विराज प्रकाशन, विराज डिस्ट्रीब्यूशन, लाल सिंह (सीसी 380) एसएमए बिल्डर्स एंड कंस्ट्रक्शन (सीसी 384), कबीर सिक्योरिटी, लॉर्ड गनेश हॉस्पिटेलिटीज, गाजियाबाद इको फ्रेंडली, हाईटेक प्रोटेक्शन इंडिया प्रा.लि. समेत कई बड़ों को 24 करोड़ से ऊपर का ऋण गलत तरीके से बांटा गया. जबकि यह कंपनियां या तो अखिलेश दास गुप्ता की खुद की कंपनियां है या उनसे कहीं न कहीं जुड़ी हुयी है.

आरबीआई के सर्कुलर यूबीडी एलकेओ. एनओ. 914/12.3.38/08.09 दिनांक 21 जनवरी 2009 का खुला मजाक बनाया गया. यही नहीं ऋण से अधिक क्रेडिट सुविधा तक को अनुमन्य किया गया. विराज कंस्ट्रक्शन कंपनी में खुद अखिलेश दास गुप्ता और अलका दास गुप्ता डायरेक्टर थे. 13 अक्टूबर 2010 और 18 अगस्त 2010 के 5-5 करोड़ की धनराशि का ट्रांसफार इलाहाबाद बैंक के चेक संख्या 376909 व 376910 के जरिए किया गया. आरबीआई ने अपनी निरीक्षण रिपोर्ट में इसी तरह गणपति एसोसिएट्स (सीसी 382) ओशो एसोसिएट्स (सीसी 381) लाल सिंह (सीसी 380) जैसे तमाम खातों में भारी लेनदेन का पर्दाफाश किया है.

                                                     —लूट की दास्तान आगे भी जारी रहेगी…

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