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BeyondHeadlines > India > दिल्ली का दर्शनीय अस्पताल …
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दिल्ली का दर्शनीय अस्पताल …

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published July 12, 2013 16 Views
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11 Min Read
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Anita Gautam for BeyondHeadlines

सुना है दिल्ली में बहुत कुछ देखने को है… कल शाम मैं भी निकली दिल्ली देखने और रास्ते में दिखा दिल्ली का सबसे बड़ा सरकारी अस्पाल, एम्स…

नाम तो सुना ही होगा, जिसके सामने सफदरजंग अस्पताल है और जो अब दामिनी वाले हास्पिटल के नाम से मशहूर हो गया है. हां! हां! सही समझा, ये एम्स वही अस्पताल है जिसमें 4 साल की बच्ची के गैंग रेप के बाद उसे भर्ती कराने के हफ्ता भर तक राजनीति की रोटियां सिकती रहीं और मामला बासी होते साथ ही लोग भूल भी गए. उसके बाद वो बच्ची जिंदा बची भी नहीं आज तक कुछ पता ही नहीं चला.

खैर, अस्पताल के गेट में पांव रखते साथ लोगों की भीड़ नज़र आ रही थी. बाहरी फुटपाथ रेलवे के प्लेटफार्म से कम नहीं था. लोग चादर, चटाई, बैग लिये बैठे थे तो कुछ लेटे थे फर्क महज़ इतना ही था उन लोगों को ट्रेन का नहीं अपने परिजन के ठीक होने का इंतजार था, पर जाना इनको भी जल्दी घर था.

AIIMSआगे बढ़ते हुए इमरजेंसी के पास पहुंच गई तो वहां भी कई मरीज़ डाक्टरों को घेरे नज़र आ रहे थे. हालांकि इमरजेंसी गेट से अंदर जाते समय सिक्योरिटी गार्ड ने रोका कारण साफ था, कि मैं मरीज़ नहीं थी और न ही मेरे साथ कोई मरीज. फिर भी मैं अंदर घुस गई.

वहां से निकलते साथ ही साइड से पहली मंजिल पर चढ़ गई पर इस बार वहां बैठे 2 पुरूष व एक महिला सिक्युरिटी गार्ड ने मुझे रोकना तो दूर देखा तक नहीं. पहली मंजिल देखने लायक थी, साफ सुथरी और चमचमाती हुई. साइड पर एक बोर्ड भी लगा था जिसमें लिखा था राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, और उसके नीचे डाक्टर की सलाह के साथ, रोग के लक्षणों के बारे में लिखा था. और यह भी लिखा था उपरोक्त लक्षणों के दिखाई देने पर बिना देरी के नजदीकी स्वास्थ्य केन्द्र एवं मनेाचिकित्सक केन्द्र में जाए…

मुझे लगा वाह सरकार तो मानसिक रोगियों  के लिए बहुत काम कर रही है. वैसे भी देश में बिमारों से ज्यादा मानसिक रोगियों की संख्या है. मैं मनोचिकित्सक वार्ड में जाने लगी तो वहां 3 दरवाजे थे पहले और दूसरें में तो आसानी से दाखिल हो गई पर तीसरा दरवाजा मोटी-मोटी लोहों का और मोटा ताला बंद था…

मैंने अंदर आने को बोला तो सिक्यूरिटी गार्ड ने मना कर दिया. मैंने वहां के रोगियों के बारे में पूछा तो उसका जवाब था, कम पागल लोग यहां रखे जाते है, जो ज्यादा पागल होता है उसे आगरा भेजा जाता है. अजीब बात है, देश के बड़े हास्पिटल वाले भी आगरा का सहारा लेते हैं. शायद वैसे ही जैसे एयर एबुंलेंस के लिए वेदांता का. खैर उसके सामने ही स्किन रोग के रोगियों के 3 वार्ड, आइसूलेशन कक्ष सहित 5 लोगों के बैड का स्पाइन और रिहेबिलटेशन वार्ड बनाया हुआ था.

नर्सिंग स्टाफ भी दिखाई दे रहा था और उनके सामने एक दान पात्र रखा था जिसे पढ़कर थोड़ी सी हंसी आई. क्योंकि उसपर लिखा था गरीब मरीजों के लिए दान-पात्र, सोचने वाली बात थी इस सरकारी अस्पताल में गरीब ही आते हैं अगर अमीर होते तो प्राइवेज इलाज न करा लेते. और आगे बढ़ी तो देखा डाक्टर्स, नर्सिंग स्टाफ के लिए अलग टायलेट और बाथरूम था जबकि स्किन रोगियों और रिहैब के रोगियों के लिए मात्र एक टायलेट और एक बाथरूम, जिसका प्रयोग करना नामुमकिन और तमाम संक्रमण पैदा करने वाली बीमारियों को न्यौता देना था.

रिहेब में क़दम रखते ही 5 मरीजों और उनके परिजनों को देखा, आपस में सब हंसी मजाक कर रहे थे. पर एक मरीज़ बुखार से तड़प रहा था. ग्लुकोज भी चढ़ रहा था. जब मरीज़ की पत्नी से बात की तो गुस्से में बोली पिछले 5 दिन से बुखार है पर डाक्टर ने एक गोली तक नहीं दी. जब आज सिनियर डाक्टर आए तो तीन दिन के लिए ग्लुकोज लगा दिया. और बिना जांच के पैरासिटामोल खाने को बोल दिया. मैं डाक्टर से कुछ पूछती, इसके पहले वहां कोई डाक्टर नाम का प्राणी था ही नहीं.

इस अस्पताल भ्रमण में 5.15 से 6.40 कब हुए पता ही नहीं चला. अभी घड़ी देख ही रही थी कि कैटरिंग वाला खाने की बड़ी सी ट्राली ले आया और लोग अपने-अपने मरीज़ के लिए बर्तन उठाए चल दिए. खाने की क्वालिटी बहुत घटिया तो नहीं थी पर हां अच्छी भी नहीं थी.

खिचड़ी में चावल और पानी में दाल नाम मात्र नज़र आ रहा था. मूंग की दाल-परवल की सब्जी, दो रोटी और एक करछी चावल की मात्रा देख मानना ही पड़ेगा हर तरह के मरीजों को वाकई भूख नहीं लगती होगी. तभी एक गोरखपुर, दो बिहार और एक उत्तर प्रदेश की महिलाएं पतीला, कुकर, आटा, चावल, दाल, तेल और कुछ मसालों की पुडि़या थामे चल दीं.

मैंने उनसे पूछा कि खाना तो मिल गया तो आप सब कहां जा रही हैं तो बोली हम लोग खाना बनाने जा रहे हैं, खाना बनाने मतलब? यहां तो कोई रसोई या चुल्हा नहीं है फिर ? हंसते हुए बोली, हमारी कोई रसोई नहीं पर चुल्हा तो है, चलिए साथ. मैं उनसे बात करते करते मैट्रो स्टेशन से आगे निकल आई और रूकी तो फलाई ओवर के नीचे.

उनमें से दो ने 10 रूपये की कुछ लकडि़यों के टुकड़े खरीदे और दो समान की रखवाली करने लगीं. पीछे पलट कर देखा तो एक दो नहीं तमाम ईंटा जोड़े चुल्हे ही चुल्हे नज़र आ रहे थे. और काफी महिलाएं भोजन में पराठा, तहरी तो एक महिला लिठ्ठी चोखा बना रही थी. शायद यह गरीबों का ओपन किचन था, जिसका जहां मन करे, खाना बना ले.

उनमें से एक बोली, दीदी पिछले 3 महीने से बीमार पति के साथ यहां रह रही हूं, अस्पताल के खाने से पति का पेट नहीं भरता. उनकी खुराक अभी भी अच्छी है, और फिर मैं और मेरा बेटा क्या खाएगा? आप देख ही रही हैं, यहां खाना कितना मंहगा है, हम बिहार से आए है, खेती के अनाज के अलावा हमारे पास कुछ नहीं और दूसरा धन मेरा पति है.

मैंने सरकारी कैंटिन की बात पूछी तो बोली यहां खाने के नाम समोसा ब्रेड पकौडा के अलावा कुछ मिलता ही नहीं. और हमारे पास इतना पैसा नहीं कि रोज़-रोज़ कहीं होटल से खा सकें. मेरे देवर को गांव से आने जाने में 4 दिन लगता है और वो भी आकर यही सड़क पर सोते हैं, क्या करें, वो तो शुक्र है आटा-चावल और सतुआ गांव से अम्मा भिजवा देती हैं. जब बारिश होती है तब तो हम लोग भूके ही रह जाते हैं, लकडि़यां अस्पताल में ले जा नहीं सकते और बची लकडि़यां दुकान वाला लेता नहीं, वो भी कहीं पेड़ के कोने किनारे छुपाते हैं तो लोग चुरा लेते हैं, क्या करें??

बाद में मैं अस्पताल के टिकट काउंटर पर भी गई जहां विंडों की संख्या न के बराबर थी, लोगों की भीड़ में कर्मचारियो की अनुपस्थिति और मजे की बात कम्प्युटर स्लो था. एक मरीज़ का परिवार ऐसा भी दिखा जिसेकी कल डॉक्टर छुट्टी करने वाले थे और उन्हें गोरखपुर जाना था, टिकट कन्फर्म थी पर मरीज़ की अचानक तबियत खराब होने से टिकट कैंसिल करवाना पड़ रहा था. पर टिकट काउंटर पर सर्वर डाउन होने से टिकट का कैंसिल होना मुश्किल था…

हैरानी की बात है यदि आम आदमी कारणवश रेल यात्रा न कर सके तो रेल विभाग रद्द टिकट पर पैसे काट लेती है, बिना टिकट यात्रा करे तो जुर्माना ले लेती है, पर यदि सरकार की गलती हो जिसके चलते ट्रेन कैंसिल या सर्वर डाउन हो जाए तो भी हमारी ही जेब से पैसा जाता है, दोनों ओर से फायदा सरकार को ही है.

एम्स अस्पताल का रेल काउंटर देश के और रेल काउंटरों पर दलालों से अधूता नहीं था, जिसे ज़रूरत है ज्यादा पैसा दो और टिकट कराओ… वहीं दूसरी ओर मैं मेडिकल सुपरिडेन्ट सहित बड़े-बड़े डाक्टर्स के गलियारे में भी चक्कर लगा कर आई. वह वहां चमचमाती टाइल्स, गमले में गले पौधों से स्वस्थ वातावरण देख किसी बड़े प्राइवेट हास्पिटल जैसा महसूस कर रही थी. कोई डाक्टर तो दिखा नहीं पर सुरक्षा गार्ड ज़रूर तंबाकु रगड़ते नज़र आए…

बाहर निकलते ही लगा आज तो दिल्ली के बड़े अस्पताल में सुरक्षा, सफाई, डाक्टरों की ड्युटी, मरीजों के प्रति देखरेख, अस्पताल प्रशासन की व्यवस्था को खुब देखा. और सोचा सरकार खाद्य बिल देश के कौन से गरीबों के लिए लागू करती है, शीला सरकार 15-16 रूपये प्लेट जनआहार की बात करती है तो वो एम्स से लेकर सफदरजंग तक दूर-दूर तक क्यों नज़र नहीं आ रहा? आखिर तमाम ढाबे और होटल भी तो यहीं है?

पर इन सब में एक बात कॉमन थी और वो ये थी कि यहां 80 प्रतिशत मरीज़ उत्तर प्रदेश, बिहार और उसके आसपास के क्षेत्र से थे. इतनी देर में कोई पंजाबी, मराठी या दक्षिण भारत का क्यों नज़र नहीं आया? क्या वहां बीमारी या बीमार नहीं हैं? या उन प्रदेशों में उचित मेडिकल सुविधा मुहैया करवाई जाती है?

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