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Reading: मुज़फ्फर नगर दंगा : आँखों देखा हाल
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BeyondHeadlines > India > मुज़फ्फर नगर दंगा : आँखों देखा हाल
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मुज़फ्फर नगर दंगा : आँखों देखा हाल

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published September 17, 2013 21 Views
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12 Min Read
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Md. Alamullah for BeyondHeadlines

Contents
मदरसा इस्लामिया सुलेमानिया कांधला शिविरमदरसा इस्लामिया रफीक़िया रियाद उलूम, जोगी खेड़ाजोला गाँव का शिविरलोई गाँव का शिविर

कभी किसी से सुना था “दंगे तो दरअसल वो ‘फल’ यानी फ्रुट्स होते हैं जिसे नफ़रत का खाद, पानी और बीज के साथ बोया जाता है.” और इस बात की बिल्कुल सही व्याख्या उस समय देखने को मिली, जब हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फर नगर ​​और उसके आस-पास के गांव में हुए दंगों के बाद हालात का जायज़ा लेने के लिए वहां पहुंचे. लेकिन पुलिस व सेना के जवानों ने शांति भंग होने की दुहाई देकर हमें वहां जाने से रोक दिया.

Muzaffarpur Nagar Riots Recent eyesआगे हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हम क्या करें? फिर हमने  वहां के शिविरों व कैंपों का रूख किया. उत्तर प्रदेश के कांधला, शामली और बाग़पत जिला के कई मदरसों, स्कूलों, ईदगाहों और घरों में 60 हजार से भी अधिक शरणार्थियों की अलग-अलग कहानी थी, जिन्हें सुनते हुए हमारे दिल लरज़ रहे थे तो लिखते हुए हाथ कांप रहे थे. अपने घर, जानवर, संपत्ति और सब कुछ खो देने वाले अप्रवासियों के चेहरे पर खौफ़ देखने लायक थी.

कोई अपने बेटे को खो चुका है तो किसी की बेटी गायब है. कोई औरत अपने पति की हत्या की कहानी सुनाते-सुनाते आँसू रोक नहीं पा रही है तो कोई बूढ़ा पिता अपने जवान बेटे को कंधा देने के कहानी बयां करते-करते रो पड़ता है. किसी का पूरा संपत्ति लुट गया है, किसी के घर में आग लगा दी गई है तो किसी के दुध पीते बच्चे को छीन कर उसके सामने ही उसका क़त्ल कर दिया गया है. किसी की मां घायल है तो किसी का भाई हमेशा के लिए दोनों पैर से विकलांग हो चुका है. कितने ऐसे हैं जिन्होंने अपने जवान बेटियों को खो दिया है या उन्हें बलवाई अपहरण कर ले गए हैं.

मदरसा इस्लामिया सुलेमानिया कांधला शिविर

सबसे पहले हम कांधला में मदरसा इस्लामिया सुलेमानिया के शिविर में पहुंचे. जिस की  देखभाल मदरसा इंतज़ामिया पूरे दिलचस्पी से कर रही है. यहां लगभग साढ़े सात हजार शरणार्थी हैं. इस कैंप की देखरेख कर रहे मौलाना नूर हसन रशीद ने हमें बताया कि “ पूरे क्षेत्र में तकरीबन 60 हजार से भी अधिक शरणार्थी ऐसे शिविरों में हैं. मरने वालों की संख्या सरकार के अनुसार 48 है, लेकिन सच तो यह है कि 200 से कम लोग नहीं मरे होंगे. कुछ परिवारों के तो दस-दस लोगों को दंगाइयों ने मार दिया या जिन्दा जला दिया है. 20 से अधिक लड़कियां गायब हैं. लोगों में इतना डर है कि वह पुलिस और सेना की उपस्थिति में भी अपने घरों को वापस नहीं जाना चाह रहे हैं. कई मुस्लिम युवकों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. घर और मस्जिदें ध्वस्त कर दी गई हैं और लाश और अन्य सबूत को मिटाने के लिए उसके राख तक को नदी में बहा दिया गया है. ऐसा नहीं है कि यह सब अचानक हो गया बल्कि यह संगठित साजिश का नतीजा लगती है, जिनमें औपचारिक विस्फोटक उत्पादों के अलावा कुछ खास रसायन भी इस्तेमाल किए गए हैं. सबसे बड़ी दुख की बात तो यह है कि यहां कभी भी इस तरह के घटना नहीं हुई, यहां तक ​​कि तब भी नहीं जब भारत-पाक विभाजन के बाद पूरा देश खून में डूबा हुआ था”.

हमने इस शिविर में कई पीड़ितों से मुलाकात की, जिन्होंने इन घटनाओं को अपनी आंखों से देखा था. निसार गंज के मोहम्मद तैय्यब ( 30 ) बताते हैं कि “ 7 सितंबर को कवाल में पंचायत हुई. उसी के बाद हालात खराब हुए. हमने डर व भय के माहौल में लड़कियों और महिलाओं को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना शुरू कर दिया लेकिन रास्ते में जाटों के खेत में 400 से भी अधिक हिंदू इकट्ठा हो गए और उन्होंने हमें जाने नहीं दिया. किसी तरह हम सेना की मदद से बाहर निकलने में कामयाब हुए, लेकिन हमारी कई महिलाएं और लड़के छूट गए, वह गायब हैं जिनका कोई अत पता नहीं है.”

इसी गांव के मोहम्मद खालिद (25) का कहना था कि “सबसे पहले हमारे घर में आग लगाई गई. आग लगाने वालों के हाथ में पेट्रोल और खतरनाक हथियार थे. वो ड्रम और बाजे के साथ आते थे और आग लगाते हुए आगे बढ़ जाते थे. आगे पुलिस थी, लेकिन वह कुछ नहीं कर रही थी. हमने गन्ने के खेत में छुपकर किसी तरह अपनी जान बचाई.”

इसी शिविर में लसाड़ गांव के रहने वाले  40 वर्षीय तारा मस्जिद के इमाम जमील अहमद रोते हुए हमें बताया कि “मेरे सामने मेरे चाचा को उन लोगों ने मार दिया. हमलावरों के पास तलवार, गड़ांसा, बंदूक और राइफल थी. उन्होंने मस्जिद को आग लगा दी, जिसमें सारे कुरान और अन्य सामान जलकर राख हो गईं. मैंने खेतों में घुसकर जान बचाई और नदी पार करके कांधला पहुंचा.”

मोहम्मद सलीम( 44)  के मुताबिक  “ 8 सितम्बर की सुबह लोगों ने हमारे घरों पर हमला किया. जब हमने एसओ को फोन किया तो उन्होंने फोन काट दिया. मेरे सामने दो लोगों की हत्या कर दी गई. लेकिन हम कुछ भी नहीं कर सके, क्योंकि वह पूरी तरह हथियार से लैस थे.”

मदरसा इस्लामिया रफीक़िया रियाद उलूम, जोगी खेड़ा

इस शिविर में पांच हज़ार से अधिक प्रवासी हैं, यहां ज्यादातर फुगाना, हड़द, खेड़ा, सताना, शद, टकरी, डोंगरी आदि गांव के लोग हैं. लोगों के अनुसार सरकारी शासन तंत्र ने यह आश्वासन दिया था कि उनके खाने पीने, रहने सहने और सभी प्रकार की ज़रूरतों का प्रबंध किया जाएगा, लेकिन फिलहाल सरकार की ओर से कोई क़दम नहीं उठाया गया है. ज्यादातर लोग  अशिक्षित और कम पढ़े लिखे हैं. इसलिए अभी तक उन्होंने अपने ऊपर हुए जुल्म और हिंसा की रिपोर्ट भी दर्ज नहीं कराई है. जब हम वहां पहुंचे तो लोगों की भीड़ जमा हो गई और हर कोई अपनी आंखों देखी कहानी सुनाने के लिए बेताब हो गया.

Muzaffarpur Nagar Riots Recent eyesइस शिविर में रह रही फातिमा (35) का ने रोते हुए हमें बताया कि  “दंगाइयों ने उन्हें नंगा करके इज्जत लूटने की कोशिश की. वह नंगे भागकर पुलिस स्टेशन आई, जहां उन्हें कपड़ा दिया गया और इस शिविर में ले जाया गया. अपनी जान बचाने के चक्कर में अपनी 3 वर्षीय भतीजी भी छूट गई जिसका अब कोई अता पता नहीं है.”

हाजी मान अली (55) दर्द भरी आवाज़ में बताने की कोशिश करते हैं “उन्होंने मेरे लड़के को गंडासा मार कर घायल कर दिया. 70 वर्षीय एक बुजुर्ग को मेरे सामने मार डाला. हम सब डर कर एक छत पर जा छिपे. उनके जाने के बाद हमने कई बार थाना फोन किया पर किसी ने भी फोन नहीं उठाया. शाम को सात घंटे बाद सेना आई और फिर छत से जहां 300 लोग जमा थे, वहां से हमें यहाँ स्थानांतरित किया. अब हमारे घरों को जला दिया गया है. भैंस और जानवर खोल ले गए. कुछ नहीं बचा हम लूट गए.” और रो पड़ते हैं.

जोला गाँव का शिविर

यहां आधिकारिक तम्बू गाड़ कर शिविर नहीं बनाया गया है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग स्थानीय लोगों के घरों में रहते हैं. यहां भी पांच तकरीबन हजार लोग रह रहे हैं. किसी किसी घर में 200 लोगों के रहने का अस्थायी व्यवस्था की गई है तो किसी के यहां डेढ़ सौ. यहां के स्थानीय मदरसों में राहत का सामान रखा हुआ है जहां से ज़रूरतमंदो को पहुंचाया जा रहा है. यहां भी घायल और अपने प्रियजनों को खो देने वाले लोगों की एक लंबी फहरिस्त है.

यहां हाजी मेहदी के घर 120 लोगों में से रहने वाली एक 60 वर्षीय रईसा का कहना था “ 8 सितंबर को सुबह का समय था. वे लाठी, डंडा और ब्लम और चाकू लेकर गांव में घुस गए. वह जोर से हल्ला कर रहे थे. साथ में नारे भी लगा रहे थे और ड्रम और बाजा भी पीट रहे थे. जब हमने उन्हें देखा तो हम शौचालय में छिप गए. उन्होंने हमारे घर में घुसकर हमारे देवर और शौहर को मार डाला. हम तो डर के मारे वहां से निकले ही नहीं. बाद में जोला गांव के लोग सेना के साथ आए और हमें निकाल कर यहाँ लाए.”

वहीं मिस्त्री मांगी के यहां 137 लोगों में से एक इक़बाल (41) जिसने अपने 13 वर्षीय बेटे को खो दिया है, ने हमें बताया कि “ उन्होंने मेरे बेटे को शहीद कर दिया. मेरे घर में आग लगा दी. सारा संपत्ति लूटकर ले गए . हम किसी तरह जान बचाकर भागने में कामयाब हुए. मेरी मां 75 साल की है, उन्हें भी लोगों ने सिर में मारकर घायल कर दिया और फिर आग लगा कर भाग गए.

उसके बाद हम इक़बाल की मां रमज़ान से मिले. वो बिस्तर पर पड़ी थी और आसपास गांव के महिलाओं की भीड़ लगी हुई थी. उनका पिछला हिस्सा पूरी तरह जला हुआ था, सिर पर पट्टी थी और पीछे बेंडेड लगा था.

लोई गाँव का शिविर

यहां भी काफी तादाद में लोग हैं. गाँव के  प्रधान मेहरबान अली के मुताबिक यहां 5 हजार से अधिक लोग रह रहे हैं. वे करोदा, नरपड़ा, बड़हल  और अन्य गांवों से ताल्लुक रखते हैं. उनके पास न तो रहने की कोई सुविधा है और ना ही कोई उचित हैल्थ सेंटर. और अन्य सुविधाओं के न होने के कारण कई बच्चों की मौत इसी गांव में हो चुकी है. कई गंभीर रूप से घायल हैं, जिनका उचित इलाज अभी तक नहीं हो सका है. यहां भी ज्यादातर लोग अनपढ़ और कम पढ़े लिखे हैं. अभी भी लोगों के आने का सिलसिला जारी है. सरकार की ओर से महज  सांत्वना के अलावा अभी तक कुछ नहीं किया गया है. स्थानीय लोग ही इन अप्रवासी लोगों  की देख-रेख कर रहे हैं.

इनके अलावा भी अभी कई शिविर बचे थे, लेकिन रात काफी हो गई थी और हमें दिल्ली वापस भी आना था. इसलिए हमें वापस लौटना पड़ा. लेकिन अचंभित करने वाली बात यह है कि इन सबके बाद भी सबसे ज़्यादा गिरफ्तारी  मुस्लिम युवकों की ही हुई है. वे कहां हैं, किस स्थिति में हैं, किसी को पता नहीं.

(गौरतलब रहे कि हमारी यह यात्रा मुस्लिम मजलिस मुशावरत के अध्यक्ष डॉ.जफरुल इस्लाम खान के नेतृत्व में था, जिनके साथ मजलिस के सदस्य केंद्रीय कार्यकारिणी नवेद हामिद, एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स के अखलाक अहमद के अलावा कई सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल थे. इस दल ने पुरानी दिल्ली के लोगों की ओर से अनुदान के रूप में दिए गए कपड़े, चादरें और आवश्यक सामान भी पीड़ितों के बीच वितरित किए. इस अवसर डॉ. ज़फरुल इस्लाम खान और नवेद हामिद ने विस्तार से पीड़ितों की बातें सुनी, उन्हें सांत्वना दी और उच्च जिम्मेदार शासन तंत्र तक उनकी बात पहुंचाने और न्याय दिलाने का आश्वासन दिया.)

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