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अखिलेश सरकार न्याय के सवाल पर मौन क्यों?

BeyondHeadlines News Desk

लखनऊ : निमेष आयोग की रिपोर्ट पर शीतकालीन सत्र में एक्शन टेकेन रिपोर्ट लाने, मुज़फ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा की सीबीआई जांच कराने और अन्य मुद्दों पर रिहाई मंच द्वारा लखनऊ के मौलवीगंज में बृहस्पितिवार को हस्ताक्षर अभियान कैंप लगाया गया. कैंप में बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने शिरकत करते हुए प्रदेश सरकार से निमेष आयोग की रिपोर्ट पर तत्काल अमल की मांग पर अपनी सहमति जताते हुए समर्थन में हस्ताक्षर किये.

मौलाना जहांगीर आलम कासमी ने कहा कि निमेष कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद यह बात साफ हो गई है कि तारिक़ कासमी और मरहूम मौलाना खालिद मुजाहिद को फर्जी तरीके से गिरफ्तार कर, झूठी बरामदगी दिखाकर आतंकवाद के आरोप में फंसाया गया है. होना तो यह चाहिए था कि सरकार को तत्काल तारिक़ कासमी को रिहा करते हुए दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाई करनी चाहिए थी, पर सरकार ने ऐसा न करके यह बात स्पष्ट कर दिया है कि वो बेगुनाहों के साथ नहीं है बल्कि मुजरिमों के साथ हैं और मुजरिमों का साथ देने वाला उससे बड़ा मुजरिम होता है.

रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि सपा सरकार जिस हड़बड़ी में सदन का शीतकालीन सत्र चला रही है उसे देखकर समझा जा सकता है कि वह कितनी डरी हुई है और किसी भी तरह से अपने बकाया कामों को एक फॉर्मेलिटी के तहत निपटा लेना चाहती है. सिर्फ चार दिन के भीतर सत्र की घोषणा करके उसे शुरू कर देना इस बात का संकेत है कि सरकार के पास सवालों का सामना करने की हिम्मत नहीं रह गयी है. उसके पास आवाम तथा विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए कुछ भी नहीं है.

उन्होंने कहा कि रिहाई मंच के आंदोलन के दबाव में सपा सरकार ने निमेष आयोग रिपोर्ट भले ही सदन में रख दी, लेकिन खालिद की हत्या के आरोपी आज भी खुलेआम सड़कों पर घूम रहे हैं. दरअसल सरकार मुसलमानों को केवल गुमराह करके केवल वोट लेना चाह रही है. अगर सपा सरकार मुसलमानों के हित के प्रति खुद को सच्चा बताती है तो सबसे पहले उसे बेगुनाह खालिद के हत्यारों को न केवल जेल भेज देना चाहिए बल्कि निमेष आयोग की रिपोर्ट पर तत्काल एक्शन टेकेन रिपोर्ट भी लानी चाहिए.

उन्होंने कहा कि निमेष आयोग की रिपोर्ट के बाद सपा सरकार अब समूचे कचहरी बम कांड की पुर्नविवेचना धारा 173 (8) के तहत करवाये ताकि इस कांड के असली मास्टरमाइंड कानून के चंगुल में आ सकें. उन्होंने मांग की कि कचहरी बम कांड के पूरे मुक़दमे की सुनवाई तब तक रोक देनी चाहिए जब तक कि इसकी पुर्नजांच न हो जाय. उन्होंने कहा कि सरकार का रवैया बेहद निराशाजनक है और खालिद के मामले में न्याय कहीं से भी होता हुआ नहीं दिख रहा है. खालिद के मामले में सरकार केवल मुसलमानों को गुमराह करने की कोशिश में लगी हुई है.

हस्ताक्षर अभियान को संबोधित करते हुए मुस्लिम मजलिस के नेता जैद अहमद फारूकी, अंबेडकर नेशनल कांग्रेस के फरीद खान, हरेराम मिश्रा, तस्ना आलमी, आमिर महफूज़ और जुबैर जौनपुरी ने कहा कि मुज़फ्फरनगर दंगों के पीडि़त परिवार आज दंगे के तीन माह बाद भी अपने घरों पर जहां लौट पाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं, वहीं पुलिस के लोग पीडि़त परिवारों से विपक्षियों के पक्ष में जबरन हलफनामा भी ले रहे हैं. दबंग ताक़तों द्वारा पुलिस से मिल कर ऐसा खेल करना लोकतंत्र का गला घोंटने जैसा है. सरकार इस मसले पर मौन क्यों है उसे जवाब देना चाहिए.

उन्होंने कहा कि राहत शिविरों में जहां लोग नारकीय जीवन जी रहे हैं, जाड़े में बच्चों और बुजुर्गों की मौतों का सिलसिला जारी है. उन्हे ठंड से बचने के लिए रजाई तक नसीब नहीं है. उन्होंने मुज़फ्फ़रनगर दंगे में घायल लोगों को रानी लक्ष्मी बाई पेंशन योजना के तहत चार सौ रुपये मासिक पेंशन देने के सरकार के नियम को बकवास बताते हुए कहा कि जहां सैकड़ों की संख्या में लोग मारे गये हों, हत्याओं का सिलसिला अभी भी जारी हो वहां पर सरकार केवल बहत्तर लोगों को ही कैसे घायल मान सकती है.

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इस योजना की आड़ में अपनी नाकामियों को छिपाना चाह रही है. लेकिन अब आवाम को सच्चाई पता चल चुकी है. सच तो यह है कि सपा सरकार हर मोर्चे पर असफल है. आगे उन्होंने कहा कि ये टोटके अपनाकर सरकार अपनी नाकामियों पर पर्दा नहीं डाल सकती. आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश के परिदृश्य से उसका सूपड़ा साफ होना तय है.

रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज़ आलम और राजीव यादव ने कहा कि प्रदेश सरकार मुजफ्फरनगर दंगा पीडि़त परिवारों को दिये जा रहे मुआवजे में जिस तरह का भेदभाव बरता जा रहा है, वह यह साबित करता है कि सरकार मुआवजे के नाम पर सिर्फ खानापूरी कर अपनी गर्दन छुड़ाने में ही लगी हुई है. उन्होंने कहा कि मुज़फ्फरनगर के ग्राम फुगाना, कुटबा-कुटबी, कांगड़ा, मुलबर, मुहम्मदपुर रायसिंह आदि गांवों के विस्थापित परिवरों को तो पांच-पांच लाख का मुआवजा दिया गया. वहीं दूसरी ओर लूट-पाट, हत्या, आगजनी के कारण विस्थापित नांगा, डूंगर, ताजपुर, खाडू, हसनपुर आदि जो ग्राम लिसाढ़ के ही मजरे  के निवासियों को कोई मुआवजा नहीं दिया जा रहा है. उन्होंने सरकार से सवाल किया कि आखिर मुआवजे में यह दोहरा मापदंड किन ताक़तों के इशारे पर हो रहा है और मुआवजे का आधार राशन कार्ड आधारित क्यों नहीं है?

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