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Reading: गुजरात सरकार को मोदी नहीं, पुलिस चला रही है
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BeyondHeadlines > Lead > गुजरात सरकार को मोदी नहीं, पुलिस चला रही है
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गुजरात सरकार को मोदी नहीं, पुलिस चला रही है

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published January 9, 2014 17 Views
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6 Min Read
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Mani Ram Sharma for BeyondHeadlines

समय समय पर जन सम्बोधनों में नरेन्द्र मोदी अपने सुशासन के दावे व वादे करते रहते हैं किन्तु वास्तविकता का इनको कितना ज्ञान है, मैं नहीं कह सकता. इनके सुशासन व जनप्रिय सरकार के मैं कुच्छेक नमूने इन्हें बताना चाहता हूँ.

गुजरात राज्य में अभी भी अंग्रेजों की बनायी गई भारतीय दंड संहिता, 1860 व दंड प्रक्रिया संहिता लागू है. ये कानून अंग्रेजों ने 1857 की प्रथम क्रांति  के बाद उपजी परिस्थितियों को देखते हुए बनाए थे. निश्चित रूप से इन कानूनों में जनता का दमनकर राजसता में बने रहने की पुख्ता व्यवस्था की गयी थी, जो स्वतंत्र भारत के लिए किसी भी प्रकार से उपयुक्त नहीं हो सकती. भारतीय संविधान के अनुसार न्याय-व्यवस्था राज्यों का विषय है, जिस पर कानून बनाने के लिए स्वयं राज्य सक्षम हैं.

भ्रान्तिवश मोदी सरकार को विकासोन्मुखी समझते हुए उक्त कानूनों में आमूलचूल परिवर्तन करने के लिए मैंने दिनांक 18.02.12 को स्पीड पोस्ट से मोदी सरकार को एक पत्र लिखा था जो इनके कार्यालय को दिनांक 21.02.12 को प्राप्त हो गया. दिनांक 14.03.12 को सूचना के अधिकार के अंतर्गत एक आवेदन कर मेरे उक्त पत्र पर मोदी सरकार द्वारा की गयी कार्यवाही की जानकारी चाही, किन्तु मुझे कोई जानकारी आज तक नहीं मिली है. मुझे यह कहते हुए अफ़सोस है कि उक्त पत्र का मुख्यमंत्री कार्यालय में कोई अता-पता तक नहीं चला और उलटे मुख्यमंत्री कार्यालय जैसे जागरूक कार्यालय से मेरे पास फोन आये कि यह पत्र किसे व कब भेजा था?

पुन: दिनांक 16.06.13 को मैंने भारतीय दंड संहिता, 1860 व दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन हेतु गुजरात के राज्यपाल महोदय को निवेदन किया जिन्होंने पत्रांक जी.एस.13.26/61/6340/2013 दिनांक 11.10.13 द्वारा गृह विभाग को आवश्यक कार्यवाही हेतु भेज दिया. मैंने दिनांक 29.10.13 को सूचना के अधिकार के अंतर्गत एक आवेदन कर पूर्व पत्र दिनांक 18.02.12 व मेरे उक्त पत्र दिनांक 16.06.13 पर की गयी कार्यवाही तथा गुजरात सरकार के अधिकारियों के उपलब्ध ईमेल पतों की जानकारी चाही, किन्तु गृह विभाग ने पुन: अपने पत्रांक VSF/102013/RTI-161/D  दिनांक 05.12.13 से यही लिखा कि उक्त पत्र उनके यहाँ उपलब्ध नहीं. अत: मैं पत्र की प्रति भेजूं. मैंने गृह विभाग की इस अनुचित अपेक्षा की भी पूर्ति की.

भारतीय दंड संहिता, 1860 व दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन करना गृह विभाग के क्षेत्राधिकार में है, किन्तु गृह विभाग द्वारा पत्रांक VSF/102013/RTI-161/D  दिनांक 02.01.14 से मेरा उक्त पत्र दिनांक 16.06.13आश्चर्यजनक रूप से पुलिस महानिदेशक कार्यालय को भेज दिया गया, जिससे यह परिलक्षित होता है कि गुजरात सरकार को पुलिस चला रही है, इसमें जन प्रतिनिधियों की कोई भूमिका नहीं है अथवा गुजरात में जनतंत्र नहीं अपितु पुलिस राज कायम है.

क्या गुजरात राज्य में भारतीय दंड संहिता, 1860 व दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन करना पुलिस महानिदेशक को अधिकार है? आपको स्मरण होगा कि नडियाद में मजिस्ट्रेट को ज़बरदस्ती शराब पिलाने के मामले में उच्चतम न्यायालय ने लगभग 23 वर्ष पहले टिप्पणी की थी कि गुजरात में सरकार पर पुलिस हावी है, आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है, और पुलिस की सहमति के बिना सरकार कोई भी कानून बनाने में समर्थ नहीं है.

मोदी सरकार के अधिकारियों के ई-मेल पते इन्टरनेट पर उपलब्ध नहीं हैं और मेरे उक्त आवेदन दिनांक 29.10.13 के बिंदु 3(3) में मांगने पर भी श्री कश्यप पारीख, अवर सचिव, गृह विभाग ने ये उपलब्ध नहीं करवाए हैं. इससे यह प्रमाणित है कि गुजरात सरकार में नौकरशाही ने राजतंत्र की एक अभेद्य दीवार बना रखी, जिसमें से लोकतंत्र की कोई हवा भी नहीं आ सकती है. मोदी सरकार पूरी तरह से अपारदर्शी ढंग से संचालित है और गुजरात का जो आर्थिक विकास हुआ है उसमें उसकी भौगोलिक परिस्थितियाँ और नागरिकों की कर्मठता का ही योगदान है – मोदी सरकार की वास्तव में कोई सक्रिय भूमिका नहीं है.

आप अनुमान लगा सकते हैं कि मोदी के ज़रिए किए जाने वाले सुशासन के दावे और वादे कितने खोखले हैं. आपके कार्यपालक जनता से प्राप्त पत्रों को फ़ुटबाल के दक्ष खिलाड़ी की भांति ठोकरें मारकर इधर-उधर भेजते रहते हैं, समय व्यतीत करते हैं  और उन पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं करते हैं. गुजरात सरकार चाहे तो इन्हें ऊँचे वेतन पर रखे हुए डाकिये कह सकते हैं जो डाक को अनावश्यक इधर-उधर करते रहते हैं.

मैंने हाल ही दिनांक 04.01.14 को  मोदी को एक और व्यक्तिगत पत्र लिखकर रजिस्टर्ड डाक से न्यायव्यस्था में सुधार करने का परामर्श दिया है -शायद मोदी जी को पढ़ने को भी नहीं मिला होगा और यदि मिल गया हो तो भी उस पर कोई ठोस कार्यवाही होना संदिग्ध है, क्योंकि उसे भी पुलिस महानिदेशक या उच्च न्यायालय को भेजकर अब तक आपके अधिकारियों ने अपने पुनीत कर्तव्य की इतिश्री कर ली होगी.

(लेखक इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन , चुरू जिला के अध्यक्ष हैं. इनसे maniramsharma@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.)

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