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BeyondHeadlines > Lead > मुज़फ्फरनगर हिंसा: कितने सुरक्षित हैं मुसलमान?
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मुज़फ्फरनगर हिंसा: कितने सुरक्षित हैं मुसलमान?

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published February 9, 2014 6 Views
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9 Min Read
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Syed Mohammad Raghib & Abhay Kumar for BeyondHeadlines

मुज़फ्फरनगर दंगे के तबाही की आग अभी भी ठंडी नहीं हुई है. लगभग पांच महीने गुज़रने के बाद भी हजारों लोग मुज़फ्फरनगर और शामली के दर्जनों राहत शिविरों में जिदंगी और मौत के बीच झूल रहे हैं. सर्द लहर की वजह से जहां हमें शिविरों में कुछ समय के लिए ठहरना दुश्वार गुज़र रहा था, वहीं हजारों शरणार्थी खुले आसमान में रहने को मजबूर हैं.

अख़बारों के मुताबिक राहत कैम्पों में लोगों के ठंड और अन्य बिमारियों से मरने की खबर अभी भी आ रही है. मरने वालों में बच्चों की संख्या ज्यादा बताई जाती है.

कुछ सप्ताह पहले हम लोगों ने शामली जिले के कैराना के पास लगे कई शिविरों में तीन दिन गुजारे. अकबरपुर, सोनाटी, रोटन ब्रिज और मंसूरा गांव से सटे कैम्पों में जो हमने देखा, उसे शब्दों में बयान करना काफी मुश्किल और दर्दनाक है.

शिविरों में रह रहे ये मुसलमान दोहरी मार के शिकार हैं— जहां एक तरफ सांप्रदायिक शक्ति आरएसएस और भाजपा ने किसान जाटों के अंदर मुस्लिम–मुखालिफ ज़हर भरा और माहौल बिगाड़ने में कोई कमी नहीं छोड़ी, वहीं दूसरी तरफ उनकी शुभचिंतक होने का दावा करने वाली तथाकथित सेक्यूलर सरकार ने उनकी कोई सुध तक नहीं ली और उन्हें लूटने और मरने के लिए अकेला छोड़ दिया.

कुछ दिन पहले जिस तरह से सपा के नेता नरेश अग्रवाल ने बीजेपी के सुर में सुर मिला के सांप्रदायिक हिंसा बिल का विरोध किया उससे एक बार फिर साबित हो गया है कि सेक्यूलर पार्टीयां भी सांप्रदायिक तत्वों का मठ बनती जा रही हैं.

यह कितनी अफसोस की बात है कि मुसलमानों के वोट से सत्ता के गलियारों में पहुंची सपा सरकार ने अपनी मुस्लिम दुश्मनी का ऐसा प्रदर्शन किया कि उसके बीजेपी और कांग्रेस के द्वारा किए गए पिछले फसादों के रिकॉर्ड टूटते नज़र आ रहे हैं.

सांप्रदायिकता की आग में घी डालने का काम स्थानीय मीडिया ने भी किया जिसने यह अफवाह फैलाई कि इन शिविरों में रहने वाले शरणार्थियों के बीच आईएसआई के घुसपैठिए भी अपनी पहुँच बना चुके हैं.

इन तमाम अफवाहों और सरकार की नाकामी के बावजूद बहुत सारे देश-विदेश के मुस्लिम और गैर मुस्लिम संस्थाएं और सामाजिक कार्यकर्ता मदद के लिए आगे आए हैं. जिस दिन हमलोग शिविरों में थे उसी दिन हैदराबाद, अलीगढ़, मऊ और लंदन से आए हुए लोग शरणार्थियों के बीच राहत सामग्री का वितरण कर रहे थे.

इन सब साकारात्मक पहलुओं के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छिपी हुई है. हमलोगों ने पाया कि कुछ ऐसे भी मुस्लिम तत्व थे जो अपने आप को शिविरों का प्रधान, जिम्मेदार और मुहाफिज कहते थे, मगर इन मुसलमानों ने अपनी कारकर्दगी से इंसानियत को शर्मशार कर दिया.

रोटन ब्रिज के एक जिम्मेदार स्थानीय मुस्लिम नेता ने शरणार्थियों से बदसलूकी की. लोगों ने ये आरोप लगाया कि इस नेता ने कैम्प की कुछ औरतों की इज्जत के साथ खिलवाड़ करने की भी कोशिश की.

शरणर्थियों ने इन बातों का ज़िक्र डर और खौफ के साये में किया. हम सब वहां बच्चों के लिए एक स्कूल खोलने गए थे. हमारा मक़सद यह था कि मुसलमानों की शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए शिविरों में स्कूल खोलना बहुत ज़रूरी है.

इस स्कूल को खोलने के लिए सामाजिक संस्था ‘खुदाई खिदमतगार’ ने अहम भूमिका निभाई. जब हमलोग शिविरों घूम-घूम कर लोगों से शिक्षा की अहमियत पर रोशनी डाल रहे थे और उनसे अपील कर रहे थे कि वह अपने बच्चों को इस स्कूल में भेजे, जहां शिक्षा, किताब और अन्य सहूलियात मुफ्त में प्रदान करने की जाएगी. इन सब बातों को सुनकर हमें शरणार्थियों ने पलटकर जबाब दिया कि एक स्थानीय तथाकथित मुस्लिम नेता ने पिछली रात को उनसे स्कूल के नाम पर 50-50 रुपये ऐंठ लिए. लोगों ने हमसे ये सवाल पूछा कि एक तरफ हम मुफ्त शिक्षा की बात कर रहे हैं तो फिर उनसे रूपये क्यों लिए गए? कुछ घंटे के अंदर ही हमें यह लगने लगा कि दाल में ज़रूर कुछ काला है.

इन सारी बातों का जिक्र करने का उद्देश्य यह है कि हमें मुसलमानों के उपर हो रहे बाहरी और अंदरूनी ख़तरों से सतर्क रहने की ज़रूरत है और शरणार्थियों की जिदंगी को और गंभीरता से देखने की ज़रूरत है.

शरणार्थियों ने आगे यह भी बाताया कि उपरोक्त मुस्लिम नेता राहत सामग्री और नगद का भी घोटाला करता है. इसी दौरान मुस्लिम नेता का एक रिश्तेदार वहां आया और लोगों को चिल्ला-चिल्लाकर डांटने लगा. उसकी झल्लाहट की वजह यह थी कि शरणार्शी मायावती के जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में लखनऊ की रैली में जाने से कतरा रहे थे.

लोगों ने काफी बहाना बनाया मगर आख़िरकार दर्जनों पकड़े गए और इन लोगों को जानवरों की तरह ट्रैक्टर की ट्राली में लाद दिया गया. उनके जाने के बाद औरतों ने गुस्से में कहा कि ये लोग हमारे मर्द को रैली के लिए ले गए मगर अब उनकी हिफाजत कौन करेगा?

इस बेबस आवाज़ ने हमें कैम्प को एक दूसरे तरीके से देखने को मजबूर किया. बहुत सारी बातें हम मर्द होने की वजह से औरतों के बारे में आसानी से नहीं समझ पाते हैं. आपको जानकर ये हैरानी नहीं होना चाहिए कि औरतें कैम्प में भी सुरक्षित नहीं हैं.

पहले सांप्रदायिक ताक़तों ने उनकी अस्मिता को तार-तार किया. मगर अब उनकी इज्ज़त पर हमला बड़े ही खामोशी के साथ अंजाम दिया जाता है. कैम्प के अंदर शारीरिक शोषण की घटना बढ़ रही है. इसकी वजह यह भी है कि कैम्पों में व्यक्ति की निजता (प्राईवेसी) का अभाव होता है. महिला डॉक्टरों की कमी की वजह से औरतों के कई सारी बीमारियों का ईलाज नहीं हो पा रहा है.

बातचीत के दौरान हमने पाया कि इन चार महीनों के कैम्प में बसी जिंदगी के दौरान बहुत सारी औरतों ने बच्चों को जन्म दिया और कई महिला गर्भवती भी हैं, मगर उनके लिए कोई विशेष सुविधा नहीं है. हमने कैम्प में कई सारी राहत सामग्री पाई जैसे अनाज, कपड़ा, रजाई, खिलौने इत्यादि मगर किसी ने यह नहीं सोचा कि औरतों के लिए महावारी के दौरान इस्तेमाल होने वाले कपड़े (सैनिटीरी नेपकीन) भी भेज दी जाए, किसी ने ये भी नहीं सोचा कि गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष भोजन की व्यवस्था की जाए.

औरतों के बाद, बात ज़रा बच्चों की भी हो जाए. शिविर में रहने वाले अधिकतर बच्चे पढ़ने लिखने के माध्यम में काफी पीछे हैं. अभिभावक बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी उतनी ही समझते हैं कि जितनी ही जल्दी उनके बच्चों की शादी हो जाए. जब एक 18-20 साल के लड़के से स्कूल में आने के लिए कहा गया तो उसने पलटकर जबाब दिया “अरे भाई पढ़ने तो अब मेरा बेटा जाए”.

यह हमारे लिए चौंकाने वाला अनुभव था जब हमने कई ऐसे लड़कों को पाया जिनकी उम्र 20-25 से ज्यादा नहीं है, लेकिन वे कई बच्चों के माता-पिता हैं.

इसमें कोई शक नहीं है कि सांप्रदायिक हिंसा इसलिए कराई जाती है कि मुसलमानों को सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक तौर से पीछे धकेला जाए. इसके पीछे चाल यह है कि मुसलमानों के अंदर में असुरक्षा का डर इतना भर दिया जाए कि वह रोटी कपड़ा, मकान, शिक्षा और रोजगार के बारे में कभी सोच भी नहीं पाएं. मगर इसके साथ-साथ यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कैम्प की जिंदगी भी असुरक्षित है.

कैम्पों के अंदर भी मुसलमान एक दूसरी मुसीबत में फंसे हुए है. इसलिए हम सब की यह ज़िम्मेदारी है कि मुसलमानों के लिए हो रहे राहत और पुर्नवास योजना बनाते वक्त बाहरी और अंदरूनी ख़तरों को भी ध्यान में रखा जाय.

(सैय्यद मो. रागिब और अभय कुमार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.)

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