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एक पत्थर ने जला दिया शहर…

Afaque Haider for BeyondHeadlines

आज़ादी के बाद से ही फ़साद यानी दंगे हिन्दुस्तान में बदस्तूर जारी रहें. चाहे हुकूमत किसी की भी रही हो. इन सभी फ़सादों का पैर्टन बिल्कुल एक जैसा रहा. हर फ़साद में सरकारी मशीनरी का ज़बरदश्त दुरुपयोग हुआ.

जहां कर्इ संप्रदाय के लोग एक साथ रहतें हैं, वहां सांप्रदायिक दंगों का होना कोर्इ नर्इ बात नहीं है. लेकिन अगर प्रशासन और पुलिस चाहे तो फ़साद पर आसानी से काबू पाया जा सकता है.

कुल मिलाकर हर फ़साद की रोकथाम पूरी तरह से प्रशासन और पुलिस पर निर्भर होती है. लेकिन सांप्रदायिक दंगों का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि सांप्रदायिक दंगों के दौरान पुलिस और प्रशासन पूरी तरह से पक्षपाती हो जाती है और कार्रवार्इ के नाम पर एक विशेष संप्रदाय के लोगों पर सख्ती करती है.

इस बात की पुष्टि नेशनल पुलिस कमीशन की छटी रिपोर्ट, मार्च 1981 में भी की गयी, जिसमें इस बात की निशानदेही की गयी कि कर्इ सांप्रदायिक तनाव के मौकों पर पुलिस कर्इ बार एक खास संप्रदाय का ही पक्ष लेती है और दूसरे संप्रदाय के लोगों पर जुल्म ढाती है. ऐसे ही खुलासे कर्इ और कमीशनों ने भी किया. लेकिन अफ़सोस कभी भी पुलिस वालों का ये रवैया राष्ट्रीय चिंता और सुरक्षा का विषय नहीं बना और न ही किसी बहस का…

पुलिस का सबसे बदतरीन चेहरा 2002 के गुजरात फसाद में देखने को मिला. जिसमें पुलिस वालों ने खुलकर दंगार्इयों का साथ दिया. पुलिस की जुल्म की दिल दहलाने वाली दास्तान मंज़र-ए-आम पर आयी.

गुजरात के नरोदा पाटिया में फसाद का शिकार होने वाली एक औरत अपने तीन माह के दूध पीते बच्चे को लेकर जब इधर-उधर भटक रही थी. इसी दौरान जब उसने एक पुलिस कांस्टेबल से भागने के लिए महफूज़ रास्ता पूछा तो कांस्टेबल ने वही रास्ता बताया जहां पहले से दंगार्इ घात लगाकर बैठे थे. दंगार्इयों ने इसके तीन महीने के बच्चे के साथ इसे जि़ंदा जला दिया. (टार्इम्स आफ इंडिया, 20 मार्च, 2002)

कर्इ तफ्तीश और कमीशन की रिपोर्टो से इस बात की पुष्टि हुर्इ है कि सांप्रदायिक दंगा प्रशासन की मिली भगत का नतीजा है. दंगों में प्रशासन की ओर से सख्ती केवल एक सांप्रदाय विशेष के खिलाफ ही किया जाता है.

आकड़ें गवाह हैं कि आधे से ज्यादा दंगों में मरने वाले 90 प्रतिशत अल्पसंख्यक ही होतें हैं, उसके बरक्स गिरफ्तारी, तलाशी, और पुलिस फायरिंग और कर्फ्यू का शिकार भी अल्पसंख्यक ही होते हैं. चाहे वह दिल्ली का फसाद हो, भागलपुर का फसाद, बॉम्बे का फसाद या फिर गुजरात का फसाद…

गुजरात में जहां इंसानियत की सारी हदें टूट गयी. 2800 से भी अधिक मुस्लिमों का कत्लेआम हुआ, मगर पुलिस की गोलियों से भी छलनी मुसलमान ही हुआ. 28 फरवरी, 2002 को नरोदा पाटिया में पुलिस फायरिंग मारे गयें 40 लोग सभी मुस्लिम थे ( इंडियन एक्सप्रेस, 9 अप्रैल)

इसी तरह पुलिस का जुल्म दंगों के बाद भी जारी रहता है. अधिकतर गिरफ्तारियां मुस्लिमों की ही होती हैं. इस सिलसिले में ‘लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एडमिनस्ट्रेटिव एकेडमी’ मसूरी का एक अध्ययन बड़ा दिलचस्प है कि मेरठ, 1982 में हुए दंगों के एफआर्इआर को पुलिस ने दो हिस्सों में तक़सीम कर दिया. एक में मुस्लिम पर हमले हुए और दूसरे में हिन्दुओं पर हमले हुए. जिन एफआर्इआर में हिन्दुओं पर हमले हुए उनमें 255 लोगों की गिरफ्तारी हुर्इ और जिनमें मुसलमानों पर हमले हुए उनमें एक भी गिरफ्तारी नहीं हुर्इ.

ये सुनकर ताज्जुब होगा कि एफआर्इआर में दर्ज मरने वाले में 7 मुस्लिम थे और 2 हिन्दु. लेकिन इसके बावजूद पुलिस की कार्रवार्इ ठीक इसके बरक्स थी, जो पुलिस के सांप्रदायिक मानसिकता को उजागर करती है.

एक पत्थर ने जला दिया शहर…

रांची से मुज़फ्फरनगर तक हर शहर सिर्फ एक पत्थर से जला है. मुज़फ्फरनगर में नांगलादौड़ की महापंचायत से वापस आ रहे लोगों पर पथराव होता है और पूरा शहर जल जाता है. ठीक इसी तरह सन 1967 में हिंदपिड़ही में उर्दू के खिलाफ एक जुलूस पर पथराव होता है और रांची में बदतरीन फसाद बरपा हो जाता है, जिसमें 184 लोग मारे जातें हैं. जिसमें 164 मुसलमान होतें हैं.

इसी तरह जमशेदपुर में राम नवमी के एक जुलूस पर मुस्लिम बहुल इलाके में पथराव होता है और देखते ही देखते पूरे शहर में आग और खून की होली शुरू हो जाती है, जो बदतरीन फसाद की शक्ल अख्तियार कर लेती है.

गोधरा में ट्रेन में पथराव होता है और आगजनी होती जिसमें 56 लोग मारे जातें हैं दूसरे दिन पूरा गुजरात जल जाता है. हकीकत तो ये है कि कोर्इ भी सांप्रदायिक तनाव सड़क से पहले ज़हन में शुरू होता है. दंगों के लिए ज़हनसाज़़ी और तैयारी बहुत पहले हो चुकी होती है. हर फसाद से पहले एक पत्थर दरकार होता है, जिससे दंगों की शुरूआत कि जा सके.

पत्थर तो एक डरे हुए लोगों का रद्दे अमल होता है जो फसादियों को वजह देता है फसाद को शुरू करने का ताकि फसाद को सही ठहराया जा सके. वरना ये मुमकिन नहीं है कि एक पत्थर से पूरा शहर जल जाए चाहे वह मुज़फ्फरनगर हो, जमशेदपुर, रांची या भिवंडी…

दंगों की सच्चार्इ आर.एस.एस के विचारक एम.एस गोवलकर द्वारा लिखी गयी किताब ” we, or Our Nationhood define, 1939” में मिलती है, जिसमें गोवलकर ने केवल हिन्दुओं को ही भारतीय माना है, बाकी दूसरे संप्रदाय को नहीं. लेकिन उन्हें भी रहने दिया जाये मगर उन शर्तों पर जिसे यहां के हिन्दू चाहेंगे.

इस लिए दंगों को हथियार बनाकर मुसलमानों को मुख्यधारा से अलग किया जाता है ताकि वह मुल्क की किसी भी पॉलिसी साज़ी का हिस्सा न बन सकें. इसलिए गुजरात फसाद में खासकर उन मुसलमानों को दंगों में निशान बनाया गया जो मुख्यधारा का हिस्सा थें. जिनमें जज से लेकर सांसद शामिल हैं. एहसान जाफरी इसी साजि़श का शिकर हुए.

सांप्रदायिक दंगों में पुलिस की भूमिका

सांप्रदायिक दंगा पुलिस के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं होता है. क्योंकि पुलिस लड़ने वाली दोनों संप्रदाय में से किसी एक से संबंध रखती है. ऐसे हालात में पुलिस का अपना फर्ज़ बिना किसी भेदभाव और पक्षपात के निभाना किसी अगिन परीक्ष से कम नहीं है. तनाव के दौरान शांति स्थापित करना पूरी तरह से पुलिस पर ही निर्भर होता है.

मशहूर आर्इपीएस अफसर डॉ. विभूति नारायण राय के अनुसार अगर पुलिस चाहे तो कोर्इ भी दंगा 24 घंटे से अधिक समय तक जारी नहीं रह सकता. दंगों का न रुकना पुलिस के पक्षपाती होने की दलील है. पुलिस उसी समाज का हिस्सा है जिस समाज को सांप्रदायिकता का विषाणु संक्रमित कर चुका होता है. खाकी पहनकर भी वह पुलिस वाले न होकर केवल एक संप्रदाय विशेष के हो कर रह जातें हैं.

इसकी सबसे दर्दनाक मिसाल हाशिमपुर का फसाद है, जिसमें पीएसी के जवानों ने 40 निर्दोष और निहत्ते मुसलमानों की नृशंष हत्या कर दी और उनके शवों को गजि़याबाद के निकट नहर में बहा दिया.

डा. विभूती नारायण उस वक्त गाजि़याबाद के एस.पी थे. उन्होंने जब इस पूरे मामले के तफ्तीश की और इस अमानवीय कार्य के पीछे की मानसिकता को जानने की कोशिश की तो पता चला कि खाकी पहनकर भी वे पुलिसकर्मी न थें, बल्कि एक समुदाय विशेष के होकर रह गये.

मुसलमानों को दुश्मन समझना उनके ज़हन में पेवेस्त था. जब उन्होंने मुसलमानों की हिन्दुओं पर की जा रही ज्य़ादती की झूठी अफवाह सुनी तो उसे तुरंत सही मान लिया और 40 निर्दोष मुसलमानों की हत्या इसी मानसिकता का रद्दे अमल था.

यही कहानी भागलपुर के लुर्इआ गांव में दोहरायी गयी. जब पुलिस और दंगार्इयों की मिली भगत से 100 लोगों की हत्या कर दी गयी. यही कहानी बाम्बे में, गुजरात में और अब मुज़फ्फरनगर में दोहरार्इ गयी, जहां दंगा से पीडि़त भी एक खास सांप्रदाय ही हुआ और पुलिस से प्रताडि़त भी वही हुआ.

इसकी सबसे बदतरीन और दिलदहला देने वाली मिसाल गुजरात, 2002 का फसाद है, जहां पुलिस ने दंगार्इयों को मारने और लूटने का लार्इसेंस दे रखा था.

पुलिस का एक तरफा कार्रवार्इ

पुलिस का दंगों में कार्रवार्इ पूरी तरह से पक्षपाती रहा है. जिसकी दास्तान खुद आंकड़े बयान करतें हैं. आकड़ों के अनुसार तलाशी, गिरफ्तारी, फायरिंग, कर्फ्यू हमेशा एक संप्रदाय विशेष के खिलाफ ही होता है. आधे से ज्यादा दंगों में 90 प्रतिशत मरने वाले मुसलमान ही होतें हैं, लेकिन इसके बरक्स पुलिस गिरफ्तार भी इन्हें ही करती हैं.

भिवंडी में पुलिस फायरिंग में 9 मुसलमान मारे गयें, फीरोजाबाद में 6 मारे गयें, अलीगढ़ में 7, मेरठ में 6 और नरोदा पटिया में 40 मरे इन सभी दंगों में मुस्लिमों का ही कत्ले आम हुआ, लेकिन पुलिस का ये ज़ालिमाना चेहरा है कि इनकी फायरिंग में सिर्फ मुसलमान ही मरे.

इसी तरह पुलिस गिरफ्तारियों में भी पक्षपात करती हैं. भिवंडी और मेरठ के दंगों में जहां मुसलमानो का ही कत्लेआम हुआ, वहां गिरफ्तारियां भी मुसलमानों की ही हुर्इ. कुल गिरफ्तार लोगों में 164 हिन्दू और 1290 मुसलमान थे. इसी तरह की ज्यादती बाम्बे में और गुजरात में देखने को मिली.

दंगों में खाकी और खादी का गठजोड़

सभी दंगों के अध्ययन से एक बात साफ हो जाती है कि हर दंगा खाकी और खादी के गठजोड़ का ही नतीजा है. आज़ादी के बाद से अब तक जितने भी दंगे हुए उनमें राजनीतिक हित निहित रहें. चाहे वह बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद हुए दंगे या गुजरात के दंगे. और हर बार पुलिस वालों के साथ सियासतदां भी दोषी पाये गयें.

बाम्बे के फसाद में बाल ठाकरे की शिवसेना को और पुलिस अधिकारी आर. डी त्यागी को दोषी पाया गया. वहीं गुजरात के फसाद में सत्ताधारी दल के बड़े नेता इसमें संलिप्त पाए गयें. गुजरात में भाजपा ने सत्ता संभालते ही तमाम मुस्लिम आर्इपीएस अधिकारी को सक्रिय पदों से हटा दिया.

आर्इपीएस संजीव भट्ट के द्वारा अदालत में दिये गये हलफनामे में मोदी ने गोधरा कांड के बाद राज्य के आला पुलिस अधिकारी के साथ मीटिंग में तमाम पुलिस अधिकारियों को दंगों के दौरान कोर्इ कार्रवार्इ न करने का और हिन्दुओं को अपने गुस्से के इज़हार की खुली छूट देने का हुक्म दिया. इसके अलावा जिन अधिकारियों ने दंगों को रोकने की ज़रा सी भी कोशिश उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़े.

दंगों में संलिप्त पुलिस अधिकारियों पर कार्रवार्इ

ये बात पूरी तरह से साफ हो गर्इ है कि हर दंगा पुलिस के तास्सुब और गैर-जि़म्मेदारी का ही नतीजा है. लेकिन इसके बरक्स वो पुलिस अधिकारी जो दंगों में संलिप्त पायें जातें हैं उन पर कभी कोर्इ कार्रवार्इ नहीं होती है.

शायद यही वजह है कि देश में खूनी फसाद बदस्तूर जारी है. अब तक जिस सबसे बड़े पुलिस अधिकारी को दंडित किया गया वह एक सब इंस्पेकटर है, जिसे भागलपुर फसाद में कथित भूमिका के लिए दंडित किया गया.

लेकिन हर फसाद में सियासतदानों के साथ पुलिस भी मज़लूमों के खून में बराबर की शरीक रही. 1992 के बाम्बे फसाद में आर.डी त्यागी ने 9 निहत्थे मुसलमानों की हत्या कर दी थी. जिसकी निशानदेही श्री कृष्ण कमीशन ने भी की. लेकिन इसके बावजूद वह प्रमोशन पाता गया और ज्वार्इन्ट कमीशनर के पद तक पहुंच गया. इतना ही नहीं, उसे शिवसेना ने लोकसभा चुनाव का टिकट भी दे दिया.

यूपी, बिहार, महाराष्ट्र में कभीं भी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने आरोपी पुलिस अफसरों पर कभी कोर्इ कार्रवार्इ नहीं की. इन्होंने कभी भी किसी भी कमीशन की सिफारिशों पर अमल नहीं किया, बल्कि उसे ठंडे बस्ते में डाला और उसका रजनीतिक लाभ उठाया.

पुलिस में सुधार और अल्पसंख्यकों की नुमाइंदगी की ज़रूरत

सांप्रदायिक दंगों में पुलिस द्वारा किया गया कार्रवार्इ उनके पक्षपाती होने की दलील है, जिसका गवाह खुद उनके द्वारा दिये गयें आकड़ें हैं. इसके अलावा उनकी ये कार्रवार्इ राजनीति से भी प्रभावित रहती है. अत: पुलिस में सुधार की आवश्यतकता है जिसकी वकालत कर्इ कमीशनों और बड़े पुलिस अधिकारियों ने भी की है.

लेकिन भारत में अभी तक इस दिशा में कोर्इ सार्थक पहल नहीं किया गया है. कर्इ देशों की पुलिस ने इस हालात से निपटने के लिए उपयुक्त क़दम उठायें हैं, जिनमें ब्रिटेन और अमेरीका उल्लेखनीय हैं. जहां पुलिस फोर्स में अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाया गया. वहीं पुलिस की ट्रेनिंग में भी बदलाव किया गया. इसके अलावा पुलिस को जवाबदेह बनाया गया. जिससे बहुत हद दक पुलिस वालों में पक्षपात को कम किया जा सका.

हिन्दुस्तान में पुलिस फोर्स में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधत्व न मात्र है. केवल 4 से 5 प्रतिशत के आसपास है. शायद पुलिस में हो रहे पक्षपात का एक बड़ा कारण है. किन्तु हिन्दुस्तान में सबसे पहले तो कोर्इ इस बात को मानने को ही तैयार नहीं है कि पुलिस फोर्स पक्षपाती है. जब लोग मर्ज़ को मानने के लिए ही तैयार नहीं हैं तो इसका र्इलाज कैसे होगा.

कानून में बदलाव

सांप्रदायिक दंगों से निपटने के लिए विशेष कानून की आवश्यकता है. जो दोषी पुलिस अधिकारी पर कुछ जिम्मेदारी डाल सके. कोर्इ भी अधिकारी जिसकी लापरवाही या इच्छा से दंगा होता है. उसे सबसे बड़ी सज़ा के रूप में उसका ट्रांसफर इससे अधिक बड़े ओहदे पर कर दिया जाता है. इसलिए एक कानून दरकार है जो जवाबदेही भी तय करे और उन्हें दंडित भी करे इसके अलावा सांप्रदायिक दंगों से जुड़े मामले के निपटारे के लिए विशेष कानून की ज़रूरत है जो इन मामलों की सुनवार्इ जल्द से जल्द करे, ताकि दोषी अधिकारयिें को इनके अंजाम तक पहुंचाया जा सके.

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