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Reading: रेलवे का बढ़ा किराया : कितना गलत कितना सही?
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BeyondHeadlines > Lead > रेलवे का बढ़ा किराया : कितना गलत कितना सही?
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रेलवे का बढ़ा किराया : कितना गलत कितना सही?

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published June 23, 2014 25 Views
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15 Min Read
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Amit Bhaskar for BeyondHeadlines

भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष के नेता समेत उनके समर्थक रेलवे में बढे किराए को सही ठहराने के लिए तरह तरह के तथ्यों को पेश करने की कोशिश में लगें हैं. कमाल की बात यह है कि इस फैसले को लागू करने से पहले कोई चर्चा नहीं की गयी. ना बजट के आने का इंतज़ार किया गया.

जाहिर है जिस तरह के ‘अच्छे दिन’ का वादा किया गया था वो जनता को दिख नहीं रहा और सरकार बैकफुट पर दिख रही है. लेकिन अपने बचाव में भाजपा द्वारा दिए जा रहे बयान आम जनता के गले उतरते नहीं जान पड़ते. आइये ऐसे ही कुछ तथ्यों पर रौशनी डालते हैं…

पहला तर्क-

रेलवे के किराए को बढ़ाने सम्बन्धी बिल कांग्रेस की सरकार ने ही पास किया था, पर इसे लागू नहीं किया गया क्योंकि चुनाव थे. पर चुनाव के ख़त्म होते ही वो बिल लागू करना पड़ा जिससे रेल किराया बढ़ गया.

पहला सवाल यहां ये है कि क्या जनता ने भाजपा को पूर्ण बहुमत इसीलिए दिया ताकि वो पिछली सरकार के फैसले लागू कर सकें? जो सरकार कथित तौर पर पुराने सरकार द्वारा बनाए गए गवर्नरों को हटा सकती है, वो एक बिल स्थगित नहीं कर सकती? भाजपा पिछली सरकार के जासूसी काण्ड वाले फैसले को रद्द करने पर विचार कर रही है, पर रेल किराया बढ़ाए जाने के फैसले का नहीं.

दूसरा सवाल जो जनता के मन में उठ रहा है… वो ये है कि अगर कांग्रेस का ये फैसला इतना ही सही था तो जब रेलवे किराए को बढ़ाने सम्बन्धी बिल कांग्रेस लेकर आई तब भाजपा समेत मोदी जी ने उसका विरोध क्यों किया? मोदी जी ने तत्कालीन प्रधानमन्त्री को चिट्ठी लिख कर किराए बढाने को गलत क्यों बताया? तब मोदी जी ने ये क्यों कहा की ‘रेल बजट के आने से पहले रेल किराए को बढ़ाना विकास को रोकने के लिए है और ये कांग्रेस सरकार के कार्यशैली के खराब होने का सबुत है. क्या ये लुभावने बयान केवल वोट बैंक के खातिर दिए गए थे? तो क्या अब मोदी जी को अपने उस बयान के लिए माफ़ी मांगकर ये नहीं कहना चाहिए कि उनका तत्कालीन बयान उसकी भूल थी? ये क्यों ना मना जाए कि कांग्रेस के एक तथाकथित अच्छे फैसले के खिलाफ जनता को मोदी जी ने भड़काया केवल सत्ता के लालच में?

तीसरा सवाल ये कि क्या सच में केवल रेल किराया बढ़ा है? रेल से आयात होने वाले फलों, सब्जियों, तेल, खाद आदि हर चीज़ इससे महंगी हो जाएगी. क्या इससे जनता के अच्छे दिन आ सकते हैं? क्या क़र्ज़ में डूबे किसान ने महंगे खाद के लिए वोट दिया?

दूसरा तर्क-

रेलवे को हज़ारों करोड़ का नुक़सान उठाना पड़ रहा है और इस बढ़ोत्तरी से रेलवे को 7900 करोड़ का फ़ाएदा होगा.

पहली बात 2013 में अक्टूबर में आई रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय रेलवे को 54462 करोड़ का मुनाफा हो रहा था. ये मुनाफा पिछले साल यानी 2012 की तुलना में करीब 7 हज़ार करोड़ से भी ज्यादा था. अचानक चुनाव से पहले चंद महीनों में ऐसा क्या हो गया कि ज़बरदस्त मुनाफे में चल रही भारतीय रेल अचानक घाटे में डूब गयी? क्या मुनाफे का सारा पैसा पिछली सरकार ने चुनाव में लगा दिया? अगर हाँ, तो क्या नयी सरकार जांच करवाएगी? अगर ना तो रेलवे को घाटा हुआ कैसे? क्या इसकी जांच हुई? चर्चा हुई?

दूसरी बात क्या किराया बढ़ने से रेलवे को मुनाफा होना शुरू हो जाएगा? अगर हाँ, तो क्या उस समय किराया घटा दिया जाएगा? क्या कभी ऐसा हुआ है कि किराया बढ़ने से सरकार को फ़ाएदा हुआ हो? हमेशा सभी सरकारों ने कुछ दिन में फिर घाटे का दावा किया है. कभी हमने नहीं सुना कि लो इस साल बड़ा मुनाफा हुआ हम किराया घटाते हैं. केवल लालू प्रसाद यादव ने ही ऐसा करके दिखाया था.

तीसरी बात ये कहां की अक्लमंदी है कि डीजल के दाम बढ़ाओं फिर रेल के किराए भी? डीजल के दाम बढ़ाने से रेलवे को नुक़सान तो होगा ही. फिर पिछली सरकार के हर महीने डीजल के दाम बढ़ाने वाले फैसले को नयी सरकार ने बरक़रार क्यों रखा? अगर डीजल के दाम घटाते जैसा कि श्री नरेन्द्र मोदी जी के हर भाषण से झलकता था तो रेलवे का नुक़सान अपने आप कम ना हो जाता?

चौथी बात  2011 की सीवीसी रिपोर्ट कहती है कि भारत में हर तीसरा भ्रष्ट इंसान रेलवे से सम्बन्ध रखता है. कैग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारतीय रेल में 17 हज़ार करोड़ रुपयों की धांधली हुई है. क्या नयी सरकार ने इस धांधली की जांच करने और इतनी बड़ी रक़म को वसुलने की कोशिश की? जनता क्यों ना समझे कि ये सारी रक़म चुनाव में खर्च कर दिए गए?

इतना किराया बढ़ाकर सरकार 7900 करोड़ का मुनाफा कमाना चाहती है, लेकिन जांच करके 17000 करोड़ वापस नहीं लाना चाहती आखिर क्यों?

तीसरा तर्क-

किराया बढ़ने से लोगों को अच्छी सुविधा मिलेगी. भाजपा समर्थकों द्वारा सोशल मीडिया पर फैलाए गए मेसेज़ में दावा किया जा रहा है कि रेलवे स्टेशन एअरपोर्ट की तरह हो जाएंगे. लोगों को फ्री वाईफाई मिलनी शूरु हो जाएगी. बुलेट ट्रेन आ जाएगी. लोगों को रोजगार मिलने लग जाएगा.

पहली बात कि इससे पहले भी कई बार किराए बढ़े हैं, लेकिन क्या उसके बावजूद लोग रेलवे में मिलने वाली सुविधा से खुश हैं? रिजर्वेशन के पैसे बचाने के लिए जो गरीब जनरल में एक ऊपर एक चढ़ के सफर करता है, उसे क्या फ्री वाईफाई चाहिए? इतने महंगे किराए के बावजूद रेलवे में मिलने वाला खाना इतना खराब है कि इसके खिलाफ प्रदर्शन हो चुके हैं. क्या जनरल डब्बे में सफ़र करने वाला इंसान बुलेट ट्रेन का खर्च उठा लेगा? रोज 80-100 रूपये की दिहाड़ी पर काम करने वाला शख्स क्या बुलेट ट्रेन और वाईफाई चाहता है? क्या हमें पहले राजधानी और शताब्दी की हालत नहीं सुधारनी चाहिए? देश के करोड़ों लोगों ने अब तक राजधानी में सफ़र तक नहीं किया वो क्या बुलेट ट्रेन में सफ़र करेंगे?

दूसरी बात कथित तौर पर सालाना नुक़सान करीब 24000 करोड़ रुपयों का है. जबकि वर्तमान बढ़ोत्तरी से केवल 7900 करोड़ का सालाना फ़ाएदा होगा. यानी एक तिहाई से भी कम. तो इसका मतलब ये कि किराए आगे भी बढाते रहने होंगे? क्या नुक़सान की भरपाई केवल एक तिहाई पैसों से हो जाएगी? और अगर नुक़सान के एक तिहाई पैसों से नुकसान की भरपाई होगी तो रेलवे के विकास के लिए फण्ड कहाँ से आएगा. ये पैसे तो नुकसान की भरपाई में चले जाएंगे. फिर ये सपने दिखाकर रेल किराये को सही ठहराना कहां तक सही है.

तो आखिर सरकार को करना क्या चाहिए था?

  1. रेलवे को सबसे बड़ा नुक़सान दलालों से है. सबसे पहले इनके खिलाफ सख्त कानून बनाने की ज़रूरत थी. लेकिन ऐसा करने में अब तक हर सरकार विफल रही है. फिर मोदी सरकार में नया क्या है?
  2. रेलवे के पास करोड़ों टन मलबा या कबाड़ है, जिसमे 96% लोहा हैं. सरकार इन सबको नीलाम करके या बेच के अरबों रूपये कमा सकती है, जिससे रेल किराए बढ़ेंगे नहीं, बल्कि घट जाएंगे. लालू यादव ने कभी रेल किराया नहीं बढाया तो उसके पीछे एक कारण यह भी था.
  3. कैग की 2009 की रिपोर्ट के अनुसार मामूली ट्रेनों को तो छोड़िये, देश की सबसे अच्छी ट्रेन्स जैसे शताब्दी और राजधानी 50% केस में सही समय पर अपने गंतव्य स्थान पर नहीं पहुंचती, जिससे एक्स्ट्रा डीजल खर्च होता है, और इससे हर महीने 47.41 करोड़ रूपये का देश को नुकसान होता है. केवल राजधानी और शताब्दी के लेट होने से. अब इस घाटे को 12 महीनों से गुना कर दें तो साल में 568.92 करोड़ का नुकसान केवल इन दो तरह के ट्रेनों के लेट होने से होता है. क्या कम से कम इन दो ट्रेनों को नियमित करके ये करीब 600 करोड़ नहीं बचा सकते? अगर केवल इन दो ट्रेन के लेट होने से 569 करोड़ का नुकसान हो सकता है, तो देश के बाकि सभी ट्रेनों को मिला दें फिर नुक़सान हज़ारों करोड़ में होगा. ऐसे में सिग्नल और लाइन पर काम करके इन ट्रेनों को सही टाइम पर चलाते, जिससे हज़ारों करोड़ बचते. और इसके लिए सरकार के पास काफी धन है. क्योंकि इसकी लागत कम होती.
  4. हर साल केवल रेल हादसों से रेलवे को 100 करोड़ से अधिक का नुक़सान झेलना पड़ता है. अगर पिछले सरकार के बजट से ही सेफ्टी बढाने पर ध्यान दिया जाता तो क्या ये 100 करोड़ नहीं बचा सकते?
  5. पिछली सरकार ने अपने 10 साल के कार्यकाल में रेलवे के लिए जो घोषणाएं की, उसमें से ज्यादातर काम अब तक हुए ही नहीं है. मसलन रेल में ऑटोमैटिक द्वार लगवाना, ट्रेन में ग्रीन टॉयलेट की व्यवस्था, बिहार में 1000 मेगावाट का प्लांट तैयार करना, रेलवे के लिए होटल बनवाना, विंड पॉवर, थर्मल पॉवर प्लांट लगवाना, स्टील के कोच बनवाना, 500 मॉडल स्टेशन का निर्माण, आदि जैसे हज़ारों वादे किये गए थे और इन सबके लिए बजट फिक्स था. अब ये काम हुए भी नहीं और बजट भी ख़त्म हो गए कैसे? अगर बजट अब भी हैं तो उसका इस्तेमाल करके उन्हीं पुराने बचे कामों को खत्म कर दें तो देश को वर्ल्ड क्लास सुविधा आराम से मिल जाती.
  6. रेलवे को कुल कमाई का 68.42% हिस्सा मालगाड़ी या सामान ढोने से मिलता है और 25.87% रेलयात्रियों से. बाकी 5.71% कमाई प्रचार करने किराए आदि से आते हैं. अगर रेलयात्रियों से होने वाले कमाई की सिर्फ बात करें तो 25.87% कमाई का एक चौथाई फर्स्ट क्लास या एसी कोच में सफ़र करने वालों से आता है और तीन चौथाई हिस्सा लोअर क्लास में सफ़र करने वालों से. ऐसे में फर्स्ट क्लास का किराया बढ़ा सकते थे.
  7. ट्रेन का इन्सोरेंसे करवाया जा सकता है, जिससे किसी दुर्घटना के होने पर सरकार पर मुआवजे आदि का बोझ ना आये.
  8. भारतीय रेल के कई डिपार्टमेंट मर्ज किये जा सकते हैं. आज भी सैंकड़ो ऐसे डिपार्टमेंट हैं, जहां काम ना के बराबर होता है, पर उन्हें वेतन, भत्ता आदि देना पड़ता है. ऐसे डिपार्टमेंट को बाकी डिपार्टमेंट से मर्ज किया जा सकता है, जिनपर अतिरिक्त भार ना हो. एक अनुमान के अनुसार इससे हर साल करीब 100 करोड़ से ज्यादा की बचत होगी.
  9. भारतीय रेल सम्पूर्ण देश के कोने-कोने में जाती है. ऐसे में रेलवे द्वारा प्रचार करके आमदनी बढ़ाई जा सकती है. फिलहाल प्रचार और एडवरटाइजिंग से भारिटी रेल कुल आमदनी का केवल 5% ही कमा पा रहा है. अगर इसकी पूरी क्षमता का इस्तेमाल किया जाए, तो जितना अभी नुक़सान बताया जा रहा है, उतनी आमानी केवल प्रचार करके मिल जाएगी.
  10. ट्रेन में डब्बे बढाए जाएं और उनका सही समय पर संचालन का ध्यान रखा जाए. डबल डेकर ट्रेनों का प्रचलन बढ़ाया जाए. इन सबके लिए पिछली सरकार ने बजट तय कर रखे थे.
  11. सांसदों और विधायकों को फर्स्ट क्लास में मिलने वाली छुट वापस ली जाए. करीब एक लाख हर महीने कमाने वाले नेताओं को आम लोगों से ज्यादा सहूलियत क्यों?
  12. जब तक नुक़सान है, सभी सांसद और विधायक अपना रोजाना भत्ता, घर आदि के लिए मिलने वाले लाखों रूपये ना लें. इससे हरसाल अरबों रूपये बचेंगे.

बात सरकार के फैसले के खिलाफ जाने या आलोचना की नहीं है. यहां बात है सरकारी समझ की. कोई भी सरकार किसी भी नुकसान की भरपाई का तरीका केवल किराया बढ़ाना ही समझती है, जबकि होना ये चाहिए कि नुकसान के कारणों को दूर किया जाए.

ध्यान कितना नुक़सान हुआ से ज्यादा कैसे नुक़सान हुआ पर होना चाहिए. कोई सरकार सपने दिखाने का काम बहुत बेहतरीन तरीके से करती है. किराया वापस लेने का कोई सवाल ही नहीं दिखता, पर क्या ये सरकार जिन वजहों को गिना कर किराया बढ़ा रही है, वो ये दावा कर सकती है कि उन्हीं कारणों से अब किराए और नहीं बढ़ेंगे?

रेलवे के भ्रष्टाचार से होने वाले करोड़ों के नुक़सान का क्या? इस फैसले से क्या पता नहीं लगता है कि सरकार नुक़सान की वजह तलाशने से बेहतर जनता पर बोझ डालके अपनी गलती से हो रहे नुक़सान की भरपाई चाहती है? जनता जिसे अपना सेवक बना कर भेजती है वो अपनी फैसिलिटी तो पूरी रखता है पर जनता को मार खाता है. फिर कहेंगे जनता ने हमें चुन के भेजा है, पर क्यों भेजा है उसपर कोई तवज्जो नहीं देता…

(लेखक पत्रकारिता के छात्र हैं. और उनसे https://www.facebook.com/Amit.Bhaskar.Official.Fan.Page पर सम्पर्क किया जा सकता है.) 

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