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BeyondHeadlines > Lead > तुम्हारे पाँव के नीचे ज़मीन नहीं, कमाल है फिर भी तुमको यकीन नहीं…
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तुम्हारे पाँव के नीचे ज़मीन नहीं, कमाल है फिर भी तुमको यकीन नहीं…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published August 31, 2014 5 Views
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7 Min Read
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Anurag Bakshi for BeyondHeadlines

हम भारतीय जनमानस का स्वाभाविक गुण है कि हम अपने अतीत से, अतीत की जुड़ी यादों को उनसे जुड़ी बातों व पलों को और यहां तक कि सामानों और कभी-कभी किताबों और वस्तुओं से भी जुड़े और संजोय रखते हैं.

व्यक्तियों से जुड़े रहने को ही सम्बन्ध कहते हैं, जिस पर हम गर्व भी करते हैं. कुछ पुरानी चीजे जिनका कोई इस्तेमाल शेष नहीं होता, उनके लिए भी हमारे घरों में जगह निकल ही आती है. फिर चाहे घर कितना ही छोटा हो.

हम कहते हैं कि दिल में जगह होनी चाहिए. कई बार मकान बदलने की स्थिति में भी उनको साथ ही ले जाते हैं कि बाद में तय करेंगे कि अब इसका क्या करना है…

भारतीय जनता पार्टी में भी आज कुछ ऐसा ही समान (व्यक्ति) हैं, जिनके लिए घर के कोने में जगह खोज ली गई है. इस सबमें ज्यादा समस्या इसलिए नहीं हुई क्योंकि आज कुनबा बहुत बड़ा हो गया है.

समय के साथ कई बार मनुष्य भी समान की श्रेणी में आ जाता है. आज अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी सरीखे व्यक्ति भी समान ही नज़र आ रहे हैं, जिनकी आज टॉप नेतृत्व में कोई आवश्यकता नहीं. पर फेंका भी नहीं जा सकता. इसलिए रख दिया एक तरफ…

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक समिति का पुनर्गठन किया है. अब इस समिति में भाजपा क्या जनसंघ के संस्थापक रहे लोग भी नहीं होंगे?

कोई भी इन्सान जब इस्तेमाल की चीज़ ही समझी जाने लगे तो उसकी एक्सपायरी डेट भी तय कर दी जाती हैं और इसका निर्धारण इस्तेमाल करने वाला ही करता है.

ऐसी ही एक जगह अब भाजपा में खोजी जा चुकी है इन लोगों के लिए, जिसका नाम हैं “मार्ग-दर्शक मंडल”… शायद ये पहली बार इतिहास में कभी हुआ होगा कि एक मार्ग-दर्शक मंडल बना हो वो भी बिना उस मंडल या कमंडल के ही मार्ग-दर्शन के ही बन गया हो.

उसमें जाने वाले सदस्य जो नाम को पार्टी के मार्ग-दर्शक हैं. पता नहीं उनसे भी पूछा गया या नहीं. या पता नहीं पूछे जाने पर उन लोगों के पास “YES” के अलावा कोई और विकल्प दिया गया भी या नहीं. लेकिन कुल मिलाकर एक बात तो तय है कि अब पार्टी या सरकार को इससे कोई मार्ग-दर्शन तो नहीं लेना.

ये समान नहीं व्यक्ति थे और वो भी बहुत सीनियर व्यक्ति… इसलिए दो उपयोगी लोग एक पीएम नरेन्द्र मोदी और नम्बर दो के व्यक्ति राजनाथ जी को भी इसमें जगह दी गयी. आखिर लोक-लाज भी रखनी हैं.

बाक़ी राजनाथ सिंह का इसमें आना ज़रूर थोड़ा अटपटा सा लगा. लेकिन शायद इसी प्रकार उनकी पार्टी में नम्बर दो के स्थान पर पुनर्स्थापित किया जा सकता था. लेकिन उसी के अगले दिन कुछ अफवाहों का बाज़ार गर्म हुआ कि उनके पुत्र ने कुछ पुलिस अधिकारियों से मनचाही पोस्टिंग दिलाने के लिए पैसे ले लिए हैं. और शायद आज़ाद भारत में पहली बार कोई ऐसी अफवाह से बजार गर्म हुआ जिसका खंडन पहले पीएम पद से भी आ गया और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से भी. लेकिन कुल जिन लोगों की भी सिफारिशों की खबर अफवाह बन कर उड़ी थी, वो पोस्टिंग ज़रूर नहीं हो पाई और रोक लगा दी गई.

वैसे आज अटल जी तो शारीरिक रूप से इतना सक्षम नहीं कि इस पर कोई टिप्पणी भी करते. पर आडवाणी ने और जोशी  ने भी मूक सहमती देना ही मुनासिब समझा. जो दशकों तक लोगों को चुप करने की ताक़त रखते थे, आज शायद समय ने ही उनको चुप करा दिया.

ऐसी ही परिस्थियों पर महाभारत में अर्जुन की विवशता पर कहीं लिखा हैं… “मनुज बली नहीं होत है, समय होत बलवान, वहि भिलिनी वहि गोपीयां वहि अर्जुन वहि बाण.” तो समय ही व्यक्ति की ताक़त और रूतबा तय करता है.

वैसे तो लोकसभा चुनाव के पहले दोनों नेताओं के पास मौका था. चुनावी राजनीति से सन्यास लेने का. और एक नयी पारी की शुरुआत करने का दोनों को ही पार्टी ने राज्यसभा जाने के लिए प्रस्ताव भी रखा था, लेकिन दोनों ही ठुकरा भी दिया था.

बात यहां तक सीमित न रख दोनों ने ही समय की रफ्तार से उलट चलने की कोशिश भी करी. वो बात और है कि बाद में जोशी ने सीट छोड़ एक तूफ़ान की तरफ से आंख मूंदने की कोशिश ये सोच कर ज़रूर की कि टल ही जाएगा.

अपने पूर्व के प्रयासों में क्योंकि दोनों विफल रहे थे और तब भी हार मानने को तैयार न हुए. दोनों ने अपनी बदली हुई भूमिका को भी स्वीकार करने को मना कर दिया. जो सबको तो दिख रहा है सिवाए इन नेताओं के कि आज इनकी पारी भारतीय राजनीति से समाप्त हो चुकी है.

आशावादी होना अच्छी बात है, लेकिन आशावाद इतना भी दूर नहीं जाना चाहिए कि असलीयत से ही गाफ़िल हो जाए. महत्वाकांक्षा का घोड़ा बेलगाम हो जाए तो उपयोगी होना भी महत्वहीन हो सकता है.

सार्वजनिक जीवन में आपकी मान-मर्यादा और प्रतिष्ठा काफी कुछ इस बात से तय होती है कि आप समय के साथ होने वाले बदलावों को घट रहे घटनाक्रम को सही से समझ कर लगा पा रहे हैं या नहीं…

दुष्यंत कुमार जी ने ऐसे लोगों के लिए ही शायद ये लिखा है….

“तुम्हारे पाँव के नीचे ज़मीन नहीं, कमाल है फिर भी तुमको यकीन नहीं”

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