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‘आम आदमी पार्टी’ के बारे में मज़दूरों के लिए कुछ ज़रूरी बातें

Mazdoor Bigul Editorial Desk

हम मज़दूरों और मेहनतकशों को कुछ बातें समझ लेनी चाहिएः जो पार्टी पूँजीपतियों और मज़दूरों में समझौते की बात करते हुए खुशहाली का वायदा करती है वह आपको धोखा दे रही है;

दूसरी बात, जिस पार्टी के तमाम नेता स्वयं कारखानेदार, ठेकेदार, व्यापारी, दुकानदार, भूतपूर्व खाते-पीते नौकरशाह और एनजीओ चलाने वाले धन्धेबाज़ हों, वह मज़दूरों का भला कैसे कर सकती है? सत्तासीन हुई केजरीवाल सरकार मज़दूरों को ठेका प्रथा से मुक्ति देने के लिए एक ऐसे विधेयक का वायदा क्यों नहीं करती जो कि दिल्ली राज्य में सभी नियमित प्रकृति के कार्य पर ठेका मज़दूरी पर प्रतिबन्ध लगा देगा? अगर भ्रष्टाचार के प्रश्न पर केन्द्रीय कानून होने के बावजूद दिल्ली राज्य स्तर पर एक जनलोकपाल विधेयक पारित करवाया जा सकता है, तो फिर केन्द्रीय ठेका मज़दूरी कानून के कमज़ोर होने पर दिल्ली राज्य स्तर पर एक ठेका मज़दूर उन्मूलन विधेयक क्यों नहीं पारित करवाया जा सकता है? अगर भ्रष्टाचार के लिए पिछली बार की तरह एक हेल्पलाइन शुरू की जा सकती है, तो मज़दूरों के ख़िलाफ़ होने वाले अन्याय और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक अलग मज़दूर हेल्पलाइन क्यों नहीं शुरू की जा सकती है? दिल्ली राज्य में जीवन के महँगे होने के मद्देनज़र केजरीवाल सरकार यह वायदा क्यों नहीं करती कि वह न्यूनतम मज़दूरी को दिल्ली राज्य स्तर पर बढ़ाकर कम-से-कम 15000 रुपये तक करेगी? इसलिए क्योंकि ये माँगें पूँजीपतियों और मालिकों के ख़िलाफ़ जायेगी, जिनसे दरवाज़े के पीछे केजरीवाल सरकार और ‘आम आदमी पार्टी’ की यारी है.

केजरीवाल सरकार ग़रीबों और मज़दूरों को बस कुछ लोकलुभावन नारे दे सकती है और कुछ प्रतीकात्मक सुधार के क़दम उठा सकती है. मज़दूरों की असली समस्याओं को दूर करना उसके लिए सम्भव नहीं है, क्योंकि वह मज़दूर वर्ग की पार्टी नहीं है, बल्कि छोटे मालिकों, ठेकेदारों, दुकानदारों और खाते-पीते मध्यवर्ग की पार्टी है. इसलिए ‘आम आदमी पार्टी’ मज़दूरों की मित्र नहीं है, बल्कि मज़दूरों को सबसे ख़तरनाक किस्म का धोखा देने वाली पार्टी है.

सवाल यह उठता है कि अब जबकि केजरीवाल की अगुवाई में आम आदमी पार्टीअभूतपूर्व बहुमत के साथ दिल्ली में सरकार बना रही है तो हम मज़दूरों को, जिनके वोटों के बूते केजरीवाल को मुख्यमन्त्री की गद्दी नसीब हुई है, क्या करना चाहिए?

हम मज़दूरों को क्या करना चाहिए?

हम मज़दूरों को केजरीवाल सरकार को बार-बार याद दिलाना होगा कि उसने हमसे क्या वायदा किया है. हमें मुख्य तौर पर दो वायदों को पूरा करने के लिए केजरीवाल सरकार को बार-बार घेरना होगा. लोग जब सत्ता में पहुँच जाते हैं तो वायदे भूल जाते हैं क्योंकि वायदे किये ही सत्ता में पहुँचने के लिए जाते हैं. ऐसे में, हमें बार-बार इन वायदों की याददिहानी करनी होती है. हमारे लिए दो वायदे सबसे अहम हैं. पहला है ठेका प्रथा को समाप्त करने का वायदा… और दूसरा है झुग्गीवासियों को उनकी झुग्गी के स्थान पर पक्के मकान देने का वायदा.

इसमें एक वायदा है जिसके बारे में केजरीवाल सरकार कह सकती है कि इसमें वक़्त लगेगा और पाँच साल के लिए इन्तज़ार किया जाय. यह वायदा है झुग्गियों के स्थान पर पक्के मकान देने का वायदा. इसके लिए मज़दूरों को यह माँग करनी चाहिए कि केजरीवाल सरकार पक्के मकान देने की एक पूरी योजना प्रस्तुत करे जिसमें कि अलग-अलग इलाकों में पक्के मकान देने की एक अन्तिम तिथि दी जाय, चाहे वह दो, तीन या चार साल बाद ही क्यों न हों.

जब तक हम एक समयबद्ध वायदा नहीं लेते तब तक झुग्गियों की जगह पक्के मकान देने के वायदे का कोई अर्थ नहीं होगा. दूसरी बात यह कि हमें केजरीवाल सरकार से इस बाबत ठोस वायदा लेने के लिए दबाव बनाना चाहिए कि जब कि पक्के मकान नहीं दिये जाते, एक भी झुग्गी उजाड़ी नहीं जायेगी. क्योंकि अगर ऐसा होगा तो झुग्गियों के स्थान पर पक्के मकानों के वायदे का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा.

दूसरा वायदा ऐसा है जिसे तुरन्त पूरा करने की शुरुआत की जा सकती है. यह वायदा है ठेका प्रथा समाप्त करने का वायदा. इस बाबत दिल्ली के ठेका मज़दूरों को संगठित होकर यह माँग करनी चाहिए कि दिल्ली राज्य के स्तर पर केजरीवाल सरकार एक ऐसा कानून पारित करे जो कि सभी नियमित प्रकृति के कार्यों पर ठेका मज़दूर रखने पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाये. ऐसे कानून के बिना ठेका मज़दूरी का उन्मूलन दिल्ली में हो ही नहीं सकता है.

केन्द्रीय कानून में मौजूद तमाम कमियों का इस्तेमाल करके ठेकेदार और मालिक ठेका प्रथा को जारी रखेंगे. इसलिए अगर केन्द्रीय भ्रष्टाचार-रोधी कानून के कमज़ोर होने पर दिल्ली राज्य स्तर पर एक जनलोकपाल कानून पारित किया जा सकता है, तो फिर एक ठेका उन्मूलन कानून भी पारित किया जा सकता है. अगर केजरीवाल सरकार इससे मुकरती है, तो साफ़ है कि ठेका मज़दूरी उन्मूलन का उसका वायदा झूठा है.

ऐसा कानून बनने के बाद दिल्ली के मज़दूरों को यह माँग भी करनी चाहिए कि यह कानून सही ढंग से लागू हो सके इसके लिए उचित प्रबन्ध किये जाने चाहिए. इसमें सबसे महत्वपूर्ण है दिल्ली राज्य सरकार के श्रम विभाग में कर्मचारियों की संख्या में बढ़ोत्तरी करना. पहले भी सरकारें बार-बार यह कहकर पल्ला झाड़ती रही हैं कि श्रम विभाग में पर्याप्त लेबर इंस्पेक्टर व फैक्टरी इंस्पेक्टर नहीं हैं.

जब दिल्ली राज्य में लाखों की संख्या में ग्रेजुएट व पोस्ट-ग्रेजुएट बेरोज़गार घूम रहे हैं तो केजरीवाल सरकार श्रम विभाग में भारी पैमाने पर भर्ती करके रोज़गार भी पैदा कर सकती है और साथ ही श्रम कानूनों के कार्यान्वयन को भी सुनिश्चित कर सकती है. ठेका प्रथा के उन्मूलन सम्बन्धी माँग को पुरज़ोर तरीके से उठाने के लिए दिल्ली के सभी निजी व सार्वजनिक उपक्रमों व विभागों में कार्य करने वाले ठेका कर्मचारियों व मज़दूरों को गोलबन्द और संगठित किया जाना चाहिए. केवल इसी तरीके से यह सिद्ध हो सकेगा कि केजरीवाल सरकार वाकई ग़रीबपरस्त है या फिर उसने वोटों के लिए दिल्ली के ग़रीबों के साथ एक भारी धोखा किया है.

एक अन्य माँग जिसे दिल्ली के मज़दूरों और निम्न मध्यवर्ग के नौजवानों को ख़ास तौर पर उठानी चाहिए वह है दिल्ली राज्य स्तर पर एक रोज़गार गारण्टी विधेयक की माँग. हमारा तर्क यह है कि अगर कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार ने देश के स्तर पर एक ग्रामीण रोज़गार गारण्टी कानून पारित किया था, तो फिर दिल्ली राज्य पर जनता को रोज़गार गारण्टी कानून क्यों नहीं दिया जाना चाहिए?  हालाँकि मनरेगा में केवल 100 दिनों का रोज़गार मिलता था और उसके लिए भी न्यूनतम मज़दूरी नहीं मिलती थी, यद्यपि हमें इस अधिकार की माँग करनी चाहिए और यह भी माँग उठानी चाहिए कि इस कानून के तहत 100 दिन नहीं बल्कि कम-से-कम 200 दिनों का रोज़गार मिलना चाहिए और उसके एवज़ में दिल्ली राज्य की न्यूनतम मज़दूरी मिलनी चाहिए.

इस कानून में इस बात का प्रावधान होना चाहिए कि अगर दिल्ली सरकार दिल्ली के किसी नागरिक को रोज़गार नहीं दे पाती तो फिर उसे गुज़ारा-योग्य बेरोज़गारी भत्ता दिया जाना चाहिए. यानि कि उत्तर प्रदेश सरकार के समान 1000-1200 रुपये का बेरोज़गारी भत्ता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय न्यूनतम मज़दूरी के बराबर बेरोज़गारी भत्ता मिलना चाहिए. इस माँग से दिल्ली के मज़दूरों को कुछ सुरक्षा मिल सकती है, जो कि औद्योगिक मन्दी के चलते आए दिन बेकारी की मार झेलते हैं. साथ ही इस माँग के पूरा होने से दिल्ली के लाखों बेरोज़गारी युवाओं को भी रोज़गार मिल सकता है.

ये तीन बुनियादी माँगें उठाकर दिल्ली के मज़दूरों को संघर्ष करना चाहिए. आने वाले पाँच वर्षों में यह संघर्ष ही स्पष्ट करेगा कि ‘आम आदमी पार्टी’ और केजरीवाल के ‘सदाचार’ और ‘अच्छी नीयत’ के हो-हल्ले के पीछे का सच क्या है. हम मज़दूरों के सामने भी इनका असली चरित्र स्पष्ट होगा. मज़दूर आन्दोलन को ‘आम आदमी पार्टी’ का पिछलग्गू बनने की बजाय अपनी राजनीति की स्वतन्त्रता और स्वायत्तता को बनाये रखना चाहिए. मज़दूर वर्ग यदि अपनी राजनीति की स्वतन्त्रता और स्वायत्ता को नहीं बनाये रखता, अगर वह अपने अलग स्वतन्त्र संगठनों की स्वायत्तता को नहीं बनाये रखता तो फिर वह एक अपनी शक्ति खो बैठता है.

ऐसी सूरत में वह अपने ख़िलाफ़ किये जाने वाले धोखों और षड्यन्त्रों से नहीं लड़ सकता. वह निष्क्रिय हो जाता है, अशक्त हो जाता है. इसलिए ‘आम आदमी पार्टी’ की राजनीति के वर्ग चरित्र को समझने की आवश्यकता है. इस पार्टी ने जो वायदे हमसे किये हैं, तो उनमें से एक को भी पूरा करवाने के लिए हम मज़दूरों को अपने स्वतन्त्र आन्दोलन के ज़रिये केजरीवाल सरकार पर दबाव बनाना चाहिए, न कि उनकी पूँछ पकड़कर चलना चाहिए. अगर हमने चौकसी खोई, अगर हमने अपने स्वतन्त्र और स्वायत्त मज़दूर वर्गीय आन्दोलन को कमज़ोर होने दिया, तो आने वाले समय में हमें सिर्फ़ धोखा मिलेगा. चूँकि केजरीवाल सरकार ने हम मज़दूरों से बड़े-बड़े वायदे किये हैं इसलिए हमें अपने स्वतन्त्र मज़दूर वर्गीय आन्दोलन के बूते इनकी छाती पर सवार रहना होगा और इन्हें अपने वायदों से मुकरने का मौका नहीं देना होगा.

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