कल्पना कीजिए कि आपने कोई भी अपराध नहीं किया है और आप निर्दोष हैं. लेकिन एक दिन ऐसा आता है जब पुलिस आपको गिरफ़्तार कर लेती है. वे आपको भरपूर यातनाएं देते हैं. फिर वे आप पर आतंक और देशद्रोह जैसे जघन्य अपराधों का आरोप लगाते हैं.
कल्पना कीजिए कि इसके बाद आपको शायद 9, शायद 14, शायद 19 साल के लिए जेल की दीवारों के पीछे बंद कर दिया जाता है.
कल्पना कीजिए कि आपको मौत की सज़ा सुनाई जाती है और आप अनगिनत सालों तक उस सुबह का इंतज़ार करते हैं जब आपको फांसी पर चढ़ाया जाएगा.
कल्पना कीजिए कि एक दिन एक उच्च न्यायालय यह फ़ैसला सुनाती है कि आप पूरी तरह से निर्दोष हैं.
आप ख़ुद को आज़ाद पाते हैं.
आप जेल के दरवाज़े से गुज़र कर एक बिलकुल अनजानी दुनिया में क़दम रखते हैं. एक ऐसी दुनिया जो आपके पास से गुज़र चुकी है. एक ऐसी दुनिया जो आपके साथ हुए घोर अन्याय के प्रति या तो शत्रुतापूर्ण रवैया रखती है या उदासीन है.
आप एक ऐसे घर में क़दम रखते हैं जहां आपके प्रियजन मर चुके हैं, या आपकी पीड़ा से इतने व्यथित हैं कि आप उन्हें ठीक से पहचान नहीं पाते. आप अपने बच्चों को देखते हैं जिनका बचपन आप देख ही नहीं पाए.
आप समझते हैं कि आपको यह सब सिर्फ़ इसलिए सहना पड़ा क्योंकि आपका जन्म एक धर्म विशेष में हुआ है.
दुर्भाग्य से, यह एक ऐसे गणतंत्र में बहुत से लोगों की ज़िंदगी की कहानी बन गई है, जो न्याय और क़ानून द्वारा शासित एक धर्म-निरपेक्ष लोकतंत्र होने का दावा करता है.
20वीं सदी के आख़िरी और 21वीं सदी के पहले दशक में देश के अलग-अलग हिस्सों में कई आतंकी हमले और बम विस्फोट हुए. इनमें से हर हमले के बाद, कुछ अपवादों को छोड़कर, मुस्लिम पुरुषों पर इन जघन्य अपराधों का आरोप लगाया गया और उन्हें सालों तक जेल में रखा गया. उनके परिवार ग़रीबी और अपमान में जीते रहे. और फिर, एक-एक करके, ये मामले निराधार साबित होने लगे. अदालतों ने आरोपियों को निर्दोष घोषित कर दिया और कई वर्षों की अन्यायपूर्ण क़ैद के बाद वे रिहा हो गए. इस रहस्य से अभी भी परदा नहीं उठा है कि इन आतंकी हत्याओं की योजना किसने बनाई और उन्हें किसने अंजाम दिया.
बरी होने की इस शृंखला में नवीनतम उदाहरण वे 12 आरोपी हैं जिन्हें जुलाई 2006 में मुंबई लोकल ट्रेनों में हुए ब्लास्ट की साज़िश रचने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. शाम में जब ट्रेनों में बहुत भीड़ होती है उसी समय इन ट्रेनों में सात विस्फोट हुए थे. नौ साल बाद, एक विशेष अदालत ने पांच लोगों को मौत की सज़ा, सात को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई और एक व्यक्ति को बरी कर दिया. एक दशक बाद, जुलाई 2025 में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इस फ़ैसले को रद्द कर दिया, मौत की सज़ा पाए लोगों सहित सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया, जांच और अभियोजन की गुणवत्ता पर कड़ी टिप्पणियां कीं, और यातनाओं के वृत्तांतों पर भय व्यक्त किया. यातनाओं का जैसा विवरण किया गया अगर वे सच है, जिन्हें “अमानवीय, बर्बर” बताया गया, तो यह “किसी की भी अंतरात्मा को झकझोर देने वाला” था. वे 19 साल जेल में बिताने के बाद आज़ाद हो गए.
मैं इन लोगों की बात कर रहा हूं जो लंबे समय तक आतंकवादी अपराधों के आरोपों में उलझे रहने के बाद “निर्दोष आतंकवादी” के रूप में आज़ाद हुए हैं. जैसा कि मैंने कहा, दुखद रूप से मुंबई ट्रेन विस्फोट का मामला कोई अपवाद नहीं है.
बस कुछ उदाहरण लीजिए. यहां मैं जिन मामलों का ज़िक्र कर रहा हूं, उनमें से किसी में भी किसी पुलिस अधिकारी को यातना देने और झूठे सबूत गढ़ने के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया है. किसी भी “निर्दोष आतंकवादी” को जेल में अपनी जान गंवाने और अपने परिवारों की पीड़ा के लिए कोई मुआवज़ा या आर्थिक मुआवज़ा नहीं दिया गया है.
पुरानी दिल्ली निवासी मोहम्मद आमिर ख़ान को 1998 में 18 साल की उम्र में गिरफ़्तार किया गया था और दिल्ली तथा उत्तर प्रदेश व हरियाणा जैसे पड़ोसी राज्यों में हुए 19 बम विस्फोटों के झूठे मामलों में फंसाया गया था. अदालत ने मनगढ़ंत सबूतों, जबरन लिए गए इक़बालिया बयान और ठोस सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए उन्हें 14 साल बाद रिहा कर दिया.[1]
गुजरात पुलिस ने सूरत में मुस्लिम शिक्षा पर आयोजित एक सेमिनार में शामिल 127 मुस्लिम युवकों को गिरफ़्तार किया था, जिन पर यूएपीए के तहत प्रतिबंधित स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (सिमी) से जुड़े होने का आरोप लगाया गया था. 20 साल की कड़ी मशक्कत के बाद, मार्च 2021 में सूरत की एक अदालत ने सभी जीवित बचे 122 आरोपियों को बरी कर दिया. अदालत ने फ़ैसला सुनाया कि अभियोजन पक्ष “ठोस, विश्वसनीय और संतोषजनक सबूत पेश करने में विफल रहा” और उनके “खोए हुए वर्षों” को रेखांकित किया, लेकिन किसी को भी मुआवज़ा मिला हो इसकी सूचना नहीं मिली.[2]
मई 1994 में, जलगांव जिले के 11 मुस्लिम युवकों को पुलिस ने बाबरी विध्वंस का बदला लेने के लिए बम विस्फोटों की साज़िश रचने का आरोप लगाते हुए गिरफ़्तार किया था. इन युवकों ने ज़मानत मिलने से पहले 4 महीने जेल में बिताए, फिर 25 साल तक मुक़दमा चला. 27 फ़रवरी 2019 को, नासिक की एक टाडा अदालत ने सभी 11 युवकों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि “यह अदालत आपको निर्दोष मानती है”.[3]
फ़रवरी 2008 में, रामपुर (उत्तर प्रदेश) में एक सीआरपीएफ़ कैंप पर हुए आतंकवादी हमले में 7 जवान शहीद हो गए थे. हमले में इस्तेमाल किए गए हथियार जमा करने के आरोप में दो मुसलमानों को गिरफ़्तार किया गया था. मुक़दमे में उन्हें दोषी ठहराया गया और लगभग 11 साल की क़ैद हुई. 3 नवंबर 2019 को, एक स्थानीय अदालत ने दोनों युवकों को “सबूतों के अभाव” में बरी कर दिया.[4]
दिसंबर 1993 में, बेंगलुरु में चलने वाली पांच ट्रेनों में हुए बम विस्फोटों में 2 लोग मारे गए और 8 घायल हुए. गुलबर्गा के तीन मुस्लिम युवकों को (उनके इक़बालिया बयान के आधार पर) विस्फोटों के लिए दोषी ठहराया गया और जेल भेज दिया गया. उन्होंने 23 साल जेल में बिताए. जून 2016 में, सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी दोषसिद्धि को पलट दिया, क्योंकि बिना पुष्टि के जबरन लिया गया इक़बालिया बयान एकमात्र सबूत था.[5]
1 फ़रवरी 2002 को, अहमदाबाद शहर की बसों में टिफ़िन बॉक्स में छिपाए गए छह बम फट गए. 2003-04 में पुलिस ने दो मुस्लिम व्यक्तियों पर हमलों का आरोप लगाया. उन्होंने 13 साल जेल में बिताए, 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों की रिहाई का आदेश दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने सबूतों के अभाव का हवाला दिया और सभी आरोपों को “निरस्त” कर दिया, और दोनों को निर्दोष घोषित कर दिया.[6]
13 सितंबर 2005 को, दिल्ली में हुए 7 बम विस्फोटों में 67 लोग मारे गए. पुलिस ने दो मुस्लिम व्यक्तियों, कश्मीर के एक शॉल बुनकर और एक छात्र पर बम लगाने का आरोप लगाया. उन्होंने लगभग 12 वर्ष तिहाड़ जेल में बिताए, जब तक कि दिल्ली की एक अदालत ने दोनों को सभी आरोपों से मुक्त नहीं कर दिया, क्योंकि अदालत को इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि उनकी कोई भूमिका थी.[7]
2002 में गुजरात के दो अक्षरधाम मंदिरों में बम विस्फोट हुए, जिसमें 33 लोग मारे गए. पुलिस ने अहमदाबाद में एक मदरसा शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता तथा छह अन्य लोगों को गिरफ़्तार किया और पुलिस हिरासत के दौरान दिए गए इक़बालिया बयानों के आधार पर उन्हें दोषी ठहराया. इन लोगों ने 11 साल जेल में बिताए (अक्सर एकांत कारावास में). 16 मई 2014 को, सर्वोच्च न्यायालय ने यह मानते हुए सभी छह लोगों को बरी कर दिया कि जांच एजेंसी ने “एक मामला गढ़ने…और उन्हें फंसाने का गंभीर प्रयास” किया था.[8]
सितंबर 2006 में, मालेगांव (महाराष्ट्र) में दो बम विस्फोट हुए, जिसमें 37 लोग मारे गए. शुरुआत में, पुलिस ने इस्लामी समूहों को दोषी ठहराया और 9 मुसलमानों को गिरफ़्तार किया. उन्होंने यूएपीए के आरोपों का सामना करते हुए 10 साल जेल में बिताए. नवंबर 2016 में, मालेगांव की एक विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए सभी नौ लोगों को बरी कर दिया.[9]
2007 में, उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुरादाबाद के पांच मुस्लिम युवकों पर प्रतिबंधित हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी (हूजी) से संबंध रखने का आरोप लगाया था और उन्हें पाकिस्तानी प्रशिक्षण शिविरों में भाग लेने का आरोपी बनाया था. उन्हें नौ साल की जेल हुई, जिसके बाद 2015 और 2016 में उत्तर प्रदेश की एक अदालत ने सभी पांचों को बरी कर दिया.[10]
18 मई 2007 को हैदराबाद की मक्का मस्जिद में जुमे की नमाज़ के दौरान हुए बम विस्फोटों में 9 लोग मारे गए थे. पुलिस ने शुरुआत में चार मुसलमानों को गिरफ़्तार किया था, जिन्हें तेलंगाना की चंचलगुडा जेल में 7 साल तक बंद करके रखा गया. फ़रवरी 2014 में हैदराबाद की सत्र अदालत ने चारों को बरी कर दिया, क्योंकि उनके ख़िलाफ़ “कोई सबूत” नहीं मिला था. मक्का मस्जिद विस्फोटों के बाद, पुलिस ने आठ और लोगों को गिरफ़्तार किया, जिन पर आरोप था कि उन्होंने बदले की कार्रवाई में पुलिस अधिकारियों की हत्या की साज़िश रची थी. पांच लोग “मुठभेड़” में मारे गए. बाक़ी लोगों को 2017 में सभी आरोपों से बरी कर दिया गया.[11]
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मैं और भी ऐसी घटनाओं को बारे में बातें कर सकता हूं. राज्य की क्रूरता, पूर्वाग्रह और अन्याय के इन भयावह सबूतों के सामना करते हुए, मैं दो ऐसे लोगों के साथ बैठा, जिन्होंने कई साल जेल में बिताए थे, उन पर आतंकवादी अपराधों के आरोप लगे थे और फिर उन्हें रिहा कर दिया गया था. मैंने उनसे थोड़ा-बहुत सीखा कि कैसे ज़िंदगियां कुचल दी जाती हैं और कमज़ोर होती जाती हैं, कैसे आतंकवाद के झूठे आरोपों और कई सालों तक जेल में रहने के कारण जानें जाती हैं.
इनमें से पहला नाम मोहम्मद आमिर ख़ान का है. मध्ययुगीन पुरानी दिल्ली की संकरी गलियों में पले-बढ़े आमिर पर सिर्फ़ 18 साल की उम्र में 1996 में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को दहला देने वाले कई बम विस्फोटों का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगाया गया था. 2012 में रिहा होने के बाद, उन्हें सबसे पहले शबनम हाशमी के नेतृत्व वाले अनहद (ANHAD) का सहयोग मिला, जो सांप्रदायिक सद्भाव और अल्पसंख्यक अधिकारों को बढ़ावा देने वाला एक प्रमुख सामाजिक संगठन है. इसके बाद वे अमन बिरादरी और कारवां-ए-मोहब्बत में एक मूल्यवान वरिष्ठ सहयोगी के रूप में मेरे साथ जुड़ गए, जो एकजुटता, न्याय और उग्र प्रेम के साथ नफ़रत का मुक़ाबला करने का एक जन अभियान है.
दूसरे हैं अब्दुल वाहिद शेख़, जो मुंबई में एक स्कूल शिक्षक हैं और उन 13 लोगों में शामिल थे जिन पर 2007 में मुंबई की ट्रेनों में हुए बम विस्फोटों की योजना बनाने का आरोप लगाया गया था. नौ साल जेल में रहने के बाद उन्हें बरी कर दिया गया. तब से, उन्होंने एक मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक, वक्ता और विद्वान के रूप में एक उल्लेखनीय करियर बनाया है. उनकी पुस्तक बेगुनाह क़ैदी में उनके जेल के अनुभव दर्ज हैं. उन्होंने जेल में किए गए लेखन पर अपनी पीएचडी भी पूरी की है.
मैंने उनसे जो कुछ सीखा, उसके कुछ अंश प्रस्तुत हैं—
मोहम्मद आमिर ख़ान
मैं 18 साल का था जब मेरा अपहरण हुआ था. मैं इसे गिरफ़्तारी नहीं कहता. सादे कपड़ों में कुछ लोगों ने मुझे एक अंधेरे सुनसान गलियारे में पकड़ लिया जब मैं रात के खाने के बाद दवा की दुकान की तरफ़ जा रहा था. उन्होंने मुझे एक जिप्सी में डाल दिया, मेरी आंखों पर पट्टी बांध दी, मेरे हाथ पीठ के पीछे बांध दिए, और मुझे सात दिन और सात रातों तक एक ऐसी इमारत में रखा जो पुलिस स्टेशन नहीं थी. संविधान और क़ानून के अनुसार, सीआरपीसी में निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही गिरफ़्तारी की जाती है. मुझे गिरफ़्तार नहीं किया गया था, मेरा अपहरण किया गया था.
मुझे लगा कि वे अपराधी हैं. मैं सोच भी नहीं सकता था कि वे पुलिसवाले हैं. मेरे परिवार में तब तक किसी ने भी अदालत के अंदर का नज़ारा नहीं देखा था, पुलिस स्टेशन तो दूर की बात थी. मैं पुरानी दिल्ली में पैदा हुआ था, और इसके बाहर की दुनिया के बारे में बहुत कम जानता था. मैं किशोर था और मानता था कि पुलिस हमारी रक्षा के लिए है. मैंने उन लोगों से पूछा कि उन्होंने मेरा अपहरण क्यों किया. एक व्यक्ति गाली-गलौज के साथ धमकी भरे लहजे में गुर्राया.
30 मिनट के सफ़र के दौरान, मैं सोचता रहा कि मेरा अपहरण क्यों किया गया. मैंने हिंदी फ़िल्मों में देखा था कि लोगों का अपहरण या तो पारिवारिक दुश्मनी की वजह से होता था, या फिर बहुत अमीर लोगों का फिरौती के लिए अपहरण किया जाता है. मैं हैरान था क्योंकि हमारा ऐसा कोई दुश्मन नहीं था, और मैं एक निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार में पला-बढ़ा था.
जिप्सी एक इमारत के पास पहुंची और मुझे घसीटकर एक कमरे में ले जाया गया. उन आदमियों ने मेरी आंखों पर बंधी पट्टी तो खोल ही दी, मेरे सारे कपड़े भी उतार दिए. मैंने अपने गुप्तांग छिपाने की कोशिश की. लेकिन उनमें से एक हंसा – शर्म क्यों आती है, ये तो हमारा रोज़ का काम है.
सात दिन और सात रात तक मुझे थर्ड डिग्री टॉर्चर दिया गया. दर्द बर्दाश्त से बाहर था, मैं चीख रहा था, रो रहा था. लेकिन मेरे चीखने-चिल्लाने और गिड़गिड़ाने का उन लोगों पर कोई असर नहीं पड़ रहा था, मानो ये उनका रोज़ का काम हो. उन्होंने मुझे इस हद्द तक प्रताड़ित किया कि जैसे उन्हें इस बात का कोई डर ही न हो कि उन्हें इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा.
जो यातनाएं मैंने झेलीं वो आज भी मेरा पीछा करती हैं. उन्होंने मेरे नाख़ून नोच डाले, मेरे गुदा में पेट्रोल डाला. उन्होंने मेरे निप्पल और गुप्तांगों पर बिजली के झटके दिए. वे मुझे ढेर सारा पानी पिलाते: फिर मुझसे एक टब में पेशाब करवाते जिसमें बिजली के तार डूबे होते, जिससे मेरे गुप्तांगों में झटके लगते. वे मेरे पैरों और पीठ को लकड़ी के लट्ठों से दबाते. ये सभी ऐसी यातनाएं थीं जिनमें शरीर पर चोट के निशान दिखाई नहीं देते.
जैसे-जैसे यातना के दिन बीतते गए, मुझे धीरे-धीरे समझ आने लगा कि ये पुलिसवाले ही होंगे, क्योंकि हथकड़ियां और वायरलेस सेट दिखाई देने लगे. जब कोई सीनियर अंदर आता, तो वे पुलिसवालों की तरह सलामी देते.
उन्होंने मुझसे ज़बरदस्ती इक़बालिया बयान के लिए कोरे काग़ज़ों पर दस्तख़त करवाए और मुझे मजिस्ट्रेट की अदालत ले गए. मुझे नहीं पता था कि वे मुझे कहां ले जा रहे हैं, लेकिन उन्होंने मुझे चेतावनी दी कि मुझे चुप रहना है: “याद रखना कि आख़िरकार तुम हमारे पास वापस आओगे.”
जब मैं अदालत कक्ष में दाख़िल हुआ, तो मुझे समझ आ गया कि यह अदालत है क्योंकि मैंने फ़िल्मों में अदालत कक्ष देखे थे. मेरे पास कोई वकील नहीं था. जज, अभियोजक, पुलिसवाले, सभी अंग्रेज़ी में बात कर रहे थे. मुझे एक शब्द भी समझ नहीं आया. मैं चुप रहा, क्योंकि पुलिस ने मुझे चेतावनी दी थी. बाद में पता चला कि मुझे एनसीआर क्षेत्र में दो साल पहले, 1996-1997 में, हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों का आरोपी बनाया गया था.
इसके बाद मुझे क़ानूनी हिरासत में रखा गया. हर 24 घंटे में मुझे डॉक्टर के पास जांच के लिए ले जाया जाता था. लेकिन पुलिसवाला डॉक्टर से कहता, “याद है वो बम धमाके जब तुम्हें पीड़ितों के शरीर से छर्रे निकालने पड़ते थे.” मेरे हाथों में हथकड़ी लगा होता, मेरी तरफ़ इशारा करते हुए कहता, “यही वो शख़्स है जिसने बम फोड़ा था.” एक डॉक्टर ने जवाब दिया, “मुझे उसके शरीर पर कोई चोट नहीं दिख रही. तुम ठीक से काम नहीं कर रहे हो. अपना काम अच्छे से करो. मैं यहां हूं. चिंता मत करो. मैं काग़ज़ों पर दस्तख़त कर दूंगा कि कोई यातना नहीं दी गई है.”
इसी तरह वे डॉक्टरों, नर्सों, मीडिया, यहां तक कि अदालतों से भी बात करते थे. नतीजा यह हुआ कि उनमें जो भी मानवीय सहानुभूति और करुणा बची थी, वो पूरी तरह से ख़त्म हो गई. करुणा तो छोड़िए, वे उन अधिकारों की भी रक्षा करने को तैयार नहीं थे जो क़ानून ने मुझे दिए थे. इसी तरह वे उन सभी संस्थानों के लोगों के मन में ज़हर फैलाते थे जो हमारी रक्षा के लिए थे.
लेकिन कुछ अच्छे उदाहरण भी थे. मुझे याद है कि मुझे हथकड़ी लगाकर एक महिला डॉक्टर के पास ले जाया गया था. उसने मुझसे पूछा कि क्या मुझे कोई चोट लगी है. मैं बच्चा था और बहुत डरा हुआ था, इसलिए चुप रहा. उसने पुलिसवाले से कहा, “उसकी हथकड़ियां खोलो और कमरे से बाहर निकल जाओ. मैं इसका अच्छी तरह से जांच करना चाहती हूं.” पुलिसवाले ने उसे रोकने की कोशिश की और कहा कि मैं एक ख़तरनाक आतंकवादी हूं. लेकिन वह अड़ी रही. उसने पुलिसवाले से सख़्ती से कहा, “मुझे पता है कि मेरे क्या कर्तव्य हैं.”
इस यातना का असर मेरे मन और शरीर पर अभी भी बना हुआ है, हालांकि उस बात को 27 साल बीत चुके हैं. कड़ाके की ठंड या बरसात में मेरे हाथ-पैर दर्द करते हैं. मानसिक स्वास्थ्य पर इसके और भी बुरे असर होते हैं. मेरा मन अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है. 2012 में रिहा होने के बाद, मनोचिकित्सक डॉ. अचल भगत से मैंने अपना मेरा इलाज करवाया और इससे मुझे मदद मिली. लेकिन कई बार मैं अब भी सोते हुए जाग जाता हूं, चीखता हूं या रहम की भीख मांगता हूं. बुरे सपने मेरा पीछा नहीं छोड़ते. अक्सर, मैं रात भर सो नहीं पाता. ऐसा लगता है जैसे यातना के वे दिन और जेल में बिताए वे 14 साल मुझे कभी नहीं छोड़ेंगे. वे ज़िंदगी भर मेरे साथ साये की तरह रहेंगे.
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जेल में मुझे पता चला कि पुलिस के हाथों थर्ड-डिग्री टॉर्चर झेलने वाला मैं अकेला नहीं था. कई जेल क़ैदियों ने मुझे ऐसी ही कहानियां सुनाईं. मैं अक्सर सोचता हूं कि इन सरकारी अधिकारियों को किस तरह की ट्रेनिंग दी जाती है. वे अपने भीतर की सबसे बुनियादी मानवीय करुणा को कैसे कुचल देते हैं? उनके चेहरे की लकीरों में, उनकी आंखों में ज़रा भी इंसानियत नहीं है. इतने सालों बाद भी, मुझे उन लोगों के चेहरे याद हैं जिन्होंने मुझे प्रताड़ित किया था. अगर आप अवैध हिरासत में हैं, तो चाहे आपकी मौत भी हो जाए, पुलिस को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. वो बस आपकी लाश को एक थैले में डालकर ठिकाने लगा देंगे. मुझे क़ानूनी हिरासत में ज़्यादा सुरक्षा महसूस होती थी.
जेल एक अलग ही दुनिया है, जो ऊंची, मोटी दीवारों और लोहे की सलाखों के पीछे छिपी हुई है. यह एक बहरी और गूंगी दुनिया है. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि भीतर की दुनिया की आवाज़ें, चीखें कभी बाहरी दुनिया तक नहीं पहुंचतीं. और अगर पहुंच भी जाती हैं, तो बाहर कोई ध्यान नहीं देता. वे जेल को एक तरह की वर्जना समझते हैं. अगर अंदर क़ैदियों के साथ कुछ बुरा होता है, तो कोई बात नहीं, ऐसा ही होना चाहिए. क़ैदियों के अधिकारों पर जितना काम यूरोप के देशों में हुआ है, जैसा मैंने सुना है, उससे कहीं कम भारत में हुआ है.
एक रूसी लेखक हैं, मुझे उनका नाम याद नहीं, लेकिन उन्होंने कहा था कि अगर किसी समाज को समझना है, तो उसकी जेलों की व्यवस्था देखिए. हमारी जेलें ग़रीब और अशिक्षित, दलित और आदिवासी लोगों से क्यों भरी हैं?
मैंने जेल में पाया कि क़ैदियों में कई तरह की प्रतिभाएं और क्षमताएं होती हैं. समस्या यह है कि उन्होंने इनका ग़लत इस्तेमाल किया है. लेकिन अगर उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाए, तो इन प्रतिभाओं का इस्तेमाल समाज की भलाई के लिए किया जा सकता है. नेल्सन मंडेला, महात्मा गांधी, नेहरू और जय प्रकाश नारायण को भी जेलों में क़ैद किया गया. जेलों में निर्दोष लोग हैं, और जेल में बंद हर व्यक्ति एक इंसान है जो अपनी रिहाई के बाद एक बेहतर दुनिया बनाने में योगदान दे सकता है.
मेरी परवरिश पुरानी दिल्ली में हुई. बचपन में मेरे हिंदू और सिख दोस्त थे. लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ पता नहीं वे हमारे मोहल्ले से कहां चले गए. यह 1989 के आसपास की बात है, जब आडवाणी जी अपनी रथ यात्रा पर निकले थे और समाज बिखरने लगा था. आज पुरानी दिल्ली में हिंदू और मुसलमान अलग-अलग मोहल्लों में रहते हैं. जैसे-जैसे मैं जवान हुआ, मैं इस देश की ख़ूबसूरती से वंचित होता गया, जहां हर धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के लोग साथ-साथ रहते हैं.
जेल की सबसे अच्छी बात यह थी कि यहां मुझे वह भारत मिला, जिसमें हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिख और नास्तिक, विविध भाषाएं बोलने वाले लोग, विविध जातियों के लोग थे. हम सब साथ खाना खाते, साथ समय बिताते. मैंने दूसरे समुदायों, उनके रहन-सहन और उनकी समस्याओं के बारे में जाना.
जेल में मैंने दर्द के साथ-साथ इंसानियत का भी अनुभव किया. साल 2000 में, जेलर ने मुझे पांच महीने के लिए एकांत कारावास में डाल दिया. मेरी कोठरी के गेट पर एक कंबल लटका दिया गया था ताकि सूरज की रौशनी भी अंदर न आ सके. जेलर ने दूसरे क़ैदियों को सख़्त चेतावनी दी थी कि अगर कोई मुझसे बात करेगा या जेल की कैंटीन से कुछ भी लाकर देगा तो उसे कड़ी सज़ा दी जाएगी. रमज़ान आया और मैंने रोज़ा रखना शुरू कर दिया. दो साथी क़ैदी, बलजीत नाम का एक सिख और करण नाम का एक हिंदू, हर सुबह 6 बजे मेरी कोठरी में आते थे, अपने चेहरे मफ़लर से ढके रहते थे, ताकि कोई उन्हें पहचान न सके. वे रोज़ मेरे रोज़े के लिए मेरी कोठरी में खजूर और दूध का एक पैकेट फेंक जाते थे, और फिर भाग जाते थे. उन्होंने मुझे कभी कुछ नहीं कहा. वे मेरे धर्म के भी नहीं थे, वे मुझे व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते थे, लेकिन मेरे धार्मिक विश्वासों के प्रति उनके मन में इतना सम्मान था कि उन्होंने बहादुरी से सज़ा का जोख़िम उठाया ताकि मैं अपना रोज़ा रख सकूं. मैंने उनसे इंसानियत और साहस के बारे में बहुत कुछ सीखा.
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कुछ मायनों में, आरोपी के परिवार की पीड़ा जेल में बंद व्यक्ति से भी ज़्यादा होती है. जेल में तो शायद वह किसी तरह अपनी स्थिति से समझौता कर ले. कम से कम उसे समय पर खाना तो मिलता है, उसकी एक दिनचर्या तो होती है. लेकिन बाहर जो परिवार है, उसकी पीड़ा अंतहीन है. समाज, पुलिस, मीडिया, सब उनका बहिष्कार करते हैं. जब आप जेल में होते हैं, तो आपके परिवार को रोज़ी-रोटी कमानी पड़ती है. बहुत से लोग आपको नौकरी पर रखने को तैयार नहीं होते. जिस दिन अदालत जाना होता है, उन्हें दिन भर की मज़दूरी से हाथ धोना पड़ा है.
मुझ पर इन अपराधों का आरोप लगने से पहले मेरे पिता को समाज में बहुत सम्मान दिया जाता था. लेकिन अब लोग उनसे कतराने लगे थे. इससे उन्हें बहुत तकलीफ़ होती थी. जब वह अदालत जाते, तो लोग उन्हें एक आतंकवादी का पिता कहकर ताना मारते. वह अपने छोटे-मोटे व्यवसाय पर ध्यान नहीं दे पाते थे. अदालती ख़र्च तथा वकीलों की फ़ीस में हमारी सारी जमा-पूंजी ख़र्च हो जाती थी. मेरी मां के गहने बिक गए, और हमारी जो थोड़ी-बहुत संपत्ति थी, वह भी धीरे-धीरे ख़त्म हो गई.
मेरी गिरफ़्तारी के दो साल बाद मेरे पिता का देहांत हो गया. जेल में मुझे इसकी कोई ख़बर नहीं थी. अगली सुनवाई में वकील ने मुझे बताया कि मेरे पिता का देहांत हो गया है. जज ने मेरे प्रति संवेदना व्यक्त की. उसके बाद अदालत में क्या हुआ, मुझे कुछ भी याद नहीं. मेरे हाथों में हथकड़ी लगी थी. मैं खड़ा था, मगर मेरा शरीर सुन्न पड़ गया था. मैं बेबस और स्तब्ध था. सुनवाई के बाद, मैं जेल के दरवाज़े से होकर अपनी बैरक में वापस गया और लेट गया. मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं एक ज़िंदा लाश जैसा हूं.
सालों बाद, अपनी रिहाई के बाद, मैं कभी-कभी क़ब्रिस्तान जाता हूं. लेकिन मुझे यह भी नहीं पता कि मेरे पिता को किस जगह दफ़नाया गया था. मैं बस एक कोने में खड़ा होकर उनकी याद में प्रार्थना करता हूं.
उनके देहांत के बाद मेरी माँ को मेरा मुक़दमा लड़ने के लिए घर से बाहर निकलना पड़ा. वह निरक्षर थीं, हमेशा अपने घर में परदे में रहती थीं. लेकिन अगले दस सालों तक, उन्होंने अकेले ही अदालत में मेरा मुक़दमा लड़ा. 2010 में, उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ जिससे वे लकवाग्रस्त हो गईं. 2012 में अपनी रिहाई के बाद, मैंने उसे जिस अवस्था में पाया, उसे ज़िंदा लाश से ज़्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता.
जब मैं 2012 में जेल से बाहर आया, तब सिर्फ़ 14 साल ही नहीं हुए थे, बल्कि एक सदी बदल चुकी थी. एक क़ैदी जो कई साल जेल में बिताता है, उसकी उम्र तो बढ़ जाती है, लेकिन वह उसी समय में अटका रहता है जब उसे जेल में लाया गया था. जब वह आख़िरकार जेल से बाहर आता है, तो वह वहीं से शुरू करने की कोशिश करता है, जेल जाने से पहले जहां सब कुछ छोड़ा था. लेकिन यह नामुमकिन है. मैं तब जेल गया था जब मेरे माता-पिता ज़िंदा और स्वस्थ थे, समाज में उनका सम्मान था, और हमारा एक अच्छा घर था. जब मैं रिहा हुआ, तो ये सब कुछ नहीं था. मुझे माइनस ज़ीरो से ज़िंदगी फिर से शुरू करनी पड़ी. और हां, तकनीक भी. 1998 में जब मेरा अपहरण हुआ था, तब न मोबाइल फ़ोन थे, न मेट्रो, न पीवीआर सिनेमा, न प्लास्टिक मनी (एटीएम और क्रेडिट कार्ड), न ईमेल, न शॉपिंग मॉल. मुझे यह सब सीखने में काफ़ी समय लगा. मैं अभी भी सीख रहा हूं.
जब लोग किसी के जेल से रिहा होने की ख़बर सुनते हैं, तो उन्हें लगता है कि अब उसकी समस्याएं सुलझ जाएंगी. बेशक, आज़ादी एक बड़ा वरदान है. लेकिन अभी भी कई चुनौतियां बाक़ी हैं. समाज उसके साथ कैसा व्यवहार करेगा? क्या उसे अपने समुदाय में वही सम्मान और स्थान मिलेगा जो जेल जाने से पहले मिलता था? क्या उसे नौकरी मिलेगी, और अगर मिलेगी भी तो कैसी? क्या पुलिस उसे परेशान करती रहेगी? क्या उसे अब भी आतंकवादी कहकर चिढ़ाया जाएगा?
इसके अलावा, एक व्यक्ति जेल में इतने लंबे साल बिताता है, जिस अंतराल में वह ख़ुद को शिक्षित कर सकता था, कोई हुनर सीख सकता था, कोई व्यवसाय शुरू कर सकता था, कोई नौकरी कर सकता था. इन सब से वंचित होकर, राज्य के मज़बूत समर्थन के बिना उसके लिए ज़िंदगी फिर से शुरू करना बहुत मुश्किल होता है. राज्य ने मेरे लिए इनमें से कुछ भी नहीं किया, मगर मैं इसलिए बच गया क्योंकि दिल्ली के नागरिक समाज के वरिष्ठ लोगों ने मेरे लिए वही किया जो राज्य को करना चाहिए था.
आत्मसमर्पण करने वाले उग्रवादियों के लिए राज्य की एक पुनर्वास नीति है. ये वे लोग हैं जो स्वीकार करते हैं कि उन्होंने आतंकवादी हमलों में भाग लिया था, और अब इस जीवन से मुंह मोड़ रहे हैं. मैं इस नीति का समर्थन करता हूं. लेकिन उन लोगों का क्या जिन्होंने कोई आतंकवादी अपराध नहीं किया है, फिर भी यातनाएं झेल रहे हैं, जेल की सज़ा भुगत रहे हैं, उनके परिवार बाहर बर्बाद हो रहे हैं? इन लोगों के पुनर्वास के लिए कोई नीति क्यों नहीं है?
हमारे लिए यह बातचीत ज़रूरी है. ज़्यादातर लोग नहीं जानते; उन्हें हमारी दुर्दशा की परवाह नहीं है. जब हमें गिरफ़्तार किया जाता है और आतंकवादी अपराधों के आरोप लगाए जाते हैं, तो मीडिया सनसनी फैला देता है. जब हम निर्दोष साबित होते हैं, तो बहुत कम कवरेज होता है. लोग इसे छोटी बात समझते हैं और अपनी अंतरात्मा और चेतना से इसे अनदेखा कर देते हैं. लेकिन निर्दोष होते हुए भी 14 या 19 साल जेल में बिताना कोई छोटी बात नहीं है. इससे देश की अंतरात्मा कांप जानी चाहिए.
अब्दुल वाहिद शेख़
11 जुलाई, 2006 को मुंबई ट्रेन बम धमाकों के तुरंत बाद मुझे गिरफ़्तार नहीं किया गया था. वे आतंकी धमाके बहुत ही भयावह थे. व्यस्त समय में सात अलग-अलग लोकल ट्रेनों के भीड़-भाड़ वाले डिब्बों में, सात मिनट के अंतराल में बम विस्फोट हुए. 200 से ज़्यादा लोग मारे गए और 700 से ज़्यादा घायल हुए.
ट्रेन में हुए आतंकी धमाकों के इसी अपराध के लिए हममें से 13 लोगों पर आरोप लगाए गए, प्रताड़ित किया गया और जेल में डाल दिया गया. हममें से एक की जेल में मौत हो गई, मैं 9 साल बाद रिहा हुआ, बाक़ी 12 अब 2025 में बरी हुए. 19 साल बाद वे जेल से बाहर आए. पांच लोग दस साल से मौत की सज़ा काट रहे थे. अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुनाया है कि हम सभी निर्दोष हैं.
ट्रेन धमाकों के तुरंत बाद मेरी औपचारिक गिरफ़्तारी नहीं हुई थी. तीन महीने बाद, सितंबर में मुझे गिरफ़्तार किया गया. मेरे ख़िलाफ़ 2001 में सिमी आतंकवाद का एक पुराना मामला दर्ज था, जो झूठा साबित हुआ और मुझे बरी कर दिया गया. पुलिस ने इसका और इस तरह के अन्य मामलों का इस्तेमाल करके हम सभी 13 लोगों पर आरोप लगाए.
हम पर इस आतंकी अपराध का आरोप क्यों लगाया गया? हम सब मुसलमान थे, हम सब भारतीय थे, हम सब संविधान में आस्था रखने वाले लोग थे। बॉम्बे आतंकी धमाकों का आरोप लगने से पहले, हम सब अलग-अलग तरीक़े से अपनी आजीविका की व्यवस्था कर रहे थे. मैं एक शिक्षक था, एक अस्पताल में काम करता था, एक खाने-पीने और सब्ज़ियों का व्यवसाय करता था, एक मोबाइल रिपेयर की दुकान चलाता था. (यह आदमी, जो मोबाइल रिपेयर करता था, आज 19 साल बाद एंड्रॉइड मोबाइल चलाना नहीं जानता. वह मुझसे पूछता है, मैं व्हाट्सएप मैसेज या ईमेल मैसेज कैसे भेजूं). हममें से ज़्यादातर शादीशुदा और बाल बच्चे वाले थे.
हमारी औपचारिक गिरफ़्तारी से तीन महीने पहले, पुलिस हमें बुलाती थी, और कभी-कभी कई दिनों तक हमें अवैध रूप से हिरासत में रखती थी. हर बार वे हमें पीटते थे. पुलिस ने हमें और हमारे परिवारों को चेतावनी दी थी – मीडिया या अदालतों में शिकायत मत करना. सबसे दूर रहो. अगर तुम इन नियमों को तोड़ोगे, तो हम तुम पर इस ट्रेन ब्लास्ट के आतंकी अपराध का आरोप लगा देंगे. इन धमकियों के कारण, हम चुप रहे, और हमारे परिवार भी चुप रहे. हमने अपना दिल बड़ा रखा, और जांच में सहयोग करने का संकल्प लिया. हमने पुलिस द्वारा अपनी अवैध हिरासत और पिटाई को स्वीकार किया और सहन किया. जब पुलिस को सच्चाई पता चलेगी, तो वे हमें रिहा कर देंगे, और हमारी पीड़ा समाप्त हो जाएगी. हमारा विश्वास अब भी क़ायम था.
लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हालांकि जांच के बाद पुलिस जानती थी कि हम निर्दोष हैं, फिर भी जब असली अपराधी नहीं मिले, तो उन्होंने हम पर ही आतंकी अपराध का आरोप लगा दिया. सच तो यह है कि पुलिस असली अपराधियों को पकड़ने में नाकाम रही है. न तब, न अब, 19 साल बाद भी. इसलिए उन्होंने सोचा चलो इन लोगों को इस अपराध में फंसा देते हैं. सिमी मामले में उनके ऊपर पहले ही आतंकी अपराध का आरोप लगा है (भले ही वे निर्दोष पाए गए हों). वे धर्म को मानने वाले मुसलमान हैं. वे दाढ़ी रखते हैं और टोपी पहनते हैं. हम उन्हें ट्रेन में हुए भीषण बम धमाकों के दोषी के रूप में पेश करेंगे. मीडिया ख़ुश होगा, धमाकों में मारे गए लोगों के परिवार संतुष्ट होंगे, जनता का तुष्टीकरण होगा. उन्होंने घोषणा की कि हम लश्कर-ए-तैयबा, आईएसआई, अल-क़ायदा से जुड़े हैं. वे यह कहते हुए अल-क़ायदा की नियमावली को बार-बार दिखाते रहे कि इसमें दोषियों को यह सिखाया जाता है कि वे पुलिस पर उन्हें प्रताड़ित करने का झूठा आरोप लगाएं.
दो चरणों में हमें यातनाएं दी गईं. पहला चरण हमारी अवैध हिरासत के दौरान था. मैंने आपको बताया था कि यह तीन महीनों तक रुक-रुककर चलता रहा, इस दौरान हमारे साथ मारपीट की गई. फिर शुरू हुई हमारी क़ानूनी पुलिस हिरासत. पुलिस ने बड़ी चालाकी से पहले सात ट्रेनों में हुए हर बम विस्फोट के लिए सात अलग-अलग एफ़आईआर दर्ज की. मजिस्ट्रेट को बताया गया कि कोई बड़ी साज़िश नहीं थी, मानो अलग-अलग समूहों ने सात ट्रेनों में हुए सातों विस्फोटों को स्वतंत्र रूप से अंजाम दिया हो. इसलिए, हर एफ़आईआर के लिए उन्होंने 15 दिन की पुलिस हिरासत की मांग की. जब 15 दिन पूरे हो जाते, तो वे अगली एफ़आईआर के लिए फिर से पुलिस हिरासत की मांग करते. यह सात एफ़आईआर तक चलता रहा. जब सभी सात एफ़आईआर पूरे हो गए, तो पुलिस ने दावा किया कि उन्होंने सभी सातों ट्रेन विस्फोटों से जुड़ी एक बड़ी आतंकी साज़िश का पता लगा लिया है. अब मामला महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के कठोर क़ानून के तहत लाया गया, और मजिस्ट्रेट ने 30 दिन की और पुलिस रिमांड दे दी. इस तरह हमें 80 से 90 दिन की पुलिस रिमांड में रहना पड़ा.
मैं अक्सर सोचता हूं कि पुलिस के पास यातना देने का कोई अलग ही तरीक़ा होगा. वे इतनी क्रूरता से पेश आते हैं कि ज़रा भी दया नहीं दिखाते. दर्द और पीड़ा के लिए सूर्य प्रकाश नाम का एक औषधीय तेल होता है. वे इसे हमारे गुदा में इंजेक्ट करते हैं. नतीजा यह होता है कि पूरे शरीर में भयानक जलन फैल जाती है. आप दर्द से उछलने लगते हैं. पुलिस आपको शौचालय जाने के लिए कहती है. लेकिन जब आप पानी से धोते हैं, तो दर्द और भी असहनीय हो जाता है. वे आपके गुप्तांगों और निप्पलों पर बिजली के झटके देते हैं. वे आपके पैरों को 180 डिग्री पर फैला देते हैं, जिससे आपके लिंग से ख़ून बहने लगता है.
पुलिस वाटर-बोर्डिंग का भी सहारा लेती है. इसके लिए, वे आपको उल्टा लटका देते हैं, आपके चेहरे को कपड़े से ढक देते हैं, और फिर आपके नथुनों में पानी डाल देते हैं. आपका गला रुंध जाता है और आपको लगता है कि आप डूब रहे हैं. आप इतने हताश हो जाते हैं कि पुलिस से विनती करते हैं – मुझे कोई भी काग़ज़ दस्तख़त करने के लिए दे दो, मैं दस्तख़त कर दूंगा, लेकिन मुझे बख़्श दो.
कमरे को अंधेरा रखा जाता है. कभी आपकी आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है, कभी नहीं. कभी-कभी तापमान बहुत कम हो जाता है; बर्फ़ जैसे ठंडे कमरे में आप नंगे होते हैं, इसलिए कांपते रहते हैं. यातना कक्ष ध्वनिरोधी होता है. एटीएस कार्यालय भीड़-भाड़ वाली बस्ती के बीच में स्थित है, लेकिन आप चाहे कितनी भी ज़ोर से चीखें, बाहर कोई आपकी आवाज़ नहीं सुन सकता.
बात यहीं ख़त्म नहीं हुई. वे हमें अपने साथियों पर अत्याचार होते देखने के लिए मजबूर करते हैं. अगर आप आंखें बंद कर लें या मुंह फेर लें, तो वे आपको पीटते हैं और देखने के लिए मजबूर करते हैं. इससे हमारा हौसला टूटने लगता है.
हमारे परिवार के सदस्यों के साथ उन्होंने जो किया, वह और भी ज़्यादा नुक़सानदेह था. मिसाल के तौर पर, हम आरोपियों के समूह में दो भाई हैं. पुलिस उनके पिता को ले आई, उन्हें नंगा करके भाइयों के सामने घुमाया. फिर उन्होंने भाइयों को नंगा कर दिया और उनके पिता को उन्हें नंगा घूमते देखने पर मजबूर किया. अगर उनमें से कोई अपने गुप्तांग ढकने की कोशिश करता, तो वे उसे डंडों से पीटते. फ़ैसल अपने पिता का यह अपमान बर्दाश्त नहीं कर सका. उसने पुलिस से विनती की, मुझे कोई भी काग़ज़ दे दो, मैं उस पर दस्तख़त कर दूंगा. अगर आप चाहते हैं कि मैं अमेरिका में हुए 9/11 हमले की बात क़बूल कर लूं, तो मैं यह भी करने को तैयार हूं. मेरी बस एक ही विनती है, मेरे पिता को फिर से अपने कपड़े पहनने दो.
फिर उन्होंने उनकी भाभी को बुलाया और उसका घूंघट फाड़ दिया. वे आरोपियों की माताओं, पत्नियों और बहनों को बुलाकर उनका बलात्कार करने की धमकी देते.
जब कोई व्यक्ति निशाना बनता है, तो वह बहुत सारी यातनाएं झेल सकता है. लेकिन जब उसके परिवार को उसके सामने अपमानित किया जाता है, तो वह टूट जाता है.
पुलिस हमें कहती थी कि अगर तुम्हें इस यातना से मुक्ति चाहिए, तो तुम्हें हमारे दिए गए काग़ज़ों पर हस्ताक्षर करने होंगे. काग़ज़ों को पढ़े बिना ही, तुम्हें हस्ताक्षर करने होंगे.
क़ानून आपकी रक्षा के लिए होता है क्योंकि डीके बसु निर्णय के मामले में पुलिस को हर 48 घंटे में मेडिकल जांच के लिए हमें डॉक्टर के पास ले जाना ज़रूरी था. उन्होंने काग़ज़ी तौर पर इसका पालन किया. हमें कई अस्पतालों में ले जाया गया. लेकिन हर बार, मेडिकल रिपोर्ट पूरी तरह से फ़र्ज़ी होती थी. बॉम्बे हाई कोर्ट ने मामले को ख़ारिज करते हुए ठीक यही बात कही थी.
किसी ने मुझसे कहा था कि पुलिस जांच में यातना ज़रूरी है, क्योंकि बिना यातना के आरोपी अपने अपराध स्वीकार नहीं करेंगे. मेरा जवाब था – ठीक है, अगर ऐसा है, तो क़ानून में एक प्रावधान पारित कीजिए कि आपराधिक जांच में यातना ज़रूरी हो. इस विधेयक को संसद में ले जाइए, मान लीजिए कि पुलिस आपराधिक जांच के लिए यातना का इस्तेमाल करती है, और संसद में इसे सही ठहराइए. मगर इसके विपरीत, आज तक, पुलिस इस बात से इनकार करती रही है कि उसने हममें से किसी को भी यातना दी है.
80 या 90 दिनों की पुलिस हिरासत में हमने जो यातनाएं झेलीं, वह इतनी पीड़ादायक थीं कि जब हमें आख़िरकार जेल भेजा गया, तो हमें बहुत राहत मिली. एक सुकून सा लगा. यातना के वे दिन ज़िंदगी भर हमारे साथ रहेंगे. सर्दियों में भी हमारे हाथ-पैर दर्द करते हैं. मेरी आंखों की रौशनी कम होती जा रही है. गहरी नींद में भी मुझे यातनाओं के बुरे सपने आते हैं. अगर आधी रात के बाद कोई हमारे दरवाज़े पर दस्तक देता है, तो मेरी पत्नी और बच्चे हमेशा घबरा जाते हैं कि पुलिस मुझे लेने आ गई है.
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हमारे लिए, जेल में सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक थी जेल में रहते हुए हमारे अपनों की मौत. मेरे जेल जाने के एक साल बाद मेरे पिता का निधन हो गया. मुझे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि मेरे पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं. हम ऐसी कोई मशहूर हस्तियां नहीं हैं कि यह ख़बर अख़बारों में छप जाए. यह ख़बर देने की ज़िम्मेदारी परिवार के सदस्यों पर छोड़ दी गई. मेरी माँ, मेरी पत्नी और मेरी बहन मुलाक़ात के लिए आईं (उन दिनों फ़ोन कॉल की कोई व्यवस्था नहीं थी)। वे परेशान थीं कि मुझे यह ख़बर कैसे बताएं, क्योंकि मैं पहले से ही बहुत परेशान था.
तो क्या हुआ? जब वे मुलाक़ात के लिए आईं, तो चुप रहीं, इधर-उधर देखा और फिर रोने लगीं. मुझे एहसास हुआ कि कुछ तो गड़बड़ है, लेकिन मुझे नहीं पता कि क्या हुआ है. मैं उनसे विनती करता हूं कि वे मुझे बताएं. मुलाक़ात के लिए सिर्फ़ 20 मिनट का समय था. ये चंद मिनट जल्दी बीत गए. आख़िरकार, जब मुलाक़ात ख़त्म होने में बस एक मिनट बचा होता है, तो वे कहते हैं, “चिंता मत करो, कोई तनाव मत लो. लेकिन अब्बू अब हमारे बीच नहीं रहे.”
मेरा दुःख और नुक़सान मेरी सहनशक्ति से परे है क्योंकि मैं अपने पिता के अंतिम समय में उनके साथ नहीं रह सका, मैं उनके इलाज की व्यवस्था नहीं कर सका, मैं अपनी माँ और बहनों को सांत्वना देने के लिए मौजूद नहीं था.
सिर्फ़ मैं ही नहीं. हम तेरह लोगों में से हर किसी ने जेल में रहते हुए अपने प्रियजनों को खोया. किसी ने अपने पिता को खोया, किसी ने अपनी माँ को, किसी ने अपने माता-पिता दोनों को, किसी ने अपनी पत्नी को, किसी ने अपने भाई को, वग़ैरह-वग़ैरह. हम सभी ने एक ही दुःख झेला. एक जेलर ने हमसे कहा, “हम भी अपने प्रियजनों को वैसे ही खोते हैं जैसे तुम खोते हो. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि जब वे इस दुनिया से जाते हैं तो हम उनके पास होते हैं. लेकिन तुम बहुत दूर होते हो.” यह हमारी सबसे कठोर सज़ा है.
हममें से जिन पर राष्ट्र-द्रोह और आतंकवाद से ज़ुड़ी हत्याओं के आरोप लगाए गए थे, उनके प्रति जेल कर्मचारियों और क़ैदियों के एक वर्ग का रवैया दुश्मनी और भेदभाव पर आधारित होता, मानो हम इस धरती के इंसान ही न हों. लेकिन दूसरी ओर, कम से कम हमें कहीं रहने की जगह तो थी, खाना मिलता था, सोने के लिए गद्दा था, एक दिनचर्या थी. हम अपनी स्थिति को स्वीकार करने की कोशिश करते थे; हम ख़ुद से तर्क करते थे कि हमें इसलिए तकलीफ़ हो रही है क्योंकि हम पर इतने गंभीर अपराध का आरोप लगाया गया था. हालांकि, हमारे परिवारों पर अपराध का कोई आरोप भी नहीं लगाया गया था, सिवाय इसके कि वे हमसे जुड़े थे.
मुझे लगता है कि हमारे परिवारों ने जो सज़ा झेली, वह हमसे कहीं ज़्यादा कठोर थी. जेल की ऊंची दीवारों के पीछे हमारी एक दिनचर्या थी, एक ख़ास समय पर जगना, एक ख़ास समय पर खाना, वग़ैरह. लेकिन उन्हें बाहर की दुश्मनी से भरी दुनिया का अकेले ही सामना करना पड़ता था – रिश्तेदार, मीडिया, पुलिस. और उन्हें इन सबके बीच गुज़ारा करना था. उनका एकमात्र कमाने वाला सदस्य जेल में है. बच्चों की स्कूल फ़ीस भरनी है. बहनों की शादी करनी है. माता-पिता को दवाइयों की ज़रूरत है. कितनी सारी ज़रूरतें हैं. कई बच्चे स्कूल जाना छोड़ देते हैं. माता-पिता ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी दवाइयां नहीं ख़रीद पाते. रिश्तेदार रिश्ते तोड़ लेते हैं, दोस्त मुंह मोड़ लेते हैं. हमारे रिश्तेदार हमसे दूरी बना लेते हैं, इसलिए नहीं कि उन्हें लगता है कि हम आतंकवाद संबंधी अपराधों के दोषी हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें डर है कि जिस एटीएस ने हमें आतंकवादी अपराध का आरोपी बनाया था, उसका प्रकोप उन्हें न झेलना पड़े.
मेरी पत्नी परदे में रहती थी, लेकिन मेरे जेल में होने के कारण, उसे घर से बाहर निकलकर काम करना पड़ा. उसके दोनों बच्चे उसका ही दूध पीते थे, लेकिन चूंकि उसे बाहर काम करना पड़ता था, इसलिए उन्हें बोतल से दूध पिलाना पड़ा. ऐसी ही कई छोटी-छोटी बातें हमारे परिवारों ने झेलीं, लेकिन इनमें से एक भी बात किसी किताब में लिखने लायक़ नहीं मानी जाएगी.
उस पत्नी के बारे में सोचिए जो अपने पति के लौटने का 19 साल तक इंतज़ार करती है. वह उसे तलाक़ देकर दोबारा शादी नहीं करती. वह इस उम्मीद में डटी रहती है कि एक दिन उसका पति रिहा हो जाएगा, क्योंकि वह जानती है कि वह निर्दोष है. उस बेटी के बारे में सोचिए जो अपने पिता के जेल जाने के बाद पैदा हुई. उसने कभी अपने पिता का चेहरा नहीं देखा, और न ही पिता ने उसका चेहरा देखा. आम दिनों में, वह पढ़ाई करके डॉक्टर या इंजीनियर बन सकती थी. लेकिन उसके पिता के जेल में होने के कारण, यह सब संभव नहीं था.
***
जब आपको पहली बार न्यायिक हिरासत में भेजा जाता है, तो आपको लगता है कि आप 14 दिन जेल में रहेंगे, क्योंकि हिरासत की अवधि यही होती है। और ये 14 दिन 14 साल में बदल जाते हैं. यह एक तरह का धीमा ज़हर है जो आपको पिलाया जाता है.
हमारे मामले में उन पांच लोगों के बारे में सोचिए जिन्हें निचली अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई थी. इस आदेश के ख़िलाफ़ अपील का निपटारा होने में दस साल लग गया. कल्पना कीजिए, दस साल तक उन्हें अपने मौत के डर के बीच जीने के लिए मजबूर किया गया. हर गुज़रता दिन उन्हें फांसी के फंदे के और क़रीब ला देता था. मैंने कहा कि उन्हें दस साल तक इसी तरह जीने के लिए मजबूर किया गया. मुझे कहना चाहिए था, उन्हें दस साल तक हर दिन इसी तरह मरने के लिए मजबूर किया गया. हर दिन आप इस डर से जूझते हैं कि कब ख़बर आएगी कि अपील ख़ारिज हो गई और आपको फांसी के तख़्ते पर चढ़ा दिया जाएगा. आपको फांसी के कमरे के बग़ल में रखा जाता है. हर दिन, फांसी के तख़्ते पर तेल लगाया जाता है, और आप उसकी आवाज़ सुन सकते हैं. और आप सोचते हैं, ये फांसी का तख़्ता मेरे लिए तैयार किया जा रहा है. यही वो धीमा ज़हर है जिसकी मैं बात कर रहा हूं.
मैं बॉम्बे हाई कोर्ट के उन दो जजों को सलाम करता हूं. उनमें यह साहस, हिम्मत, दूरदर्शिता और विवेक था कि वे बहुत से झूठ के बीच एक सच बोल सकें. अगर उनमें यह साहस न होता, तो ये लोग फांसी पर चढ़ जाते. हालांकि वे निर्दोष थे, और अब भी निर्दोष हैं.
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19 साल बाद आप जेल से रिहा हुए हैं. दुनिया पूरी तरह बदल गई है. मैं साजिद अंसारी के साथ फ़्लाइट में सफ़र कर रहा था, जो हाल ही में रिहा हुए लोगों में से एक है. वह अपने परिवार से मिलने दिल्ली आया था. उसने मुझसे कहा, “मैं 19 साल बाद हवाई जहाज़ में सफ़र कर रहा हूं.” मैंने उससे पूछा, “19 साल पहले तुम हवाई जहाज़ से कैसे सफ़र करते थे?” उसने बताया कि एटीएस ही उसे नार्को टेस्ट के लिए बेंगलुरु ले गई थी.
हवाई अड्डे पर हर मोड़ पर वह असमंजस में था. सब कुछ बदल गया था. वह एस्केलेटर पर चढ़ नहीं पा रहा था. हमें एक साथ कई काम करने की आदत होती है – कॉफ़ी पीना, फ़ोन पर बात करना, चेक-इन के लिए लाइन में लगना, वग़ैरह. जेल में आप एक समय में एक ही काम करते हैं. साजिद ने कहा, “मुझे चक्कर आ रहा है.”
राज्य को क्या करना चाहिए? बरी होने और रिहाई के आदेश के 24 घंटे के भीतर ही महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील लेकर पहुंच गई. नागरिकों के एक वर्ग के प्रति इस प्रकार की शत्रुता शर्मनाक है.
सबसे पहले, पुलिस को इस बात का भय होना चाहिए के उन्हें भी उनके कुकृत्य की सज़ा मिलेगी. जब हमें प्रताड़ित किया गया, तो पुलिस को पूरा भरोसा था कि उन्हें कोई नुक़सान नहीं पहुंचेगा. उन्हें गृह मंत्रालय और सरकार का संरक्षण प्राप्त था. अगर कोई यातना की वजह से मर भी जाता, तो उसे यातना को “मुठभेड़” में बदलने में उन्हें ज़रा भी देर नहीं लगती (यह दावा करते हुए कि पुलिस को आत्मरक्षा में उसे मारना पड़ा क्योंकि उसने पुलिसकर्मियों को मारने की कोशिश की थी).
अब बात करते हैं उन निर्दोषों के मुआवज़े की, जिन्होंने लंबे साल जेल में बिताए. लोग हमें अदालत जाने की सलाह देते हैं. मुझे यह समझ नहीं आता. जब हम पर आरोप लगे, तो हमें अपना बचाव करने के लिए वकील ढूंढ़ना पड़ा. जब हम निर्दोष हैं, तब भी हमें मुआवज़ा पाने के लिए अदालत जाने के लिए वकील ढूंढ़ना पड़ता है. क्या हमारे प्रति समाज का कोई दायित्व नहीं है? क्या सरकार की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है? संसद को अनिवार्य मुआवज़े के लिए एक क़ानून लाना चाहिए.
साजिद ने मुझसे कहा – पूरी दुनिया में कौन सा मुआवज़ा उन 19 सालों की भरपाई कर सकता है जो हमने जेल में बिताए? हिसाब लगाओ – मेरी ज़िंदगी, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, सब मुझसे छीन लिए गए. मेरी जवानी, क्या तुम मेरी जवानी लौटा सकते हो? इस सबकी क़ीमत क्या है?
मैंने साजिद से कहा – एक निर्दोष व्यक्ति को 19 साल जेल में बिताने के लिए कम से कम 19 करोड़ रुपये का मुआवज़ा मिलना चाहिए.
साजिद ने कहा, नहीं, यह भी काफ़ी नहीं है.
“मैं जो मुआवज़ा चाहता हूं वह यह है कि भविष्य में किसी निर्दोष व्यक्ति को मेरी तरह फंसाया न जाए. किसी निर्दोष व्यक्ति को मेरी तरह जेल में समय न बिताना पड़े. बस यही मुआवज़ा है जो मैं चाहता हूं.”
शोध सहयोग के लिए मैं रुबील सैयद हैदर ज़ैदी का आभारी हूँ
(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’नामक संस्था से जुड़े हैं.)
[1] N. Haksar, & M. A. Khan. (2016). “Framed as a terrorist”: My story of injustice and hope. Speaking Tiger.
[2] Indian Express. (2021, March 7). 19 years after ‘SIMI link’ charge over Surat meet, 127 acquitted. The Indian Express. https://indianexpress.com/article/india/surat-meet-simi-link-acquitted-7217522/
[3] Kuchay, B. (2019, March 15). The Maharashtra Muslims acquitted of ‘terrorism’ after 25 years. Al Jazeera. https://www.aljazeera.com/features/2019/3/15/the-maharashtra-muslims-acquitted-of-terrorism-after-25-years
[4] Chattopadhyay, S. S. (2019). Rampur CRPF camp attack case: Acquittal and after. Frontline. https://frontline.thehindu.com/the-nation/article30025252.ece
[5] BBC News. (2016, May 30). India man struggles with freedom 23 years after ‘wrong’ conviction. BBC. https://www.bbc.com/news/world-asia-india-36431935
[6] Mustafa, S. (2017, February 4). Gujarat tiffin blast acquittals after 14 years: Anyone accountable? Newsclick. https://www.newsclick.in/gujarat-tiffin-blast-acquittals-after-14-years-anyone-accountable
[7] Indian Express. (2017, February 17). 12 years after Delhi serial blasts, 2 accused freed since prosecution ‘miserably failed’. The Indian Express.https://indianexpress.com/article/cities/delhi/2005-delhi-serial-blasts-two-freed-for-lack-of-evidence-4528665/#:~:text=ALMOST%2012%20years%20after%20the,failed%E2%80%9D%20to%20prove%20their%20guilt.
[8] Frontline. (2014, May 28). Accused acquitted. Frontline. https://frontline.thehindu.com/the-nation/accused-acquitted/article6052522.ece?utm
[9] The Wire Staff. (2016, November 11). Malegaon blast case: Special court acquits all accused, criticizes police. The Wire. https://thewire.in/rights/malegaon-blast-case-special-court-acquits-all-accused-criticises-police
[10] The Indian Express. (2015, October 15). Five acquitted in HuJI terror case after 8 years in jail. The Indian Express. https://indianexpress.com/article/india/india-news-india/five-acquitted-in-huji-terror-case-after-8-years-in-jail/
[11] The Hindu. (2014, February 7). Mecca Masjid blast accused acquitted after 7 years in jail. The Hindu. https://www.thehindu.com/news/cities/Hyderabad/mecca-masjid-blast-accused-acquitted-after-7-years-in-jail/article5663834.ece
