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शानदार, ज़बरदस्त, जिंदाबाद…

Siraj Mahi for BeyondHeadlines

‘मांझी -दि माउंटेन मैन’ उन युवाओं में साहस भर देने वाली फिल्म है, जो अपनी स्थिति के साथ समझौता कर लेते हैं. जो लोग कुछ करने के लिए आगे बढ़ रहे होते हैं और ठोकर लगने के बाद अपने मक़सद से भटक जाते हैं.

यह फिल्म मांझी नामक एक व्यक्ति की सच्ची कहानी पर बनी है. जिसके किरदार को नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने बखूबी निभाया है. शाहजहां ने अपनी पत्नि मुम्ताज़ के मरने के बाद उनकी याद में ताजमहल बनवाया था तो मांझी ने अपनी पत्नी के मरने के बाद उनकी याद में  22 सालों में पहाड़ चीर कर गहलोर (मांझी का गांव) से वजीर गंज (जहां अस्पताल था) जाने का रास्ता आसान कर दिया. जिससे गांव वालों को भी शहर की सुविधाएं मिल रही हैं.

गरीबी के कारण मांझी (नवाजुद्दीन) को बचपन में ही घर छोड़कर शहर जाना पड़ता है.  शहर से वापस आते हुए वह सुनता है कि सरकार ने सबके लिए समानता का कानून पास कर दिया है. इसलिए वह गांव आते हुए रास्ते में मुखिया जो ऊंची जाति का  है उससे मिलने चला जाता है.

हालचाल पूछते-पूछते वह मुखिया के गले लग जाता है. मुखिया के पूछने पर कि तुम कौन हो? मांझी उसे याद दिलाता है कि वह वही नीची जाति वाला लड़का है जो गांव में खेला करता था. ऊंची जाति वालों को तूने हाथ कैसे लगाया… यह कहकर मुखिया के चेले मांझी की धुनाई कर देते हैं.

घर जाकर वह अपने पिता के साथ अपनी पत्नी फगुनिया (राधिका आप्टे) को घर लाना चाहता है, जिसके साथ बचपन में मांझी का विवाह हो गया था. लेकिन उसके पिता उसे विदा करने के लिए राजी नहीं होते. वजह वही गरीबी… कि लड़का कुछ कमाता नहीं तो लड़की को खिलाएग क्या? मांझी अपनी खूबसरत पत्नी को देखकर खुश हो जाता है. मना करने के बावजूद वह अपनी पत्नी से चोरी-चोरी मिलता रहता है उसके साथ मेले में घूमता है और एक दिन उसे भगा ले जाता है.

मांझी की शादीशुदा जिंदगी अच्छी चल रही होती है. एक दिन मांझी काम पर गया होता है. उसके लिए फगुनिया खाना बनाकर ले जा रही होती है. तभी पहाड़ चढ़ते समय उसका पैर फिसल जाता है. और वह नीचे गिर जाती है. उसे गंभीर चोटें आती हैं. फगुनिया को अस्पताल ले जाते हुए पहाड़ चढ़ने की वजह से देर हो जाती है. पहाड़ के इस तरफ़ गहलोर मांझी का गांव होता है और पहाड़े के दूसरी तरफ वजीरगंज होता है जहां अस्पताल है. अस्पताल पहुंचते-पहुंचते फगुनिया मर जाती है. गुस्से और निराशा में मांझी पहाड़ से बात करता है कि तुझे बहुत घमंड है, भ्रम है ये तेरा! एक दिन तुझे तोड़ दूंगा!

मांझी अपने गांव वासियों के लिए गांव से वजीरगंज की दूरी कम करने के लिए पहाड़ काट कर रास्ता बनाने की ठान लेता है. दूसरे दिन वह बकरी बेच कर छेनी-हथौड़ी लेकर आता है और पहाड़ तोड़ने में लग जाता है. उसके जुनून को देखकर उसके पिता उसे पागल कहते हैं. मोहल्ले के लड़के भी उसे पागल समझ कर उस पर पत्थर मारते हैं. लेकिन वह अपने काम में लगा रहता है. आखिरकार वह 22 सालों बाद अपने मक़सद में कामयाब हो जाता है. गांव वाले भी उसकी मेहनत देखकर काफी खुश होते हैं.

उसके बारे में एक स्थानीय पत्रकार सुनता है. वह उससे इन्टरव्यू की निस्बत से बात करने चला आता है. एक दिन भावुक होकर वह अपना दुखड़ा रोने लगता है. वह कहता है कि सच्चा पत्रकार बनना चाहता था, लेकिन नेताओं का दल्ला बनकर रह गया हूं. इस पर मांझी कहते है कि अपना अखबार क्यूं नहीं निकाल देते. पत्रकार जवाब देता है कि इतना आसान नहीं है अखबार निकालना… मांझी फिर कहते हैं तो क्या पहाड़ तोड़ने से ज्यादा मुश्किल है.

इस फिल्म में तत्कालीन दलितों की स्थिति का बेहतरीन नक्शा खींचा गया है. दलितों को किसी भी मंदिर में जाने की स्वतंत्रता नहीं थी. किसी ऊंची जाति के व्यक्ति को छूने की मनाही थी. इसको अच्छे अंदाज़ में दिखाया गया है. एक दृश्य में एक नीची जाति का आदमी मुखिया (तिगमांशू) के सामने जूते पहन कर निकल जाता है. इसपर उस नीची जाति के पैर में मुखिया नाल ठोंकवा देता है.

फिल्म में बार-बार पहाड़ को दिखाकर, मांझी की बुरी हालत को बार-बार दिखा कर फिल्म को बेवजह खींचा गया है. मार-धाड़ देखने वाले युवाओं को फिल्म कम पसंद आएगी. हालाकि फिल्म में लव स्टोरी को बेहतर तरीके से दर्शाया गया है. फिल्म में कई जगह कॉमेडी भी है. फिल्म देखने के बाद एक डायलॉग तो ज़बान पर चढ़ ही जाएगा. शानदार, ज़बरदस्त, जिंदाबाद…

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