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औवैसी की क़यादत: जज़्बात और खदशात

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published August 24, 2015 17 Views
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5 Min Read
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By Shams Tabrej

हिन्दुस्थान के हर ज़ात और मज़हब के लोगों ने अपने अपने रहनुमा चुन लिए, लेकिन आज़ादी के 68 साल बाद भी मुसलमानों को उनके ज़ज्बात की हक़ीकी नुमाइंदगी करने वाला नहीं मिला. एहसासात की तर्जुमानी के लिए क़ौम दर-दर भटकी. लेकिन कभी खुद का दरवाजा नहीं खटखटाया…

क्योंकि कुछ लोगों को तो ऐसा करने पर इसके खुलने का यक़ीन ही नहीं था और जिन्हें था उनमें दर खटखटाने से पैदा होने वाली आवाज़ के अंजाम की दहशत थी. बस इन्हीं वजहों से मुसलमानों के जज़्बात कभी बाहर ही नहीं निकल पाए और अंदर ही अंदर घुट-घुट कर दम तोङते रहे.

क़ौम को इस बात का खौफ़ सबसे ज्यादा रहा कि कहीं खुद के दर पर दस्तक देने से बाक़ी के रास्ते हमारे लिए बंद न हों जाएँ… इन सबके बावजूद कौम अपने ज़ज्बात और अहसासात की नुमाइंदगी का सपना बुनती रही… जो आज भी क़ौम के दिलों में ज़िंदा है लेकिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की आशंका मुसलमानों को ऐसा करने से रोक रही है.

मुसलमानों की क़यादत मुसलमानों के ही हाथ में नहीं होने की बङी वजह ये भी रही कि खुद दीन के अमल से खाली मुसलमानों ने रहनुमाई के लिए क़ौमी रहनुमा का मयार नबियों वाला तय किया और इस मयार पर खरा नहीं उतरने वालों को क़ाएद मानने से ही इनकार कर दिया, जबकि उससे ज्यादा किरदार में बुरे दूसरी क़ौम के नेताओं की क़यादत तस्लीम करने में कभी गुरेज़ नहीं किया.

लालू, मुलायम, नीतीश, ममता या राहुल कौन दूध का धुला है? फिर भी हमने इनकी कमियों को नज़रअंदाज़ कर इनकी क़यादत को कबूल किया. इन रहनुमाओं की अपनी क़ौम तो किसी भी आरोप में घिरने पर और मज़बूती से इनके साथ खङी नज़र आई लेकिन मुसलमान अपने कौमी रहनुमा को हर ऐब से पाक़ और बेदाग़ देखना चाहता है. वो भूल जाता है कि हर ऐब से पाक या तो फरिश्ता हो सकता है या फिर नबी…

फरिश्ता इंसान का क़ाएद बन नहीं सकता और कोई नबी अब दुनिया में आने से रहा क्योंकि ये हमारा ईमान है कि आखिरी नबी आ चुकें हैं. ऐसे में हर ऐब से पाक क़ौमी रहनुमा की सोच ने भी अब तक मुस्लिम क़यादत पैदा नहीं होने दी. मुसलमानों ने हमेशा बुरे वक़्त में अपने नेताओं का साथ ही नहीं छोङा बल्कि ज़ोरदार विरोध कर उनकी हैसियत को खुद ही पामाल कर दिया.

बावजूद इसके मुसलमानों के साथ पिछले साठ सालों से जारी जुल्म के खिलाफ़ जब आदिलाबाद और हैदराबाद से आवाज़ बुलंद हुई तो मुसलमानों को बङा सुकून मिला. ज़िंदादिल जवानों ने खुलेआम इस बात का इज़हार किया, तो समझदार बुजुर्गों ने दिल ही दिल में खुशी महसूस की, मगर दहशतज़दा क़ौम ने मसलेहत-पसंदी की राह पकङ ली. दक्कन की आवाज़ ने जब बिहार का रूख किया तो सिर्फ जज़्बात ने ही खैरमक़दम किया जबकि कुछ लोगों ने तरह-तरह के खदशात का इज़हार किया.

ज्यादातर लोग इस बात की आशंका जता रहें हैं कि ओवैसी के चुनाव में उतरने से बीजेपी जैसी सांप्रदायिक पार्टी को सत्ता हासिल करने में मदद मिलेगी और उनकी नज़र में धर्म-निरपेक्ष आरजेडी-जेडीयू-कांग्रेस को नुक़सान होगा. धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के समर्थक बहुसंख्यकों को ओवैसी के आगमन से सांप्रदायिक वैमनस्य बढने की आशंका है, तो कुछ लोगों ने ओवैसी के किरदार को लेकर भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं.

वो ओवैसी और तोगङिया का फर्क पूछ रहे हैं? सवाल तो ओवैसी समर्थक भी उठा रहें है कि ओवैसी साहब कहीं बिहार में जज़्बात को हवा देकर हैदराबाद तो नहीं लौट जाएंगे… वहीं दूसरी तरफ़ ओवैसी दहशतज़दा कौम के लिए एक बङा सहारा होने के साथ-साथ बङा सरमाया भी हैं.

लोग ओवैसी में एक ऐसी उम्मीद की किरण देख रहें हैं जिसका दशकों से अंधकार में जी रहे लोगों को इंतज़ार था. ओवैसी इस वक्त मज़लूमों का मसीहा बनकर उभरें हैं. सांप्रदायिक ताक़तों की दलीलों का मुंहतोड़ जवाब देने वाले बैरिस्टर हैं ओवैसी… इन्हीं जज़्बात और खदशात के बीच औवैसी ने क़दम बढाने के संकेत दिए हैं.

लेकिन महाराष्ट्र के बाद बिहार के चुनावी समर में उतरने का ओवैसी का फैसला क्या वाकई में मुसलमानों को राष्ट्रीय नेतृत्व देने में कामयाब होगा या ये सिर्फ ओवैसी की पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाने की क़वायद भर साबित होगा?

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