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अलीमुद्दीन की हत्या के बाद भी गो-रक्षकों की दहशत में जीने को मजबूर है झारखंड का यह गांव

Afroz Alam Sahil, BeyondHeadlines

रांची : झारखंड के रामगढ़ ज़िले का मनुआ गांव… सड़कें सुनसान हैं… बीच सड़क पर जलते चुल्हे का धुंआ यह बताने के लिए काफ़ी है कि यहां के लोग अंदर ही अंदर किस क़दर उबल रहे हैं.

इस मनुआ गांव की आबादी क़रीब 5 हज़ार है, जहां तक़रीबन 3 हज़ार मुसलमान हैं. यहां के लोग साम्प्रदायिक सौहार्द की अनेकों कहानियां सुनाते हैं, लेकिन यह भी बताते हैं कि अब इस गांव को गो-रक्षकों की नज़र लग गई है. पिछले दो-तीन साल से जब वे सक्रिय हुए हैं, इस गांव की अमन-चैन ख़त्म हो गया है. यहां कई गो-रक्षक दल हैं, जो आए दिन मुसलमानों को अपना निशाना बनाते रहते हैं. गांव वालों की माने तो यहां पिछले दो साल में दो दर्जन से अधिक गो-रक्षा के नाम पर मामले यहां के थाने में दर्ज है.

मनुआ वही गांव है, जहां के अलीमुद्दीन अंसारी को गाय के नाम पर इसी साल 29 जून के दोपहर रामगढ़ बाज़ार में भीड़ के हाथों पीट-पीट कर मार डाला गया.

अब हम अलीमुद्दीन अंसारी के घर पर थे. उनकी पत्नी मरियम खातून (40 साल) हमारे लिए अपनी बेटी को चाय-नाश्ता बनाने को बोलती हैं. मना करने पर कहती हैं कि, अगर मेरे घर मेरे शौहर का हत्यारा भी आ जाए तो मैं उसे चाय-नाश्ते के बग़ैर नहीं जाने दूंगी. उसका धर्म चाहे जो भी हो, लेकिन हमारा धर्म इंसानियत का है.

फिर अपने आंखों से आंसू पोछते हुए कहती हैं, पता नहीं! लोगों की इंसानियत कहां मर गई थी कि कोई मेरे शौहर को पीट-पीटकर मार रहा था और लोग तमाशाबीन बने रहे. जानवर कभी अपने जैसे जानवरों को नहीं मारता. कुत्ते भी जब देखते हैं कि कोई किसी कुत्ते को मार रहा है तो बाक़ी के कुत्ते भौंकने लगते हैं. लेकिन इंसान में इतनी इंसानियत बची कहां है कि कोई उन्हें किसी को मारने से रोकता.

मरियम खातून कहती हैं कि उस दिन वो यही कहकर निकले थे कि हम कुछ घंटों में लौट आएंगे, लेकिन वो आज तक नहीं लौटे.

मरियम बताती हैं कि बहुत से नेता आएं. कई सारे आश्वासन मिले. दो लाख की सहायता राशि मिली. कुछ क़ौम के लोगों ने भी मदद की. सरकार ने मेरे बच्चे को नौकरी देने का वायदा किया. राशन कोटा का वादा किया. विधवा पेंशन का वादा किया. इंदिरा आवास का वादा किया. लेकिन क़रीब 6 महीने गुज़र जाने के बाद भी कुछ भी नहीं मिला.

वो आगे बताती हैं कि, जो पैसे मिलें, वो सब केस-मुक़दमें और दौड़-धूप में ही ख़त्म हो गया. हम अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं. उनका ये भी कहना है कि, अब कोई मिलने भी नहीं आता.

मरियम कहती हैं, कोर्ट से उम्मीद है कि हमें इंसाफ़ मिलेगा और हमें इंसाफ़ मिलना ही चाहिए. जिन लोगों ने ऐसा किया है, उन्हें सज़ा मिलना ही चाहिए.

इस बीच उनका बड़ा लड़का भी चाय-नाश्ता लेकर आ चुका है. चाय-नाश्ते के साथ गांव के कई लोग भी जमा होने लगे हैं.

इन्हीं लोगों में पास के शिरका गांव के मुखिया इरशाद भी हैं. उनका कहना है कि, यहां कई गो-रक्षक दल हैं. दो-तीन साल से काफ़ी एक्टिव हैं. लेकिन 12 लोगों के जेल जाने के बाद अब थोड़ा ठंडे हैं.

वो आगे बताते हैं कि, ये केस काफ़ी मज़बूत है. इसमें सबूत के तौर पर पुलिस ने 75 और 10 वीडियो भी पेश किए हैं.

अंजुमन इस्लामिया से जुड़े महमूद अंसारी कहना है कि गो-रक्षा के नाम पर ये लूटपाट करते हैं. ट्रक लूट लेना, किसी के भी साथ मारपीट करके पैसे छीन लेना यही इनका काम है. हद तो यह है कि प्रशासन भी इन्हें सपोर्ट करती है.

वो कहते हैं कि, इस मामले में गवाह तोड़ने की बहुत कोशिश हुई है. यहां से क़रीब 16 किमी दूर रहने वाले एक गवाह को हर तरह का लालच भी दिया गया. कोर्ट में भी उनकी तरफ़ से माहौल बिगाड़ने की पूरी कोशिश की जाती है. उनके समर्थन में 100-200 लोग आते हैं. जबकि इधर से 35-40 लोग ही बमुश्किल जा पाते हैं.

बता दें कि इस केस में 13 गवाह हैं, और फास्ट ट्रैक कोर्ट में सबकी गवाही पूरी हो चुकी है. अब इस मामले में दोनों पक्षों की जिरह सुनी जा रही है.

दरअसल, इस केस में भाजपा को छोड़ तक़रीबन तमाम राजनीतिक दलों के लोगों ने लगातार धरना-प्रदर्शन किया. इसी दबाव में आकर 13 जुलाई को मुख्यमंत्री रघुवर दास ने ऐलान किया कि अब ये मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलेगा. 

भाजपा नेता हुए हैं गिरफ़्तार

इस मामले में भारतीय जनता पार्टी के दो नेताओं को गिरफ्तार किए गए हैं. रामगढ़ के एसपी किशोर कौशल के मुताबिक़, इस मामले में नित्यानंद महतो और राजा खान को गिरफ्तार किया गया है. ये भाजपा की ज़िला इकाई के पदाधिकारी हैं. पुलिस ने यह कार्रवाई घटना के वीडियो फुटेज और इस मामले मे दर्ज रिपोर्ट के आधार पर की है. नित्यानंद महतो भाजपा की रामगढ़ ज़िला इकाई के मीडिया प्रभारी हैं तो वहीं राजा खान भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के नेता हैं. इस तरह इस मामले में कुल 12 लोगों को नामज़द किया गया है. इनमें से ज़्यादातर का संबंध भाजपा व बजरंग दल के साथ है.

दिलचस्प बात यह है कि इस केस में भले ही 12 लोगों को नामज़द किया है और मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ अब तक 17 लोगों की गिरफ़्तारी बताई जा रही है. लेकिन एक आरटीआई के ज़रिए पूछे गए सवाल के जवाब में रामगढ़ के पुलिस अधीक्षक ने बताया है कि 10 लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया है और अब तक 5 आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं.

जुलेखा खातून की मौत का नहीं है इस केस से कोई संबंध

अक्टूबर महीने में अलीमुद्दीन हत्याकांड मामले के गवाह जलील अंसारी की पत्नी जुलेखा खातून की बाईक से गिरने के कारण हुई मौत को इस केस के साथ जोड़ा गया था. लेकिन अलीमुद्दीन के घर वालों का कहना है कि इसे इस केस से जोड़ना सही नहीं होगा. वो कोर्ट परिसर से अलीमुद्दीन के बड़े बेटे शहबाज़ के साथ घर आधार कार्ड लेने आ रही थी. रास्ते में एक बाईक पर दोनों तरफ़ तेल का बड़ा गैलन लिए बाईक के क़रीब से गुज़रने के कारण शहज़ाद अपना संतुलन खो बैठा, जिससे जुलेखा नीचे गिर गई. सर के बल गिरने के कारण सर में काफी चोट आई और मौत हो गई.

पहले इस बारे में परिवार ने इस संबंध में पुलिस थाने में शिकायत दी थी, पर अब उसे वापस ले लिया. अलीमुद्दीन की पत्नी मरियम का कहना है कि, हम झूट का सहारा नहीं लेना चाहते. इंसानियत ज़िन्दा रहना चाहिए. जुलेखा खातून रिश्ते में अलीमुद्दीन की बहन थी.

सुप्रीम कोर्ट जाएंगे हम —भाजयुमो

इस केस में स्पीडी ट्रायल चलने से आरएसएस व भाजपा और इससे जुड़े अन्य संगठन के लोग ख़ासा नाराज़ हैं. बजरंग दल, भाजपा व भाजयुमो के लोग यहां कई बार धरना दे चुके हैं. इनका कहना है कि अलीमुद्दीन हत्याकांड में प्रशासन एकतरफ़ा कार्रवाई करते हुए निर्दोषों को फंसाने का काम कर रही है, इसे किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. अगर प्रशासन अपने दोहरे चरित्र से बाहर नहीं निकलेगा तो इस मामले में हम सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे.

गाय के नाम पर मनुआ में अब भी है दहशत

मनुआ गांव में यह कोई पहली घटना नहीं थी. अलीमुद्दीन अंसारी की हत्या के सिर्फ़ 5 दिन पहले मनुआ गांव क़रीब पारगड़ा रेलवे लाईन, मरार थाना के पास बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने मो. मुबीन (25) और उनके मामा सरफ़ुद्दीन अंसारी के साथ भी गाय के नाम पर मारपीट की गई. बाद में बजरंग दल के लोग ही इन्हें थाना लेकर गए. गांव के लोगों का आरोप है कि पुलिस ने उनकी एक न सुनी. मुबीन व सरफ़ुद्दीन के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर इन्हें जेल में डाल दिया गया.

मुबीन व सरफ़ुद्दीन फिलहाल ज़मानत पर रिहा हैं. इनका परिवार अभी भी काफ़ी डर के माहौल में है. हमारे इनके घर पहुंचते ही घर के लोग डर जाते हैं. उल्टा हमसे ही कई तरह के सवाल पूछते हैं.

मुबीन बताते हैं कि, दूध के मक़सद से एक गाबिन गाय पूरे 11,500/- रूपये में पास के एक गांव से पंडित रवि मिश्रा जो इलाक़े में पंडित जी के नाम से मशहूर हैं, से खरीद कर ला रहे थे. रास्ते में 7-8 लोगों ने हमें रोक लिया. हमारा मोबाईल छिन लिया. गाली-गलौज व मारपीट की. फिर हमें वो पुलिस थाने ले आएं. थाने में 50-60 उनके लोग आ गए. पुलिस भी तमाम सच्चाई जानने के बावजूद हमारे ख़िलाफ़ एफ़आईआर लिख दिया. हम 35 दिन जेल में रहकर बाहर आए हैं. केस अभी भी चल रहा है.

मुबीन जब अपनी कहानी सुना रहा था. तो उनकी मां बीच में ही बोल उठी —गाय का गोश्त तो हम खाते नहीं, क्या अब गाय का दूध भी न पिएं. गाय पालना भी छोड़ दे. पता नहीं, ये गाय अब कितनों की जान लेगी…

पास ही खड़े मुबीन के पिता मुस्तक़ीम (50) बताते हैं कि, मिश्रा जी हमारे दोस्त हैं. मैं उनके दफ़्तर में काम करता हूं. लेकिन मिश्रा जी डर रहे हैं, क्योंकि वो सर्विस में हैं और उन्हें तरह-तरह की धमकी मिली है.  

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