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मुशावरत चुनाव : मुसलमानों की सियासत की असली तस्वीर

Afroz Alam Sahil, BeyondHeadlines  

नई दिल्ली : मुसलमानों की मुल्क की सियासत में भले ही कोई बिसात न बची हो, लेकिन वो अपने तंज़ीमों की सियासत में सबसे आगे हैं.

मुसलमानों की नुमाइंदा तंज़ीम ‘ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत’ में सदर व मजलिस-ए-आमला के लिए चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. लेकिन इसको लेकर सियासत इतनी बड़ी हो गई है कि मामला अदालत तक पहुंचने को तैयार है.

बता दें कि 1964 में क़ायम ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत का क़द मुस्लिमों तंज़ीमों ख़ासा बड़ा है. फिलहाल यह मुसलमानों के 18 बड़े संगठनों की नुमाइंदगी करती है. पिछले चुनाव में इन संगठनों की तादाद 08 थी.

‘ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत’ में इस समय कुल 216 सदस्य हैं. जिन्हें डाक के ज़रिए बैलेट पेपर भेज दिया गया है. अब इन सदस्यों को अपना बैलेट पेपर डाक के ज़रिए 30 दिसम्बर तक नई दिल्ली स्थित मुशावरत के दफ़्तर में भेज देना है. 31 दिसम्बर को वोटों की गिनती की जाएगी.

इस बार सदर के ओहदे के लिए दो लोग यानी वर्तमान सदर नवेद हामिद और पूर्व राज्यसभा सांसद मो. अदीब ने अपना नॉमिनेशन दिया था. लेकिन मो. अदीब ने 03 दिसम्बर को अपना नॉमिनेशन कई सारे सवाल खड़े करते हुए वापस ले लिया था. यानी अब सिर्फ़ नवेद हामिद ही एकमात्र सदर कैंडिडेट हैं. वहीं 20 मजलिस-ए-आमला सदस्य के लिए 51 लोग मैदान में हैं.   

बीते दिनों अदीब साहब ने एक प्रेस कांफ्रेंस करके मुशावरत के चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए और इस चुनाव को मुशावरत के दस्तूर के ख़िलाफ़ बताया. इस प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने मरहूम सैय्यद शहाबुद्दीन का 11 फरवरी 2017 का लिखा वो ख़त भी जारी किया, जिसे उन्होंने मुशावरत से इस्तीफ़ा देते समय दिया था. आरोप है कि मुशावरत के अध्यक्ष ने ये पत्र छिपा लिया.

मो. अदीब का ये भी आरोप था कि, मजलिस-ए-आमला की आख़िरी मीटिंग, जिसमें चुनाव की तारीख़ का ऐलान किया गया, उस समय तक 202 सदस्य थे, लेकिन बाद में इनकी तादाद बढ़ाकर 216 कर दी गई. तीसरा आरोप इस चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर रशीद अहमद खान (पूर्व सचिव, बिहार सरकार) को लेकर है. मो. अदीब का कहना है कि वो मजलिस-ए-आमला के सदस्य नहीं हैं.

वहीं चौथा आरोप है कि जब मुल्क में मुसलमानों की हालत ख़राब है, उस सिलसिले में मुशावरत ने एक भी प्रोग्राम नहीं किया, बल्कि अफ़सोस की बात यह है कि आईबी के एक ज़िम्मेदार को अपने दफ़्तर में दावत दी गई और अजीत डोभल से मुलाक़ात करने गए.

अब इस मामले में कांग्रेस पार्टी (अल्पसंख्यक सेल) के राष्ट्रीय सचिव रह चुके अनीस दुर्रानी ने मुशावरत को एक लीगल नोटिस भेजा है. साथ ही यह भी कहा कि इन सवालों के जवाब अगले तीन दिनों में दिया जाए, लेकिन मुशावरत दफ़्तर में मौजूद लोगों का कहना है कि ऐसा कोई नोटिस उन्हें हासिल नहीं हुआ है.

BeyondHeadlines से बातचीत में अनीस दुर्रानी कहते हैं कि, लीगल नोटिस ई-मेल व डाक के ज़रिए भेज दिया गया है. अगर तीन दिनों में कोई जवाब नहीं आया तो फिर मैं अदालत का दरवाज़ा खटखटाउंगा. ये पूछने पर कि मुशावरत रजिस्टर्ड संस्था नहीं है, तो फिर अदालत? इस पर उनका कहना है कि इस संबंध में क़ानून के जानकारों से पूरी जानकारी ले ली गई है. अदालत इस चुनाव पर स्टे लगाने का पावर रखती है.

BeyondHeadlines से बातचीत में मो. अदीब कहते हैं कि, मैं अब मुस्लिम जमाअतों से दूर रहना चाहता हूं, क्योंकि तमाम मुस्लिम जमाअतें चंदों के पैसों से सिर्फ़ अपने लिए काम करते हैं, उन्हें क़ौम व मिल्लत से कोई वास्ता नहीं होता.

वो यह भी बताते हैं कि, वो इस बार ये चुनाव लड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन इस चुनाव के लिए उनके पास दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के वर्तमान चेयरमैन डॉ. ज़फ़रूल इस्लाम खान आएं और चुनाव में आने की गुज़ारिश की, लेकिन मैंने मना कर दिया. लेकिन उन्होंने मुझे बताया कि जमाअत इस बार आपका साथ देगी. आपका आना ज़रूरी है. तब मैंने इस चुनाव में अपना नॉमिनेशन दाख़िल किया.

मो. अदीब कहते हैं कि, अगर चुनाव ईमानदारी से दस्तूर के मुताबिक़ हुआ तो मैं इसमें हिस्सा लूंगा, वरना मैं मुशावरत से इस्तीफ़ा दे दुंगा.     

वहीं इस पूरे मामले में मुशावरत के वर्तमान सदर नवेद हामिद इन तमाम आरोपों को बेबुनियाद बताते हैं. उनका कहना है कि, मरहूम सैय्यद शहाबुद्दीन साहब का खत 12 फ़रवरी को मिला और 13 फ़रवरी को जेनरल बॉडी की मीटिंग बुलाई गई. इस मीटिंग में न सिर्फ़ खत पेश किया गया, बल्कि उस पर डेढ़ घंटे तक बहस की गई. इस मीटिंग में जो रिजोलूशन पास किया गया, उसके मिनट्स मुशावरत की वेबसाईट पर मौजूद हैं. वो आगे बताते हैं कि, दरअसल, उन्हें किसी ने गुमराह किया था. और उन्होंने गलत सूचना के आधार पर वो ख़त लिखा था.

दूसरे आरोप के जवाब में वो कहते हैं कि, 2015 में डॉ. ज़फ़रूल इस्लाम खान ने 03 अक्टूबर को मजलिस-ए-आमला के मीटिंग के बाद 10 नवम्बर, 2015 तक 09 लोगों को सदस्य बनाया था. इस बार मजलिस-ए-आमला की मीटिंग के बाद 14 सदस्य बने, क्योंकि सब ज़रूरी लोग थे. समाज में उनकी अपनी अहमियत है.

तीसरे आरोप पर नवेद हामिद बताते हैं कि, 2015 में जब मो.अदीब चुनाव हार गए थे. तब भी रिटर्निंग ऑफिसर रशीद साहब ही थे, तब उन्होंने कोई आपत्ति क्यों नहीं जताई. जबकि उस समय रशीद साहब को रिटर्निंग ऑफिसर ज़फ़रूल इस्लाम खान ने खुद बनाया था, लेकिन इस बार उन्हें मजलिस-ए-आमला ने बनाया है.

चौथे व आख़िरी आरोप पर वो कहते हैं कि, मुशावरत ने लगातार उन तमाम पॉलिसियों व घटनाओं की मुख़ालफ़त की, जो मुल्क के अल्पसंख्यकों, देश की एकता-अखंडता व साम्प्रदायिक सौहार्द को तोड़ने वाली थी. खुद हमने मुशावरत की ओर से पीएम मोदी को 27 जून, 2017 को एक पत्र लिखा, इसके बाद पीएमओ से कॉल आया. इस सिलसिले में अजीत डोभल से मिलने के लिए कहा गया. एक प्रतिनिधिमंडल ने मजलिस-ए-आमला के फैसले के बाद इनसे मुलाक़ात की. अब कोई पूरे दो साल मुशावरत से कोई मतलब नहीं रखेगा, तो उन्हें कैसे पता चलेगा कि मुशावरत क्या कर रही है. 

गौरतलब रहे कि ‘ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत’ के पिछले चुनाव में भी काफ़ी हलचल रही थी. इसमें धन, बाहुबल से लेकर रसूख और जोड़-तोड़ का जमकर इस्तेमाल किया गया. नौकरशाहों की मदद ली गई. सत्ता की हनक और राजनीति के हर हथकंडे का जमकर प्रयोग किया गया. और इसे तंज़ीम के नुमाइंदों ने इस तरह की हरकतों की सच्चाई को खुलेआम स्वीकार भी किया था.

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