Edit/Op-Ed

समाजवादियों के उतार-चढ़ाव के 84 वर्ष…

Dr. Sunilam

17 मई 2018 को कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन के 84 वर्ष हो रहे हैं. 84 वर्ष पहले पटना के अंजुमन इस्लामिया हॉल में कांग्रेस के भीतर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया गया था. इस सम्मेलन में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के विधान, नीति एवं कार्यक्रम का प्रारूप तैयार करने के लिए कमेटी गठित की गई थी, जिसमें आचार्य नरेन्द्र देव अध्यक्ष, जयप्रकाश नारायण मंत्री, अब्दुल बारी, पुरूषोत्तम त्रिकम दास, मीनू मसानी, संपूर्णानंद, जी. सी. बनर्जी, फ़रीदूल हक अंसारी, राममनोहर लौहिया, अब्दुल आलिम, एवं एन. जी. रंगा सदस्य बनाए गए थे. विभिन्न प्रांतों में ईकाई गठित करने के लिए जयप्रकाश नारायण संगठन मंत्री नियुक्त किये गए थे.

17 मई 2018 को समाजवादी संस्थाओं के मंच ‘हम समाजवादी’ संस्थाएं तथा सोशलिस्ट मेनीफेस्टो ग्रुप द्वारा राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन का आयोजन किया गया है, जिसमें देशभर के समाजवादी पहुंच रहें हैं. सम्मेलन में कुछ समाजवादियों द्वारा तैयार किया गया समाजवादी घोषणा पत्र का मसविदा चर्चा के लिए रखा जाएगा.

यह पहला अवसर होगा जब किसी राजनैतिक दल के अलावा कोई राजनीतिक समूह घोषणा पत्र प्रस्तुत करेगा. समाजवादी 1934 में समाज और देश के निर्माण के लिए क्या नज़रिया रखते थे, यह दस्तावेजों में दर्ज है.

गत 84 वर्षों में समाजवादी विचार की विभिन्न पार्टियों ने भी अपने घोषणा-पत्र चुनाव के दौरान जारी किए हैं. आगामी 2019 के आम चुनाव में समाजवादियों की दृष्टि से क्या मुद्दे होने चाहिए, वह दृष्टि समाजवादी घोषणापत्र के माध्यम से देश के सामने आएगी.

आज़ादी के आन्दोलन में समाजवादियों की भूमिका सर्वविदि है. सभी जानते हैं कि 9 अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा कराने में तथा कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भूमिगत आंदोलन चलाने में, समाजवादियों ने सबसे अहम भूमिका निभाई थी. तीसरे दशक से ही विभिन्न राज्यों में समाजवादी समूह बनना शुरू हो गए थे लेकिन स्वराज पार्टीवादियों के बढ़ते प्रभाव, अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति, कम्यूनिस्टों की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका पर विचार कर नासिक जेल में ट्रेड यूनियन ने काम करने वाले तथा प्रगतिशील युवाओं ने मिलकर आज़ादी की लड़ाई को वैचारिक आधार देने, स्वतंत्र भारत की स्पष्ट सामाजिक-आर्थिक रूपरेखा तैयार करने तथा आज़ादी मिलने पर समतावादी समाज के निर्माण के लिए कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया था.

जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस तथा गांधीजी के साथ समाजवादियों का नज़दीकी भावनात्मक रिश्ता था, लेकिन सैद्धांतिक बहस भी चला करती थी.

इतिहासकार मानते हैं कि कांग्रेस कमेटी की नीतियों की दिशा तय करने में समाजवादियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जो इस बात से स्पष्ट होती है कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में पहले जो प्रस्ताव पास हुआ करते थे, उन प्रस्तावों पर कांग्रेस कमेटी में ज़ोरदार बहस हुआ करती थी तथा जहां-जहां समाजवादियों का प्रभाव था, वहां वे उसे पारित करा लिया करते थे.

कराची कांग्रेस में समाजवाद शब्द पहली बार इस्तेमाल हुआ, जिसका आधार यूपीपीसीसी का आचार्य नरेन्द्र देव जी द्वारा पारित कराया गया प्रस्ताव था.

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी मूलतः मार्क्सवादी पार्टी थी तथा अधिकतर नेता खुद को मार्क्सवादी ही मानते थे. इसके बावजूद रूस की क्रांति के बाद जिस तरह सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के नाम पर वर्ग शत्रुओं का सफाया किया जा रहा था, उसका समाजवादियों ने विरोध किया था, तबसे लोकतंत्र की सर्वोच्चता के विचार को तौर पर समाजवादियों ने स्वीकार किया.

कम्यूनिस्टों के साथ मिलकर समाजवादियों का संगठन शुरू हुआ था. ईएमएस नम्बूदरीपाद, शिवनाथ बनर्जी जैसे दिग्गज कम्यूनिस्ट नेता मेरठ में 20 जनवरी 1936 हुए कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के दूसरे सम्मेलन में कार्यकारिणी सदस्य चुने गए थे.

1948 में अरूणा आसिफ़ अली भी नासिक सम्मेलन में राष्ट्रीय कार्यकारिणी में चुनी गई थी तथा उन्हें हैदराबाद संघर्ष समिति का अध्यक्ष बनाया गया था. समाजवादियों और कम्यूनिस्टों के बीच अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के चलते तथा भारतीय कम्यूनिस्टों द्वारा रूस की कम्यूनिस्ट पार्टी की लाइन को भारत में चलाने के रवैये को लेकर दूरियां बढ़ती गई. दोनों वैचारिक समूह अलग-अलग काम करने लगे. समाजवादी लगातार गांधी जी के नज़दीक होते गए तथा अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी आंदोलन की यूरोप केन्द्रित दृष्टि को भी गांधी समाजवादियों ने चुनौती देना शुरू किया तथा रंगून में एशियन सोशलिस्ट कांफ्रेस का आयोजन किया.

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किए गए सभी कांग्रेसी नेताओं को अंग्रेजों ने आज़ादी मिलने के पहले छोड़ दिया, लेकिन जेपी और लोहिया, गांधीजी के हस्तक्षेप के बाद छोड़े गए.

समाजवादियों ने भारत के विभाजन का विरोध किया. साम्प्रदायिक दंगों की आग में जब पूरा देश झुलस रहा था तब उन्होंने गांधी जी के साथ मिलकर सांप्रदायिक हिंसा को रोकने को आज़ादी मिलने के समारोह से अधिक प्राथमिकता दी.

संविधान सभा में भी समाजवादी शामिल नहीं हुए. उल्लेखनीय है कि संविधान सभा देश के नागरिकों के द्वारा चुनी गई नहीं थी. इसी तरह देश में जब पहले चुनाव हुए और गांधी जी ने कांग्रेस के चुनाव में शामिल होने के फैसले का विरोध किया तब समाजवादी गांधी जी के साथ रहे.

देश को आज़ादी मिलने के बाद कांग्रेस के भीतर दक्षिण पंथियों ने ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी, जिसमें समाजवादियों का कांग्रेस के भीतर कार्य करना संभव नहीं रहा. दो ही विकल्प थे या तो कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी को भंग कर समाजवादी, कांग्रेस पार्टी का सदस्य बने या कांग्रेस छोड़ दें.

समाजवादियों ने कांग्रेस पार्टी छोड़ने का फैसला किया. यह फैसला अत्याधिक अहमियत रखता है. समाजवादी नेताओं को कांग्रेस के भीतर मंत्री पदों तथा कांग्रेस संगठन में भी उच्च पदों का प्रस्ताव था. आचार्य नरेन्द्र देव तथा जेपी को तो कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव स्वयं गांधी जी तथा जवाहरलाल नेहरू जी द्वारा दिया गया था. कांग्रेस से अलग होने का फैसला व्यक्तिगत नहीं था, वैचारिक था तथा कांग्रेस के भीतर 1934 से 1948 तक के अनुभव के आधार पर लिया गया था.

सभी यह जानते हैं कि समाजवादियों ने पहला आम चुनाव जोश-खरोश के साथ लड़ा था, लेकिन उन्हें केवल 10 प्रतिशत मत मिले, जिससे कई समाजवादी नेताओं के मन में निराशा पैदा हुई, कई नेताओं ने राष्ट्र निर्माण के नाम पर कांग्रेस को समर्थन भी दिया तथा कई नेता कांग्रेस में शामिल भी हो गए.

जयप्रकाश नारायण जी ने सर्वोदय का रास्ता चुना. समाजवादी विचार की पार्टी बनाने के लिए विभिन्न पार्टियों के साथ बातचीत चली तथा कई सुभाषवादी किसान मज़दूर प्रजा पार्टी तथा एमएन रॉय वाली पार्टी में शामिल हुए.

केरल में समाजवादियों की सरकार भी बनी, लेकिन डॉ. राममनोहर लोहिया ने केरल सरकार द्वारा जनआंदोलन पर गोली चलाए जाने का विरोध किया. पार्टी ने डॉ. लोहिया के राज करने के तरीक़े पर विचार करने के बजाए उन्हें पार्टी से अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए निकाल दिया. समाजवादी दो अलग-अलग पार्टियों में रहने के बावजूद राजनीति में अपना अहम भूमिका निभाते रहे.

डॉ. राम मनोहर लोहिया ने पंचमढी में समाजवाद की जो व्याख्या प्रस्तुत की उसको पूरी देश और दुनिया में सराहा गया. जाति के सवाल पर अब तक समाजवादियों की नीति स्पष्ट हो चुकी थी. डॉ. लोहिया ने पिछड़ा पावे सौ में साठ का नारा देते हुए सभी वर्गों की महिलाओं को पिछड़ा बतलाते हुए सामाजिक न्याय का नया सिद्धांत गढ़ा. जो आज देश में पूरी तरह से स्थापित हो चुका है. हज़ारों वर्षों से पिछड़ों को समाज और देश के फैसले करने का हक़ नहीं मिला था, वह हक़ दिलाने का काम समाजवादी आंदोलन ने देश में किया.

डॉ. लोहिया ने सप्त क्रांति का नया विचार भी दिया. उन्होंने कहा कि दुनिया के हर समाज में आर्थिक, जाति, लिंग, रंग के आधार पर भेदभाव होता है तथा शक्तिशाली ताक़तें हिंसा से अपना वर्चस्व क़ायम करती हैं तथा नागरिकों के निजता के अधिकारों का अतिक्रमण करती हैं.

उन्होंने कहा कि इस तरह के सात अन्याय लगातार समाज में होते रहते हैं इन नाइंसाफ़ियों के ख़िलाफ़ समाज में जागरूकता पैदा करना तथा समतावादी समाज का निर्माण करना समाजवादियों का उद्देश्य होना चाहिए. समाजवादियों ने देश में भाषा, धर्म विकेन्द्रीकरण, गैर-बराबरी, देश की सुरक्षा संप्रभुता जैसे सवालों पर नई दृष्टि देश के सामने रखी. कर्नाटक में सबसे पहले रामकृष्ण हेगडे़ की सरकार ने पंचायतों में 30 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण, नज़ीर साहब द्वारा दिया गया.

आज़ादी के तुरंत बाद डॉ. राम मनोहर लोहिया ने गोवा मुक्ति आंदोलन की शुरूआत की, जिसका समर्थन गांधी जी ने भी किया था. नेपाल में राणाशाही तथा राजशाही के ख़िलाफ़ नेपाली कांग्रेस के आंदोलन को समाजवादियों ने सतत सहयोग किया. बर्मा में लोकतंत्र की बहाली को लेकर समाजवादियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही.

चीन के हमले के बाद आज़ाद तिब्बत को हड़प लिए जाने की घटना का न केवल समाजवादियों ने विरोध किया, बल्कि दलाई लामा के नेतृत्व में चलाए जा रहे आंदोलन का समर्थन किया. भूटान में लोकतंत्र स्थापित करने, श्रीलंका में तमिलों को न्याय देने तथा पाकिस्तान में लोकतंत्र के सवाल को भारत के समाजवादियों ने सदा उठाया है.

गैर कांग्रेसवाद की रणनीति डॉ. राम मनोहर लोहिया ने बनाई, जिसका परिणाम हुआ कि पहली बार देश के सात राज्यों में गैर-कांग्रेसी संविद सरकारें बनी. डॉ. लोहिया के देहांत के बाद देश में समाजवादियों ने इस विचार को आगे बढ़ाया.

देश में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल थोप दिया तथा नागरिकों के सभी अधिकार छीन लिए गए तब समाजवादियों ने तानाशाही को चुनौती दी. जेपी द्वारा बनाई गई ऑल इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन-हिन्द मज़दूर सभा द्वारा जार्ज फर्नानडीस के नेतृत्व में रेल हड़ताल की गई. छात्रों का आंदोलन गुजरात से शुरू होकर बिहार पहुंचा, तब छात्रों ने जयप्रकाश जी को आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए प्रेरित किया. जेपी आंदोलन की आग पूरे देश में फैल गई. हांलाकि अधिकतर समाजवादी नेता जेल में डाल दिए गए, उसके बावजूद समाजवादियों ने भूमिगत आंदोलन चलाया.

तानाशाही के विरोध में मधुलिमये जी की अपील पर शरद यादव जैसे युवाओं ने संसद से इस्तीफ़ा दिया. जेपी की पहल पर सोशलिस्ट पार्टी को भंग कर अन्य पार्टियों के साथ मिलकर जनता पार्टी का निर्माण किया गया. वह परिस्थिति की मांग थी यदि कांग्रेस के ख़िलाफ़ विपक्षी दल मिलकर चुनाव लडें, क्योंकि सोशलिस्ट पार्टी कांग्रेस को अकेले हरा नहीं सकती थी. हांलाकि जार्ज फर्नाडिस जैसे नेता सोशलिस्ट पार्टी को भंग किए जाने के ख़िलाफ़ थे, लेकिन समाजवादियों ने जेपी के आदेश को स्वीकार किया.

जनता पार्टी ने देश में न केवल लोकतंत्र बहाल किया बल्कि संवैधानिक तौर पर यह भी सुनिश्चित किया कि आने वाली कोई भी सरकार इंदिरा गांधी की तरह देश पर तानाशाही न थोप सके. जनता पार्टी द्वारा सैकडों जनमुखी कार्यक्रम देश में लागू किए गए. पहली बार देश से कोका-कोला तथा आईबीएम जैसी कंपनियों को खदेड़ दिया गया. पहली बार ज़िला स्तर पर उद्योगों के विकास की नीति तथा ज़िला केन्द्र स्थापित किए गए. अनेक समतामूलक कार्यक्रम देश में पहली बार शुरू किए गए.

जनसंघ के जो लोग जनता पार्टी में शामिल हुए थे, उन्होंने जब विलय के समय हुई सहमति का उल्लंघन करना तथा तोड़ना शुरू किया तब मधुलिमये जैसे समाजवादियों ने दोहरी सदस्यता का सवाल उठाया. सांप्रदायिक शक्तियों से समझौता करने की जगह समाजवादियों ने सरकार छोड़ना बेहतर समझा. इसी तरह जब मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों को लागू किया गया, तब मंडल का मुक़ाबला कमंडल से करने का फैसला भारतीय जनता पार्टी ने किया, तब भी समाजवादियों ने सरकार बचाने के लिए सांप्रदायिक ताक़तों के साथ समझौता नहीं किया. अंततः विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिरा दी गई.

यहां यह याद करना ज़रूरी है कि कांग्रेस से जब बोफोर्स का मुद्दा उठाने के कारण वी.पी. सिंह को निकाला गया था तब समाजवादियों ने ही भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर देश में कांग्रेस के ख़िलाफ़ वातावरण खड़ा किया था, जिसके चलते मिस्टर क्लीन कहे जाने वाले राजीव गांधी की सरकार चली गई थी.

समाजवादियों ने सांप्रदायिकता के सवाल पर उत्तर प्रदेश में भी बाबरी मस्जिद के विध्वंस के मुद्दे पर सरकार छोड़ी. मुलायम सिंह यादव ने सांप्रदायिक ताक़तों को परास्त किया.

उत्तर प्रदेश और बिहार में समाजवादी लगातार सांप्रदायिक ताक़तों से मुक़ाबला करते रहे. लगातार दोनों राज्यों में समाजवादियों की सरकारें बनती रहीं. ज़मीनी स्तर पर आज भी समाजवादियों की ताक़त उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल तथा लोकतांत्रिक जनता दल (शरद यादव) के रूप में मौजूद है. दोनों ही राज्यों में कांग्रेस सिमट चुकी है. मुक़ाबला भाजपा और समाजवादियों के बीच ही है.

बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के गठबंधन हो जाने के बाद उत्तर प्रदेश से यह उम्मीद पैदा हो गई है कि 2019 के आगामी आम चुनाव में समाजवादी भाजपा-संघ परिवार को कड़ी चुनौती देंगे.

समाजवादी आंदोलन के इतिहास से यह स्पष्ट है कि गत 84 वर्षो में समाजवादियों ने सांप्रदायिकता और लोकतंत्र के सवाल को अहम मानते हुए राजनीति की है तथा सामाजिक न्याय को देश में स्थापित करने में बड़ा योगदान किया है. समाजवादियों के इस गौरवमयी इतिहास से यह संभावना प्रबल होती है कि वर्तमान चुनौतियों का मुक़ाबला भी समाजवादी करेंगे. लेकिन यह तभी संभव होगा, जब समाजवादी आंदोलन को मज़बूत हो.

समाजवादी आंदोलन के दो मज़बूत स्तंभ रहे हैं, 1946 से राष्ट्र सेवा दल ने लोकतंत्र समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, राष्ट्रवाद को लेकर अनवरत कार्य किया है.

राष्ट्र सेवा दल का गठन हुए 75 वर्ष से अधिक हो चुके हैं. हर वर्ष 400 से अधिक शिविर छात्र-छात्राओं के बीच हर वर्ष किए जाते हैं जिससे छात्र-छात्राओं के बीच संवैधानिक मूल्यों को स्थापित किया जा सके. राष्ट्र सेवा दल ने डॉ श्रीराम लागू, स्मिता पाटिल जैसे बड़े कलाकार तथा मेधा पाटकर जैसे आंदोलनकारी पैदा किए हैं.

समाजवादी यदि साम्प्रदायिकता से ज़मीनी तौर पर लड़ना चाहते हैं तो उसके लिए राष्ट्र सेवा दल एक ऐसा संगठन है जिसने अपनी विश्वसनीयता साबित की है, जिस पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगा सकता. सभी समाजवादियों को चाहे वे किसी भी पार्टी संगठन, समूह या संस्था में क्यों न हो उन्हें राष्ट्र सेवा दल की ईकाई अपने इलाके में बनानी चाहिए तथा बच्चों के बीच में सक्रिय तौर पर कार्य करना चाहिए.

आरएसएस ने सरस्वती शिशु मंदिर बनाकर 1000 से अधिक स्कूल शुरू किए, जहां संघ के कार्यकर्ता प्रशिक्षित किए जाते हैं. समाजवादियों द्वारा भी देशभर में 500 से अधिक स्कूल और कॉलेज चलाए जाते हैं, लेकिन इनका एक नाम और पहचान नहीं है. यदि इन संस्थाओं का संचालन करने वाले समाजवादी मिलकर विचार करें तो समाजवादियों द्वारा भी देश के स्तर पर समाजवादी विचार के स्कूलों की बड़ी श्रृंखला शुरू की जा सकती है.

समाजवादी संस्थाओं ने पहली बार मिलकर ‘हम समाजवादी संस्थाएं’ नामक मंच का निर्माण किया है. 81 वर्ष बाद ही सही पहली बार रचनात्मक कार्य करने वाले समाजवादी एक मंच पर आए हैं, जिसका निर्माण स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, यूसुफ मेहर अली केन्द्र के अध्यक्ष डॉ. जीजी परीख की पहल पर राष्ट्र सेवा दल, लोहिया अकादमी, सेंटर फॉर सोशलिस्ट स्टडीज, एस.एन. जोशी फाउन्डेशन द्वारा किया गया है.

हम समाजवादी संस्थाएं द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के स्थापना दिवस, पहले सम्मेलन तथा 9 अगस्त को जन क्रांति दिवस जैसे कई कार्यक्रत किए गए हैं. पुणे में युवा समाजवादियों तथा महिला समाजवादियों के सम्मेलन के साथ-साथ संविधान बचाओ, देश बचाओ सम्मेलन भी आयोजित किए जा चुके हैं. 

समाजवादियों ने देश में संघर्ष की मिशाल क़ायम की है. चुनावी गणित ज़माने में भी सफल रहे हैं.

समाजवादी आंदोलन की मज़बूती के लिए युवाओं का बड़े पैमाने पर आंदोलन से जोड़ना ज़रूरी है. युवाओं को आदर्श सिद्धांत और विचार से ही आकर्षित किया जा सकता है. समाजवादी युवजन सभा ने जिस तरह कॉलेजों और महाविद्यालयों में कार्य किया था, उसी तर्ज पर काम करने की ज़रूरत है. इसके लिए युवाओं को समाजवादी विचार से प्रशिक्षित करना ज़रूरी है अर्थात अधिक से अधिक युवा समाजवादियों के प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जाने की ज़रूरत है.

राष्ट्र सेवा दल जिस तरह छात्र-छात्राओं के शिविर करता है, उसी तरह के शिविर युवाओं के बीच करने की ज़रूरत है. राष्ट्र सेवा दल बड़े पैमाने पर स्कूली बच्चों को प्रशिक्षक के तौर पर तैयार करता है. युवाओं के प्रशिक्षण शिविर के लिए भी बड़े पैमाने पर समाजवादी प्रशिक्षक तैयार किए जाने की ज़रूरत है.

समाजवादी आंदोलन की बड़ी ताक़त मज़दूर आंदोलन रही है. हिन्द मज़दूर सभा के 92 लाख पंजीकृत सदस्य हैं. गत 70 वर्षों में हिंद मज़दूर सभा ने श्रमिकों के हित में हज़ारों लडाईयां लड़ी हैं तथा श्रमिकों को उनके अधिकार दिलाने, उनका जीवन बेहतर बनाने का कार्य किया है, लेकिन मोदी सरकार अब पूरे सार्वजनिक क्षेत्र को नष्ट भ्रष्ट करने पर आमादा है.

रेलवे, रक्षा, बैंक, बीमा सभी क्षेत्रों में एफडीआई के माध्यम से सरकार विदेशी कंपनी को देश के नागरिकों को लूटने की छूट दे रही है तथा राष्ट्रीय संप्रभुता से समझौता कर रही है. समाजवादी मज़दूर संगठनों ने गत 70 वर्षों में जो कुछ भी हासिल किया है, उसको छीनने का प्रयास सरकार कर रही है ताकि निजीकरण कर देश के संसाधनों को कारपोरेट को सौंपा जा सके. इस स्थिति से निपटने के लिए हिन्द मज़दूर सभा के साथ देश के हर समाजवादी कार्यकर्ता और नेता को जुड़ना चाहिए. हिन्द मजदूर सभा ने वैचारिक प्रशिक्षण को बढ़ाया जाना चाहिए. एचएमएस का नेतृत्व इस दिशा में प्रयासरत है, लेकिन इन प्रयासों की सफलता के लिए ज़रूरी है कि देशभर के समाजवादी आंदोलन के वैचारिक कार्यकर्ता हिन्द मज़दूर सभा के साथ जुड़ें.

सभी जानते हैं कि देश में कुल कामगारों में से केवल 4 प्रतिशत कामगार ही संगठित क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं. असंगठित क्षेत्र में हिन्द मज़दूर सभा के कार्य को बढ़ाने की ज़रूरत है तथा निर्माण मज़दूरों के साथ-साथ असंगठित क्षेत्र में निर्माण मज़दूर पंचायत का कार्य सुभाष भटनागर और सुश्री गीता रामकृष्णन के नेतृत्व में चल रहा है.

हम्माल पंचायत के माध्यम से बाबा अढाव ने हम्मलों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए तमाम सहकारी संस्थान, बैंक, आवास बनाकर तथा गरीबों के लिए भोजनालय बनाकर अनुकरणीय कार्य किया है, जिसे हर समाजवादी को जानने-समझने और मज़बूती देने की आवश्यकता है.

देश में जल, जंगल, ज़मीन की कारपोरेट लूट के ख़िलाफ़ सशक्त आंदोलन चल रहे हैं जिनमें समाजवादी विचार के आंदोलनकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका है. अपने जीवन के 32 वर्ष लगाकर मेधा पाटकर ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के माध्यम से विस्थापन की बहस को वैकल्पिक विकास की बहस बनाने की सफलता हासिल की है. जनआंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय के माध्यम से लोकतांत्रिक समाजवादी विचार के लिए प्रतिबद्ध जनसंगठन एकजुट हो रहे हैं. देश के समाजवादियों को इन आंदोलनों के साथ जुड़ने की और उन्हें साथ देने की ज़रूरत है.

जनता वीकली समाजवादियों की धरोहर है. 1946 से लगातार यह पत्रिका डॉ. जी जी पारिख जी के द्वारा प्रकाशित की जा रही है. 1946 से अब तक जनता वीकली के माध्यम से देश और दुनिया के सामने समाजवादी विचार को रखने का काम बखूबी किया है. अंग्रेजी पत्रिका होने के कारण इसकी अपनी सीमाएं हैं, लेकिन हम जब समाजवादी आंदोलन के 84 वर्ष पूरे कर रहे हैं तब यह विचार करना बहुत ज़रूरी है कि कैसे हम अंग्रेज़ी की जनता वीकली को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचा सकते हैं, साथ ही हिन्दी में भी समाजवादियों की एक विश्वसनीय पत्रिका चला सकते हैं.

समाजवादियों का सबसे अधिक नुक़सान व्यक्तिगत पसंद और नापसंदगी के प्रति अड़ियल रूख ने किया है. कुछ लोग इसे अहमतथा कुछ व्यक्तिवाद कहते हैं. ईष्या, द्वेष, जलन, प्रतिद्वन्द्विता, हठधर्मिता, आत्मकेंद्रितता हर मनुष्य की कमजोरी है, जो कम-ज्यादा मात्रा में पाई जाती है. इन मानवीय कमजोरियों से कैसे निपटा जाए, यह समाजवादियों को गंभीर रूप से सोचना होगा; क्योंकि समाजवादी आंदोलन नए मनुष्य और नए समाज के निर्माण करने का बड़ा उद्देश्य रखता है. इस कारण उसे व्यक्ति की कमजोरियों को दूर करने के तरीके भी उसे खोजने होंगे. सत्ता परिवर्तन से कई बार नीतियां बदलती हैं, लेकिन मनुष्य को बदलने का काम अधूरा रह जाता है, उस ओर समाजवादियों ने कम ध्यान दिया है, इसी के चलते मज़बूत संगठन नहीं बन सका. बार-बार टूट और विलय होता रहा. इन विषयों पर खुलकर विचार-विमर्श करने की ज़रूरत है.

वैचारिक तौर पर मज़बूत होते हुए भी संघर्षशील समाजवादियों की जमात क्यों समाज और देश में बड़ा परिवर्तन नहीं ला सकी इसके मूल्यांकन की भी ज़रूरत है. यह याद करना ज़रूरी है कि समाजवादियों का मक़सद निजी सम्पत्ति को जड़ मूल से समाप्त करना था.

डॉ. लोहिया सम्पत्ति का मोह समाप्त करने को समाजवादी आंदोलन का एक अहम उद्देश्य बतलाया था. लेकिन हम पूंजी के बंटवारे की दिशा में भी बहुत कुछ नहीं कर सके. आज गैर-बराबरी चरम पर पहुंच चुकी है. गत वर्ष हुए पूंजी निर्माण में एक प्रतिशत आबादी के पास 73 प्रतिशत हिस्सा पहुंचा है. गैर-बराबरी ख़त्म करना, समतावादी समाज की स्थापना के लिए पूर्व शर्त है. गैर-बराबरी ख़त्म करने के नए तरीक़े तलाशने होंगे. पुराने ज़माने का केवल राष्ट्रीयकरण का फार्मूला आज काम नहीं कर सकेगा.

समाजवादी आत्मचिंतन कम, आलोचना ज्यादा करते हैं, खुद को सिद्धांतवादी और समाजवादी मानकर दूसरे को सिद्धांतहीन और समझौतावादी साबित करना समाजवादियों का शगल है. वे एक दूसरे के नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते, लेकिन किसी दूसरी धारा के व्यक्ति को स्वीकार करने में क़तई देर नहीं करते. समाजवादियों की आपसी कलह का देश की विभिन्न पार्टियों ने दुरूपयोग किया है.

जब समाजवादी आंदोलने के 84 वर्ष हो रहे हैं तब यह ज़रूरी है कि गत 84 वर्षों में समाजवादियों द्वारा समाज और राष्ट्र के निर्माण में किए गए ऐतिहासिक एवं स्वर्णिम योगदान को देश और दुनिया के सामने रखा जाए. अर्थात समाजवाद का रास्ता प्रशस्त करने के लिए पुरखों की जमा पूंजी का उपयोग हो.

समाजवादियों को यह स्वीकार करना चाहिए जिस तरह समाज में भ्रष्टाचार, परिवारवाद, अवसरवादिता और नैतिक पतन बढ़ा है, उसका शिकार समाजवादी नेता भी हुए हैं लेकिन उनकी संख्या कितनी यह अति महत्व का है. मुझसे जब कोई समाजवादी आंदोलन में उक्त विकृतियों को लेकर बात करता है तब मैं उससे नामों की गिनती करने को कहता हूं. आज तक किसी भी राजनैतिक विरोधी की गिनती 10 की संख्या तक भी नहीं पहुंची है, दूसरी तरफ़ गत 84 वर्षों में समाजवादी आंदोलन का नेतृत्व करने वाले हजारों नेता और कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने सब कुछ कुर्बान कर राजनीति की है. यानी समाजवादियों की जमात में विकृत कार्यकर्ताओं और नेताओं की संख्या 1 प्रतिशत भी नहीं निकलेगी. आज के दौर में जब राजनीति करने वाले मुख्य तौर पर सत्ता की दलाली में संलग्न हों, समाजवादियों के लिए यह गर्व का विषय होना चाहिए.

मुलताई किसान आंदोलन पर 12 जनवरी 1998 को हुए पुलिस गोलीचालन के बाद मुझ पर ढाई सौ किसानों के साथ दर्ज किये गये 67 प्रकरणों में से तीन प्रकरणों में 54 वर्ष की सज़ा होने के बाद जब मैं भोपाल जेल में था तब मैंने एक पत्र देशभर के समाजवादियों को भेजा था, जिसमें समाजवादी विचार के प्रचार-प्रसार के लिए देश भर के सभी ज़िलों में समाजवादी अध्ययन एवं शिक्षा केंद्र स्थापित करने का सुझाव दिया था. यह केंद्र स्थानीय समाजवादी नेता के नाम पर स्थापित किये जाने चाहिए थे, जिसमें स्थानीय स्तर से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के समाजवादी आंदोलनों संबंधी किताबें और दस्तावेज़ होने चाहिए थे.

इन केंद्रों को वाचनालय के साथ-साथ समाजवादी प्रशिक्षण केंद्र के तौर पर नये कार्यकर्ताओं को तैयार करने तथा समाज और देश को समाजवादियों के योगदान संबंधी जानकारी देने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए था. इस दिशा में जेल से छूटने के बाद मैं कुछ नहीं कर सका. इसका मुझे दुख है लेकिन यह मेरी इच्छा और स्वप्न है.

समाजवादियों का यह स्वीकार करना ज़रूरी है कि वर्तमान चुनौतियों का अकेले मुक़ाबला करने में संगठनात्मक दृष्टि से वे सक्षम नहीं हैं, इसलिए उन्हें गांधीवादियों, सर्वोदयों, अंबेडकरवादियों, वामपंथियों तथा किसान, मज़दूर, महिला, युवा और आदिवासी संगठनों के साथ मिलकर व्यापक मोर्चा बनाकर साझा संघर्ष करना तथा गठबंधन चलाने की आदत डालनी चाहिए. वाम मोर्चे ने 33 वर्ष तक बंगाल में सरकार चलाकर यह साबित किया है कि गठबंधन की सरकार न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर चलाई जा सकती है.

फिलहाल समाजवादियों का तात्कालिक उद्देश्य मोदी-संघ के उम्मीदवार के ख़िलाफ़ विपक्ष का एक उम्मीदवार खड़ा करना होना चाहिए. राष्ट्रीय जनता दल ने बिहार में तथा समजावादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में व्यापक विपक्षी गठबंधन बनाने का प्रयास तेज़ कर दिए हैं. उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाना ज़रूरी है. वरिष्ठ समाजवादी नेता शरद यादव जी 18 मई को नई पार्टी लोकतांत्रिक जनता दल का गठन करने जा रहे हैं. उन्होंने व्यापक विपक्षी एकता को ही अपना लक्ष्य बताया है. हम उम्मीद कर सकते हैं कि आने वाले समय में समाजवादी आंदोलन फिर मज़बूत होगा. उभरेगा तथा गत 84 वर्षो में हुई गलतियों को नहीं दोहराएगा.

(लेखक डॉ सुनीलम समाजवादी समागम के राष्ट्रीय संयोजक हैं.)

  

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...

Most Popular

To Top