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शाहिद अहमद: जब सब कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं…

अफ़रोज़ आलम साहिल, BeyondHeadlines

खुद पर यक़ीन हो तो हम कुछ भी कर सकते हैं. शाहिद को भी ये यक़ीन था कि जब सब कर सकते हैं, तो मैं भी कर सकता हूं. और आज शाहिद कामयाब हैं. इन्होंने इस बार यूपीएससी की सिविल सर्विस परीक्षा में 695 रैंक हासिल की है.

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के शाहिद अहमद के लिए ये कर पाना इतना आसान नहीं था. 2016 में अचानक वालिद का साया सर से उठ गया. ज़िम्मेदारियों का बोझ इन पर ही आ गिरा, बावजूद इसके शाहिद अपनी तैयारियों में लगे रहे और दूसरी कोशिश में ही कामयाब हुए. और अब तीसरी कोशिश में अपनी रैंक बेहतर करने की कोशिशों में लग चुके हैं. उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस बार अच्छे रैंक के साथ आईएएस बनेंगे.

शाहिद का परिवार पहले कानपुर के क़िदवई नगर में रहता था, लेकिन अब शिफ्ट होकर जाजनऊ इलाक़े में रहता है. इनके पिता हाजी जमील अहमद बिजनेसमैन थे. अम्मी बानो अहमद घर का काम संभालती हैं. 6 सदस्यों वाले परिवार में इनका नंबर 5वां है. इनसे बड़ी चार बहने हैं और सबसे छोटा एक भाई है.

शाहिद ने दसवीं व बारहवीं की पढ़ाई कानपुर के विरेन्द्र स्वरूप स्कूल से की है. फिर आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली आ गएं. 2015 में  दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफ़न कॉलेज से केमेस्ट्री ऑनर्स में बीएससी की डिग्री हासिल की. और अब डीयू से ही लॉ की पढ़ाई कर रहे हैं. फिलहाल बीए एलएलबी के सेकेन्ड ईयर में हैं.

शाहिद कहते हैं कि, जब मैं स्कूल में था, तब ही सोच लिया था कि सिविल सर्विस में जाना है. क्योंकि एडमिनिस्ट्रेटिव चीज़ें मुझे हमेशा से अच्छी लगती थीं. स्कूल में कैप्टन था. स्कूल की कई सारी चीज़ों को मैनेज करता था. तब ही मेरे टीचरों ने कहा कि तुम्हें सिविल सर्विस में जाना चाहिए. वहीं से इसके बारे में जानने की कोशिश की. इन्टरनेट पर इसके बारे में पढ़ा, फिर मैंने तय किया कि यही करना है.

शाहिद की पहली च्वाईस आईएएस बनना है, लेकिन उनका कहना है कि इस रैंक पर शायद ही आईएएस मिले. शायद मुझे इस बार आईआरएस दिया जाए. मैं अपना रैंक बेहतर करने के लिए फिर से एग्ज़ाम दे रहा हूं.

शाहिद ने बतौर सब्जेक्ट लॉ लिया था. उनका कहना है कि, क्योंकि मैं लॉ पढ़ भी रहा हूं. इससे बाक़ी पेपर्स में भी थोड़ी मदद मिल जाती है. इसलिए मुझे यही लेना बेहतर लगा.

अपनी तैयारी के बारे में शाहिद बताते है कि, 2016 में मैंने एक कोचिंग ज्वाईन की, लेकिन एक महीने में ही छोड़ दिया. मुझे नहीं लगा कि कोचिंग से कोई फ़ायदा होने वाला है. हमदर्द स्टडी सर्किल का टेस्ट दिया और सेलेक्ट हुआ. फिर यहीं रहकर मैंने खुद से पढ़ाई की. यहां मुझे अच्छे लोगों से मिलने का मौक़ा मिला. अच्छे लोगों से दोस्ती हुई. यहां का माहौल काफ़ी अच्छा है. 2017 में मैं जामिया मिल्लिया इस्लामिया आ गया. यहां भी काफ़ी गाईडेंस व मदद मिली.

सिविल सर्विस की चाहत रखने वालों से शाहिद कहते हैं कि, तैयारी शुरू करने से पहले सबसे ज़रूरी होता है कि सिलेबस और पिछले साल के प्रश्न-पत्र पर अच्छे से रिसर्च करके उसे समझा जाए. क्योंकि पढ़ने के लिए मैटेरियल बहुत ज़्यादा है. लेकिन हमें बहुत सोच समझ कर प्लानिंग के साथ सिलेबस के अनुसार पढ़ना होगा. एग्ज़ाम की डिमांड को समझना भी ज़रूरी है.

वो आगे कहते हैं कि, पढ़ने के साथ-साथ ये भी ज़रूरी है कि आपको लिखना आए. आपने जितना पढ़ा है, अगर उसे आप मेन्स पेपर में लिख नहीं पाए तो फिर कोई फ़ायदा नहीं है. आपका कुछ नहीं होने वाला.

शाहिद को क्रिकेट से काफ़ी दिलचस्पी है. साथ ही नॉन-फिक्शनल बुक्स भी आप खूब पढ़ते हैं. शाहिद का कहना है कि ये डायरेक्टली तो आपको एग्ज़ाम में मदद नहीं करेगा, लेकिन ये आपके पर्सनालिटी पर थोड़ा फ़र्क़ ज़रूर डालता है. ऐसे में ये इंटरव्यू के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है. हालांकि सबके लिए ये फ़ायदेमंद हो, ये ज़रूरी नहीं है. लेकिन इतना तो ज़रूर है कि इससे चीज़ों को देखने का नज़रिया बनता है.

अपने क़ौम के नौजवानों से शाहिद का कहना है कि, क्या कभी आपने सोचा कि हम सरकारी नौकरियों में कम क्यों हैं. खुद से सवाल कीजिए कि सिविल सर्विस में हमारा प्रतिशत कितना है. कभी हमने सोचा कि यहां जितने होने चाहिए, उतने नहीं हैं. आख़िर इसकी वजह क्या है. दरअसल, तालीम की कमी इसकी असल वजह है. जिस मज़हब में सबसे ज़्यादा तालीम की अहमियत पर ज़ोर दिया गया है, आज उसी क़ौम के लोग तालीम पर तवज्जो सबसे कम दे रहे हैं.

वो आगे कहते हैं कि, मेरे मां-बाप भी पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उन्होंने तालीम की अहमियत को समझा और सारे भाई-बहनों को पढ़ाया-लिखाया. ऐसे में ज़रूरी है कि तमाम मां-बाप अपने बच्चों की तालीम पर ख़ास तवज्जो दें. ख़ास तौर पर लड़कियों की पढ़ाई को लेकर ध्यान देने की ज़रूरत है. इनके अंदर पोटेंशियल बहुत है. बस इन्हें आगे बढ़ने दिया जाए. अगर आपने थोड़ा सा साथ दे दिया और उन्हें पढ़ने के लिए प्रमोट कर दिया तो आगे चलकर यही सबसे बेहतर करेंगी. 

नौजवानों से आगे कहते हैं कि, सबसे पहले आप खुद पर यक़ीन रखें कि जब सब कर सकते हैं तो हम भी कर सकते हैं. ये मत सोचिए कि ये बहुत मुश्किल इम्तिहान है. हम नहीं पढ़ पाएंगे. ये बात दिल-दिमाग़ से निकाल देना चाहिए.

आख़िर में शाहिद कहते हैं कि, मुझे हमेशा अफ़सोस रहता है कि काश मेरे अब्बू होते तो शायद इस कामयाबी पर खुश होते. उन्होंने बहुत संघर्ष करके मुझे पढ़ाया है. ज़िन्दगी भर मेरे दिल में ये कसक रहेगी कि काश अपने बेटे के इस काम को देख पाते या फिर मैं ही उनकी ज़िन्दगी के दौरान ये कामयाबी हासिल कर पाता.     

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