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‘उन्माद’ —गो-रक्षकों के सच को बेपर्दा करती एक शानदार फ़िल्म

अफ़रोज़ आलम साहिल, BeyondHeadlines

फ़िल्म समाज का आईना होती है. आज जब हमारा मुल्क हिन्दुस्तान ‘लिंचिस्तान’ बनता जा रहा है तो आख़िर क़लमकारों, फ़िल्मकारों और फनकारों का जत्था ख़ामोश तो नहीं बैठ सकता. समाज में जो कुछ हो रहा है, उन घटनाओं को लेकर एक न एक दिन सामने आएगा ही. इसी कड़ी में एक फ़िल्म ‘उन्माद’ शाहिद कबीर लेकर आ रहे हैं.

इस फ़िल्म के लेखक और निर्देशक शाहिद कबीर BeyondHeadlines से बात करते हुए बताते हैं कि, ये फ़िल्म मुल्क के ताज़ा राजनीतिक हालात पर है. कहीं गाय के नाम पर लोगों को पकड़ कर मार दिया जा रहा है तो कहीं लव-जिहाद के नाम पर मारपीट या कहीं योगी के ज़रिए बनाई गई एंटी रोमियो स्क्वायड की धांधली. इन तमाम मुद्दों को इस फ़िल्म में हमने दिखाने की कोशिश की है.

2 घंटे 07 मिनट की ये फ़ीचर फ़िल्म पब्लिक फंडिंग से बनाई गई है. इस फ़िल्म में सारे कलाकार नए हैं और थिएटर से जुड़े हुए हैं. नामचीन कलाकारों को न लेने का एक कारण इस फ़िल्म के निर्देशक ये बताते हैं कि ‘यक़ीनन नामचीन नामों से फ़िल्म का प्रचार-प्रसार खूब हो जाता है, लेकिन एक नुक़सान ये भी है कि लोगों का सारा ध्यान फ़िल्म के मुद्दों से हटकर कलाकारों पर चला जाता है. लेकिन हम चाहते हैं कि लोग इस फ़िल्म के मुद्दे को देखे और सोचें.’

शाहिद कबीर BeyondHeadlines के साथ ख़ास बातचीत में कहते हैं कि, इस फ़िल्म में ये भी दिखाया गया है कि कैसे गो-रक्षा के नाम पर तथाकथित गो-रक्षकों ने अपनी गोशालाएं खोल ली और खुद सप्लायर हो गएं. कैसे गाय की आड़ में हिन्दू-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण कर रहे हैं. कैसे मीडिया में किसानों व मज़दूरों के हालात और बेरोज़गारी जैसे असल मुद्दे ग़ायब हैं. इस फ़िल्म में हमने ये भी दिखाया है कि कैसे देश में बेरोज़गारी बढ़ने की वजह से आपस में लोगों के संबंध ख़राब हो रहे हैं.

शाहिद कबीर कहते हैं कि, कौन क्या खाएगा? क्या पिएगा? क्या पहनेगा? ये आदमी खुद तय करेगा न कि सरकार. सवाल ये नहीं है कि गाय कटेंगी या नहीं? सवाल ये है कि क्या आम आदमी गाय से ज़्यादा बदतर हो गया. इंसान की कोई वैल्यू है या नहीं? और इंसान की वैल्यू है तो धर्म तो बाद में आता है. चाहे मुल्क में किसी भी विचारधारा की सरकार हो. अगर आप कोई क़ानून बना रहे हैं, तो ये ख़्याल तो रखना पड़ेगा कि क़ानून इंसानों की हिफ़ाज़त के लिए बनते हैं. लेकिन अगर इंसानों की हिफ़ाज़त नहीं हो पा रही है तो क़ानून में संशोधन तो करना पड़ेगा. अगर तंत्र भी तमाम चीज़ों को धार्मिक नज़रिए से देखने लगेगा तो बड़ी दिक्कतें पैदा होंगी. मुल्क की तरक़्क़ी फिर बहुत मुश्किल है.

शाहिद कबीर का कहना है कि —ये धार्मिक उन्माद फैलाने वाले मुट्ठी भर लोग होते हैं. सच पूछे तो इन्हें धर्म का मतलब ही नहीं पता. ये धर्म की आड़ में अधर्म कर रहे हैं. ये नहीं होना चाहिए.

फ़िल्म के बारे में और बात करते हुए बताते हैं कि, फ़िल्म में मेरी कोशिश रही है कि मुद्दों पर तो बात हो ही, लेकिन साथ ही हिंसा व तनाव उभारने के बजाए ख़ूबसूरत प्रेम कहानी को भी दिखाया जाए ताकि दर्शक जब सिनेमाघरों से बाहर निकलें तो उनके ज़ेहन में फ़िल्म देखने से पैदा हुई कड़वाहट के बजाए प्यार के ख़ूबसूरत अहसास की मिठास तारी रहे. इसीलिए फ़िल्म में गाने भी हैं और बाज़ार की ज़रूरत के मुताबिक़ आईटम सांग भी मौजूद है. 

बता दें कि इस फ़िल्म की पूरी पटकथा उत्तर प्रेदश के इर्द-गिर्द लिखी गई है. निर्देशक शाहिद कबीर भी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के रहने वाले हैं. इन्होंने अपनी शुरूआती तालीम सहारनपुर के ‘मदरसा मज़ाहिर उलूम’ में हासिल की है. मदरसे से पढ़ने के बावजूद फ़िल्मों से ख़ास लगाव रहा, और इसी लगाव ने इन्हें दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया खींच लाया. यहां इन्होंने माॅस कम्यूनिकेशन में मास्टर की डिग्री हासिल की. लंबे समय तक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में इप्टा की कमान संभाले रहे. फिर मुंबई में ‘उमराव जान’ जैसी फ़िल्म बनाने वाले प्रसिद्ध निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली के साथ काम किया. फ़िल्म सड्डा-अड्डा में आप अभिनय भी कर चुके हैं.

शाहिद कबीर का मानना है कि फ़िल्म समाज का आईना होती है. इसलिए मनोरंजन के साथ-साथ संदेश भी ज़रूरी है. ख़ास तौर पर यूपी चुनाव के बाद मुल्क में जो हालात बने हैं, ऐसे हालात में ऐसी फ़िल्मों का आना बहुत ही ज़रूरी है.

अब देखना ज़रूरी होगा कि शाहिद कबीर और उनकी ये फ़िल्म मुल्क के इस ताज़ा हालात में दर्शकों के ज़ेहन पर क्या छाप छोड़ती है और उनकी अपेक्षाओं पर कितनी खरी उतरती है.

ये फ़िल्म आगामी 10 अगस्त को सिनेपोलिस के सहयोग से पूरे देश के सिनेमाघरों में एक साथ रिलीज़ होगी.

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