Mango Man

नशे के ख़िलाफ़ जागरूक हो रहा है समाज

By Mohammad Anisur Rahman Khan

दिल्ली एयरपोर्ट से घर जाने के लिए कार में बैठा. आदत के अनुसार बैठते ही सीट बेल्ट लगा लिया. लेकिन चालक बिना बेल्ट के वाहन दौड़ाता रहा.

सड़क किनारे जैसे ही कुछ ट्रैफिक पुलिसकर्मी दिखे, चालक ने झट से बेल्ट खींचकर यह दिखाने की कोशिश की कि मैं बेल्ट लगाए हुआ हूं. मगर वास्तव में उसने बेल्ट लगाया ही नहीं था.

यह देखते हुए मैंने मुस्कुराकर कहा कि आज तक मैंने दिल्ली में किसी चालक को बिना बेल्ट लगाए वाहन चलाते नहीं देखा. ड्राइवर ने उत्तर देते हुए कहा कि “सर जी! मेरा लीवर ख़राब हो गया है, बेल्ट लगाने से दर्द होता है. मुझे रात में नींद नहीं आती, इसलिए 12 से 15 घंटे वाहन चलाता हूं.”

आगे अपनी बातों को जारी रखते हुए कहता है, मैंने अपना जीवन शराब पीकर बर्बाद कर लिया है. अब मैं केवल मौत की प्रतीक्षा कर रहा हूं. शराब का मै इतना आदी था कि जब मेरे मित्रों को शराब कहीं नहीं मिलती तो वह मेरे पास आते और मैं जहां हाथ मारता वहां से शराब की बोतल मिल जाती थी. चाहे वह कार हो या घर अथवा दुकान.

उसके बारे में पूछने पर वो बताता है कि, मेरा नाम नरेश कुमार है. दिल्ली के लक्ष्मी नगर के पास गीता कॉलोनी में रहता हूं. मेरी दवा की एक अच्छी ख़ासी दुकान थी. दोस्तों की संगत ने न केवल मुझे शराबी बनाया, बल्कि जुआरी भी बना डाला. लगभग दो करोड़ की संपत्ति नष्ट करने, अपनी पत्नी और एक जवान बेटा खोकर अब दूसरे की गाड़ी चला रहा हूं.

बता दें कि शराब से स्वास्थ्य पर होने वाले प्रभाव की समीक्षा करने वाली संस्था “द ग्लोबल इन्फोर्मेशन सिस्टम ऑन अल्कोहल एंड हेल्थ” के अनुसार हर साल अल्कोहल के उपयोग से मरने वालों की संख्या लगभग पच्चीस लाख है, जबकि साठ प्रकार के विभिन्न रोगों को उभारने में शराब अहम रोल अदा करता है. यहां तक कि शराबियों के आसपास रहने वाले लोगों का स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है.

एक आंकड़े के अनुसार वर्ष 2005 में विश्व स्तर पर पंद्रह या उससे अधिक उम्र के लोगों ने प्रति व्यक्ति 6.13 लीटर अल्कोहल का इस्तेमाल किया था. (उल्लेखनीय है कि अल्कोहल वह पदार्थ है जिससे शराब और अन्य नशीले पदार्थ बनाए जाते हैं) जबकि एक अपंजीकृत आंकड़े के अनुसार वैश्विक स्तर पर लगभग 30% लोगों ने इसका इस्तेमाल किया था.

“अल्कोहल वेब इंडिया डॉट इन” की एक रिपोर्ट कहती है कि अल्कोहल के सेवन से 20% से 50% किडनी रोग, मिर्गी, सड़क दुर्घटना, हिंसा और कई अन्य समस्याएं उत्पन्न होती हैं.

ऐसी ही समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य के बाद सतत विकास लक्ष्य में भी नशे के ख़िलाफ़ जागरूकता और स्वस्थ्य जीवन को बढ़ावा देने के उद्देश्यों को शामिल किया गया है. जिसमें 17 बड़े विकास लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं. जिसके लक्ष्य 3 में हर उम्र के लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल और स्वस्थ जीवन को बढ़ावा देने का संकल्प दोहराया गया है. इसके तहत वर्ष 2030 तक नशीले पदार्थों की रोकथाम और नशीली दवाओं के अनुचित और अत्यधिक उपयोग एवं शराब पर काबू पाने की कोशिश की चर्चा की गई है.

इसी का नतीजा है कि बिहार, गुजरात और मणिपुर जैसे राज्यों में आधिकारिक तौर पर शराब बेचने और पीने पर पाबंदी है, लेकिन अधिकांश राज्यों में अभी भी क़ानूनी तौर पर इसकी बिक्री जारी है. जिसका परिणाम यह है कि हमारे देश में 62.5 मिलियन लोग ऐसे हैं जिन्होंने कम से कम किसी न किसी अवसर पर नशीले पदार्थों का उपयोग किया है.

दूसरी ओर यह भी तथ्य सामने आया है कि कई पश्चिमी देशों के विपरीत हमारे देश में शराब की खपत में नाटकीय ढंग से वृद्धि हुई है.

उदाहरण के लिए 1970 से 1995 के बीच आबादी के अनुपात में अल्कोहल का प्रयोग करने वाले प्रति व्यक्ति 106.7 फीसदी वृद्धि हुई है. इसके पीछे भी एक ख़ास वजह यह है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नशीले पदार्थों के व्यापारियों के लिए हमारा देश तीसरा सबसे बड़ा मार्किट है. 

इतना ही नहीं बल्कि भारत भी ड्रग पैदा करने वाले देशों में से एक बड़ा देश बन गया है. यह दक्षिण पूर्वी एशिया में 65 प्रतिशत नशीले पदार्थ पैदा करता है. इसी का प्रभाव है कि हमारे शहरी क्षेत्रों में हाल के वर्षों में बार और नाइट क्लबों की संख्या में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई है.

आंकड़े बताते हैं कि भारत में 80 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जो अत्यधिक नशीली वस्तुओं का उपयोग करते हैं, जबकि 20 प्रतिशत ऐसे लोग हैं, जिन्होंने कम से कम एक बार नशा ज़रूर किया है.

पिछले दो दशकों में ड्रग का उपयोग करने वालों की संख्या 300 में से एक थी, जो अब बढ़कर 20 में से एक हो गई है. कम उम्र में शराब और ड्रग्स का उपयोग भारत के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है. हालांकि कुछ राज्यों ने अपने अपने हिसाब से आयु की क़ैद ज़रूर लगा रखी है जो 18 से 27 वर्ष के बीच है, लेकिन उम्र से पहले शराब का सेवन आम बात हो गई है.

इसका एक उदाहरण ओडिशा के कटक ज़िला अंतर्गत बानकीदंपोरा ब्लॉक स्थित नवाआशि गांव के निवासी प्रताप कुमार बैरा की है. उसके अनुसार “जब मैं स्कूल में था तब से ही दोस्तों के साथ गुटखा खाना शुरू किया और बहुत ही कम उम्र में शराब का भी आदी हो गया, परिणामस्वरूप बीच में ही स्कूल छोड़ दिया और अपने पिता के साथ काम पर लग गया. जिसमें 500 से 1000 रुपये प्रतिदिन कमाता था. धीरे-धीरे कमाई बढ़ी तो शौक़ भी बढ़ने लगा. शौक़ ने शराब का पूरी तरह से आदी बना दिया. यहां तक कि मैं महंगे विदेशी ब्रांडेड शराब सेवन करने लगा था, जिसमें लगभग 2000 रुपये प्रतिदिन खर्च करता था. शराब ने मेरी सेहत को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया था. अब जब मेरी जान के लाले पड़ गए हैं तो मैंने इससे तौबा कर ली है.”

संभलपुर ज़िले के लरियापली गांव के 44 वर्षीय सरपंच शकरोकखजूर के अनुसार “हमारी पंचायत में तीन साल पहले तक 90 प्रतिशत लोग शराब और अन्य नशा करने के आदी थे, जिनमें स्कूल जाने वाले 8-10 साल के बच्चे भी शामिल थे, लेकिन गाँव वालों के प्रयासों से अब यह संख्या घटकर लगभग 70 प्रतिशत रह गई है. हमारी कोशिश जारी है. पंचायत की महिलाएं भी नारी शक्ति संघ नामक एक संगठन बनाकर इस समस्या पर अच्छा काम कर रही हैं.”

नारी शक्ति संघ की अध्यक्ष और पंचायत की उप सरपंच हमादरी धोरवा कहती हैं कि “गांव के अन्य पुरुषों की तरह मेरे पति भी शराब पीते थे, जिसके कारण हमारे घरेलू हालात बद से बदतर हो गए थे, यही हाल हमारी सहेलियों के घरों का भी था. इसलिए हमने यह फ़ैसला लिया कि गांव में शराब की भट्टी बंद करवाना है. हमारे साथ और भी महिलाएं आ गई, हम लोगों ने खूब हंगामा किया, जिसके लिए हमारे पति ने हमें पीटा भी.

कुछ दिनों के लिए हम लोग चुप हो गए. मगर हमारा संगठन बनने के बाद हम लोगों ने यह फैसला किया कि गांव में यदि कोई पुरुष या महिला शराब पीकर गाली गलौज करता है तो उस पर पहली बार एक हज़ार का जुर्माना लगाया जाएगा. अगर दूसरी बार भी पकड़ा गया तो जुर्माने की राशि बढ़कर दो हज़ार हो जाएगी. ऐसे ही शराब की भट्टी वालों के लिए भी एक क़ानून बनाया कि अगर गांव में शराब बनाते हुए पकड़ा तो पहली बार पांच हज़ार का जर्माना होगा और यदि दूसरी बार भी पकड़े गए तो जुर्माना की राशि दस हज़ार रुपये होगी.

जुर्माना वसूला गया और लगभग एक लाख रुपये एकत्रित किए गए, जो सार्वजनिक समारोह के लिए इस्तेमाल होने वाली गांव की चौपाल के सौंदर्यीकरण के लिए इसी राशि से पत्थर लगवाए गए हैं. इसका दूसरा लाभ यह हुआ कि हमारे गांव में शराब की भट्टियां बंद हो चुकी हैं. अब लोगों के घर आराम से चल रहे हैं. अब बच्चे नशा छोड़कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे रहे हैं. गाँव वालों की इस सफल मुहिम से साबित होता है कि नशे के ख़िलाफ़ अब समाज जागरूक हो रहा. (चरख़ा फ़ीचर्स)

(लेखक मोहम्मद अनीस उर रहमान खान चरखा फीचर्स के एडिटर हैं. इनसे [email protected] पर सम्पर्क किया जा सकता है.)

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