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सीबीआई अपने सबसे ख़राब दौर से गुज़र रही है…

By Abhishek Upadhyay

सीबीआई अपने सबसे ख़राब दौर से गुज़र रही है. किसी वकील को चाहिए कि वह एक पीआईएल दाख़िल करे और पिछले दो साल में सीबीआई द्वारा दर्ज किए गए हर अहम मामले की न्यायिक जांच की मांग करे. इस एजेंसी में करप्शन इस वक़्त सतह पर तैर रहा है.

ये बात हम नहीं, खुद सीबीआई कह रही है. ये उसके अपने टॉप ऑफ़िसर्स के बयान हैं. सीबीआई में नंबर दो की पोज़ीशन संभाल रहे गुजरात काडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ 2 करोड़ रुपए की रिश्वत का मामला दर्ज किया गया है.

अभूतपूर्व स्थिति ये है कि यह मामला खुद सीबीआई के मुखिया आलोक वर्मा की पहल पर दर्ज किया गया है. राकेश अस्थाना पर इससे पहले भी क़रीब आधा दर्जन मामलों में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच चल रही है. यह जांच भी किसी और ने नहीं बल्कि खुद सीबीआई ने खोली है.

अस्थाना इससे पहले सूरत के संदेसरा ग्रुप से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में भी जांच के दायरे में हैं. वे सूरत के पुलिस कमिश्नर भी रह चुके हैं और सरकार के बेहद क़रीबी बताए जाते हैं. उधर अस्थाना ने भी पलटवार करते हाउस कैबिनेट सेक्रेटरी को चिट्ठी लिखकर सीबीआई के मुखिया आलोक वर्मा के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों की झड़ी लगा दी है.

मगर सबसे अहम बात है वे सबूत जो सीबीआई ने अपने स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ जुटाए हैं. मोईन क़ुरैशी नाम के मीट कारोबारी के अवैध लेन-देन को सेटल करने के मामले में अस्थाना पर बिचौलियों के ज़रिए 2 करोड़ की रिश्वत उठाने का आरोप है.

सीबीआई के पास अपने ही स्पेशल डायरेक्टर के ख़िलाफ़ सबूत के तौर पर टेलीफ़ोन पर हुई बातचीत के रिकॉर्ड हैं. वाट्सएप्प मैसेज़ के स्क्रीन शॉट्स हैं. रिश्वत की रक़म की पूरी मनी ट्रेल है. और इतना ही नहीं, इस मामले में शिकायत करने वाले सतीश सना नाम के व्यापारी का सेक्शन 164 के तहत अदालत में दिया बयान भी है.

सीबीआई इसी मामले में मनोज प्रसाद और सोमेश श्रीवास्तव नाम के दो दलालों को अरेस्ट भी कर चुकी है. रॉ का एक बड़ा अधिकारी भी जांच के दायरे में है.

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अपनी ही एजेंसी के शिकंजे में आए सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना एक से बढ़कर एक हाई प्रोफ़ाइल मामलों की जांच कर रहे हैं. इनमें मोईन क़ुरैशी का केस तो है ही साथ में नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के मामले भी हैं. विजय माल्या का केस भी उन्हीं के पास है.

अब सोचिए कि ऐसी सीबीआई आख़िर किसके हित में काम कर रही है? देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के भीतर की ये सड़न इस बात का इशारा करती है कि कितने ही मामले कमप्रोमाइज़ हो सकते हैं या हो चुके होंगे! कितने ही मामलों में राष्ट्रीय हित से खिलवाड़ हो सकता है या हो चुका होगा! जब जांच करने वाले अधिकारियों पर ही इतने गंभीर आरोप हो तो भला ऐसी एजेंसी पर कौन भरोसा कर सकता है!

प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस के ज़माने की सीबीआई को जमकर कोसते आए हैं, मगर यह उनके दौर की सीबीआई है जिसके अपने फोड़े से मवाद फूट-फूट कर बह रहा है. कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए, अगर इतिहास इस सीबीआई को अपने दौर की सबसे दागी सीबीआई के तौर पर याद करे!

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