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क्या ‘ट्रैफिकिंग ऑफ़ पर्सन्स (प्रिवेंशन, प्रोटेक्शन एंड रिहैबिलिटेशन) बिल 2018’ शीतकालीन सत्र में राज्यसभा से पारित हो सकेगा?

BeyondHeadlines News Desk

नई दिल्ली: नोबेल पुरस्कार से सम्मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी को संसद के शीतकालीन सत्र का बेसब्री से इंतज़ार है. उन्हें उम्मीद है कि ‘ट्रैफिकिंग ऑफ़ पर्सन्स (प्रिवेंशन, प्रोटेक्शन एंड रिहैबिलिटेशन) बिल 2018’ राज्यसभा में पास होकर क़ानून का रूप ले लेगा.

बता दें कि ये बिल इसी साल 26 जुलाई को मौनसून सत्र में पारित किया जा चुका है. अब इसे राज्यसभा में पेश किया जाएगा. उम्मीद की जा रही है कि इसके पारित होते ही देश में बच्चों की तस्करी के ख़िलाफ़ भी एक मज़बूत क़ानून बन जाएगा.

दरअसल, कैलाश सत्यार्थी और उनका संगठन बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) तक़रीबन चालीस साल से बाल तस्करी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत क़ानून बनाने की मांग करता आ रहा है. पिछले साल इस मांग को लेकर सत्यार्थी ने देशव्यापी भारत यात्रा का आयोजन कर खुद सड़कों पर उतरे. 11 सितंबर, 2017 को कन्याकुमारी से शुरू हुई उनकी यात्रा 35 दिन में 12 हज़ार किलोमीटर की दूरी तय कर 23 राज्यों से गुज़री. इनकी संस्था का दावा है कि इस यात्रा में 12 लाख लोग सत्यार्थी के साथ सड़कों पर उतर कर मार्च किया था.

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस भारत यात्रा को अपना समर्थन दिया था. इस यात्रा का समापन राष्ट्रपति भवन में रामनाथ कोविंद की उपस्थिति में संपन्न हुआ. इसी का नतीजा माना जाता है कि 28 फ़रवरी, 2018 को कैबिनेट ने इस बिल को मंज़ूरी दी.

कैलाश सत्यार्थी कहते हैं कि इस प्रस्तावित क़ानून से दुनिया भर में भारत की छवि निखरेगी और देश में मनुष्य ख़ासकर बच्चों की तस्करी के धंधे की कमर टूट जाएगी. यह क़ाननू दुनिया के सबसे अच्छे क़ानूनों में से एक होगा. शायद दुनिया का सबसे अच्छे क़ानून होगा. इस क़ानून के अमल में आने के बाद सभी तरह की तस्करी पर अंकुश लग जाएगा.

बता दें कि बंधुआ मज़दूरी, सरोगेसी, बाल मज़दूरी और बच्चों के अधिकारों के लिए ये बिल काफ़ी अहम है. जहां ये बिल बाक़ी लोगों के लिए फ़ायदेमंद हैं वहीं सेक्स वर्कर्स के लिए ये एक बड़ी समस्या लेकर आ सकता है. इस बिल का असर उनके काम पर भी पड़ सकता है.

ग़ौरतलब रहे कि दक्षिण एशिया को ट्रैफिकिंग का गढ़ माना जाता है. नेपाल और बंग्लादेश के हज़ारों बच्चों को बाल मज़दूरी, वेश्यावृत्ति आदि के लिए भारत लाकर खरीदा-बेचा जाता है. क़रीब दो दशक पहले सर्कस में काम कराने के लिए बड़े पैमाने पर नेपाल की बच्चियों को ट्रैफिक कर भारत लाया जाता था. फिर उन्हें बंधक बनाकर न केवल उनसे सर्कस में ख़तरनाक काम कराया जाता था, बल्कि मालिक उनसे वेश्यावृत्ति भी कराता था. बीबीए ने इसके ख़िलाफ़ आंदोलन चलाया और छापामारी अभियान के तहत देशभर से ट्रैफिकिंग की शिकार सैकड़ों लड़कियों को छुड़ाकर नेपाल भेजकर, उन्हें उनके मां बाप से मिलवाया. अब बीबीए को उम्मीद है कि इस शीतकालीन सत्र में उनकी संस्था को अब तक सबसे बड़ी कामयाबी मिलने जा रही है.

अब देखना दिलचस्प होगा कि इस बिल को लेकर राज्यसभा नेताओं का क्या रवैया सामने आता है. क्योंकि कांग्रेस सांसद थरूर का कहना है कि सेक्स वर्कर्स को इस बिल में निशाना बनाया गया है जो कि मजबूरी में इस काम में लगी हुई हैं. बिल में उनकी सुरक्षा के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है.

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