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काश! हवा का एक झोंका इसे उड़ा ले जाता…

Meraj Ahmad for BeyondHeadlines

मेनस्ट्रीम की सियासत करने वालों ने हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब को कितना सजाया-संवारा है? ग़ौर से देखिये तो ऐसा लगता है कि मानो तहज़ीब के खू़न से सियासी फ़सल उगा ली गई हो. अफ़ीम की चाश्नी अब तहज़ीब और मज़हब में फ़र्क़ नहीं करने देती.

ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ जब जुम्मन मियां और शंकर लाल साथ उठा-बैठा करते, लेकिन हिन्दू या मुसलमान बनकर अपनी पहचाने अलग नहीं रखते. बस एक तहज़ीबी रिश्ता हुआ करता था. एक दूसरे की हौसला अफ़ज़ाई करते नहीं थकते और तो और तीज-त्यौहार में न सिर्फ़ शरीक होते बल्कि बढ़ चढ़कर हिस्सा भी लेते. ऐसी एक मिसाल नहीं हैं. हर गली-मोहल्ले का यही हाल था.

गाँव देहात में यही देखते हुए हम बड़े हुए और लखनऊ आ गए. वहां गंगा-जमुनी तहज़ीब को ग़ौर से समझने की कोशिश किया. अक्सर महफ़िलो में बड़े-बूढ़े तहज़ीब पर बहस-मोबाहिस करते-करते अपनी आँखें नम कर लिया करते. हम बस यही सोचकर फ़िक्र-ओ-ख़्याल में मशगूल हो जाते कि काश उस दौर का कुछ टुकड़ा हमारे नसीब में भी आ जाता. घर के पास की एक मस्जिद के नीचे की मज़ार के ठीक बग़ल में मूंगफली की एक रेहड़ी लगती थी. वहां बैठे चाचा से हमें बड़ा अपनापन था. वैसे तो हमने कभी उनका नाम नहीं पूछा था लेकिन पहनावे और बातचीत से उनका ‘दीन’ समझ पाना लगभग नामुमकिन था.

अचानक एक दिन नाम पूछ ही लिया. जवाब मिला- रमा शंकर! उस दिन शायद पहली बार गंगा-जमुनी तहज़ीब से हमारा वास्ता हुआ. लगा कुछ तबर्रुख हमारे हिस्से में भी आ गया. ये जगह आज भी रमा शंकर के ही नाम है. ईद और दीवाली के खास मौक़ों पर कविता और मुशायरे की गोष्ठियों में सिमट कर रह जाने वाली गंगा-जमुनी तहज़ीब अब महज़ सियासी दिखावे से ज़्यादा क्या है? दंगे की तहज़ीब ने हमारी मिली-जुली तहज़ीब के बदन पर बड़े गहरे-गहरे ज़ख्म किए हैं, लेकिन आज भी जान बाक़ी है. ज़ेहन के मिम्बर पर फ़िरक़ा-परस्ती की जमती हुई धूल की एक मैली सी चादर अब बर्दाश्त नहीं होती. काश हवा का एक झोंका इसे उड़ा ले जाता…

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