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एक पुरानी रिवायत जिससे जामिया बिरादरी इस बार महरूम रह गई…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published October 29, 2018 31 Views
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4 Min Read
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अफ़रोज़ आलम साहिल, BeyondHeadlines

जामिया की एक पुरानी रिवायत रही है जिसे हर साल “यौम-ए-तासीस” पर आयोजित किया जाता रहा है. इस मौक़े पर 10-15 दिन पहले ही जामिया का माहौल पूरी तरह से बदल जाता है.

इस बारे में मुजीब साहब ने एक जगह लिखा है —“इन तारीखों में और इससे 10-15 दिन पहले पूरे जामिया में सरगर्मी, तैयारी और मंसूबाबंदी का माहौल रहा. मेले से पूर्व हर विभाग अपने अपने कामों को मंज़र-ए-आम पर लाने के लिए बेताब थे. तरह-तरह के विज्ञापन बन रहे थे, कमरों में नुमाइश के लिए सामान सजाया जा रहा था, यानी जामिया बिरादरी का हर शख़्स किसी न किसी काम को अपने ज़िम्मे लेकर दिन रात इसी फ़िक्र में डूबा रहता. ड्रामों का अभ्यास, संगीत के सुर और खेलकुद के आईटमों के अभ्यास में तेज़ी आ गई थी. ऐसा प्रतीत होता था कि क़ुदरत ने मदद की गरज़ से नींद का क़ानून रात के लिए वापस ले लिया हो. रात गुज़री, सुबह हुई और मेले का बाज़ार गरम हुआ.”

जामिया में यह माहौल मैंने हमेशा से देखा है. हां, नजीब जंग के वाईस चांसलर रहते इस परम्परा पर विराम ज़रूर लगा था, लेकिन उसके बाद के वाईस चांसलर ने इस परंपरा का आगाज़ फिर से ज़रूर कर दिया. लेकिन इस बार फिर इस परंपरा पर चोट की गई है. इस साल इस “तालीमी मेला” से जामिया बिरादरी महरूम रह गई.

हालांकि बावजूद इसके पूरी जामिया बिरादरी अपने मादरे-इल्मी के 98वें ‘यौम-ए-तासीस’ यानी फाउंडेशन डे पर सोशल मीडिया पर खुशी का इज़हार करते नज़र आ रही है. हालांकि जामिया में पढ़ रहे कुछ छात्रों में थोड़ी सी मायूसी ज़रूर है, क्योंकि ‘तालीमी मेला’ से वो महरूम जो रह गए.

जामिया के इस “तालीमी मेला” का ख़ास मक़सद कम्यूनिटी को जामिया के साथ जोड़कर चलना रहा है. यक़ीनन जामिया बिरादरी को ऐसे मौक़ों पर इस इदारे के मक़सद और उसके हसूल के साथ 98 साल के उस सफ़र को भी याद करना चाहिए. इस बात को भी हमेशा याद रखा जाना चाहिए कि कैसे बानियान-ए-जामिया और मुहिब्ब-ए-जामिया ने मुश्किल से मुश्किल हालात में इस शमा को जलाए रखा. मुल्क के ताज़ा हालात में जामिया को एक बार फिर से उसी ‘ख़िलाफ़त आन्दोलन’ की शुरूआत करने की ज़रूरत है, जिसकी ज़रूरत कभी मौलाना मुहम्मद अली जौहर व गांधी जी ने महसूस की थी.

बता दें कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया सिर्फ़ एक शैक्षिक संस्थान ही नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक भी है. यह उन सरफ़िरों का दयार है जिनकी मेहनत ने अविभाजित भारत को गरमाहट और उर्जा प्रदान की और अपने खून से सींचकर जामिया की पथरीली ज़मीन को हमवार किया. जामिया के दरो-दीवार आज भी उनकी यादों को संजोए हुए हैं और उज्जवल भविष्य के लिए खेमाज़न होने वाले उन दीवानों को जिन्होंने अपने मुक़द्दर को जामिया के लिए समर्पित कर दिया, ढूंढ रहे हैं. भाईचारा, मुहब्बत, इंसानियत दोस्ती के उन मतवालों के सामने देश की एकता एवं विकास सर्वोपरि था, ताकि सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक के साथ-साथ राजनीतिक स्तर पर समाज को जागरूक किया जा सके.

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