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Reading: साम्प्रदायिक सौहार्द की ज़िन्दा मिसाल है जामिया नगर की ये रामलीला
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साम्प्रदायिक सौहार्द की ज़िन्दा मिसाल है जामिया नगर की ये रामलीला

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published October 13, 2018 15 Views
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4 Min Read
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Anzar Afaque for BeyondHeadlines

देश में रामलीला की परंपरा भले ही धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है, लेकिन राजधानी दिल्ली में जामिया नगर के मुसलमानों ने इस परंपरा को अब भी बरक़रार रखा है.

जामिया नगर का ये रामलीला पूरे देश के लिए आकर्षण का केन्द्र है.  गंगा-जमुनी तहज़ीब के साथ-साथ साम्प्रदायिक सौहार्द की ज़िन्दा मिसाल है. यहां ये परंपरा 1975 से जारी है. बीच में यहां के हिन्दुओं ने इसे बंद कर देने की सोची, लेकिन यहां के मुसलमानों ने तय किया कि हम इस परंपरा को कभी बंद होने नहीं देंगे.

रामलीला कमिटी के सचिव हेतराम BeyondHeadlines के साथ  बातचीत में बताते हैं कि, इस समय हमारी रामलीला कमिटी में 50 सदस्य हैं, जिसमें 30 मुस्लिम हैं. सच तो ये है कि इन्हीं लोगों की वजह से यह परंपरा आज भी ज़िन्दा है और हम उम्मीद करते हैं कि यह परंपरा आगे भी यही लोग ज़िन्दा रखेंगें. उन्होंने यह भी बताया कि उनसे पहले इस कमिटी के सचिव ज़ुलकरनैन रिज़वी थे.

बता दें कि जामिया नगर में 98 फ़ीसद से अधिक मुसलमान आबादी बसती है. बावजूद इसके 1975 से चली आ रही रामलीला की परंपरा यहां अब भी जारी है. हालात बदले, रामलीला करने वाले कलाकार बदले, फिर कुछ कलाकार वक़्त के साथ गायब होते गए. और फिर यहां कलाकारों का संकट खड़ा हुआ. लेकिन यहां के लोगों को इस परंपरा को हमेशा ज़िन्दा रखना था, तो बस अब यहां की रामलीला डिजीटल हो गई. 2001 से ये डिजिटल रामलीला बिना किसी रूकावट के जारी है.

हेतराम बताते हैं कि साल 2000 तक यहां हिन्दू-मुस्लिम कलाकार मिलकर रामलीला करते थे. लेकिन कुछ कलाकार अचानक से बाहर चले गए और कुछ की उम्र साथ नहीं दे रही थी. दूसरी तरफ़ इतने व्यस्त लाईफ़ स्टाईल में हमारी प्रैक्टिस नहीं हो पा रही थी. ये ऐसा वक़्त था कि हम इस परंपरा को बंद करने की सोचने लगे, लेकिन इलाक़े के मुस्लिम लोगों ने कहा कि यह परंपरा क़ायम रहनी चाहिए. इसका रास्ता हमने डिजीटल रामलीला के ज़रिए निकाला.

इस रामलीला कमिटी के उपाध्यक्ष उस्मान ख़ान उर्फ़ सलीम कहते हैं कि, रामलीला में जोड़ने का संदेश दिया जाता है. बुराई पर अच्छाई के जीत की बात की जाती है. ये सच्ची व नेक राह पर चलने की बात करती है. जिस मजहब से हम ताल्लुक़ रखते हैं वह भी यही कहता है. हमारा मज़हब यह भी कहता है कि जितना आप अपने मज़हब से प्यार करते हैं, उतना ही दूसरों से भी करना चाहिए. बस हम वही कर रहे हैं. जिन्हें हिन्दू-मुसलमान करना है, वो करते रहें, हमें इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है.

कमेटी के कोषाध्यक्ष नरेश कुमार का कहना है कि यह कमेटी सभी मिलकर चलाते हैं तो ऐसे में क्या हिन्दू, क्या मुसलमान? और हां, आपको मैं बता दूं कि इस रामलीला को देखने वालों में भी 90 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की ही होती है. दो-तीन दिनों के बाद इस रामलीला मैदान में लोगों को बैठने की भी जगह नहीं मिलेगी.

कमिटी के अध्यक्ष ओम प्रकाश तंवर कहते हैं, आप मीडिया वाले पूरे देश में जामिया नगर को बदनाम करते रहते हैं. कभी यहां की इन तस्वीरों को भी दिखाईए कि कैसे हम यहां मिलकर रहते हैं. आज तक हमें यहां कोई परेशानी नहीं हुई. यही परंपरा हमें पूरे देश में क़ायम करने की ज़रूरत है.

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